Nikolai Patrushev Meet Ajit Doval: पिछले कुछ दिनों में भारत-रूस संबंध एक बार फिर सुर्खियों में लौट आए हैं. घटनाओं की रफ्तार इतनी तेज है कि यह कहना मुश्किल है कि यह सब सामान्य शिष्टाचार भर है या किसी बड़े भू-राजनीतिक मोड़ का संकेत. एक ओर विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर मॉस्को में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से मुलाकात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर रूस के सुरक्षा ढांचे के सबसे प्रभावी चेहरे, निकोलाय पत्रुशेव, दिल्ली पहुंचकर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से लंबी बातचीत करते हैं. ऐसे समय में जब अमेरिका के साथ भारत की ट्रेड, LNG और इंडो-पैसिफिक पर बातचीत निर्णायक चरण में है, इन बैठकों का वजन और बढ़ जाता है.
रूस की सुरक्षा परिषद के सचिव निकोलाय पत्रुशेव कोई सामान्य अधिकारी नहीं, बल्कि पुतिन के सबसे भरोसेमंद सलाहकारों में गिने जाते हैं. वह रूस की विदेश और सुरक्षा नीतियों के भीतरी हलकों का हिस्सा हैं. ऐसे में उनका दिल्ली आकर डोभाल से मिलना एक संकेत है कि मॉस्को पुतिन की भारत यात्रा से पहले हर रणनीतिक बिंदु को मजबूत करना चाहता है. बताया जा रहा है कि बैठक में ऊर्जा सहयोग, रक्षा संबंध, सुरक्षा साझेदारी और पुतिन के दौरे के एजेंडे पर गहन चर्चा हुई. यह मुलाकात स्पष्ट करती है कि रूस इस बार किसी भी कूटनीतिक अस्पष्टता की गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहता.
भारत-रूस विशेष साझेदारी को नया फोकस
मॉस्को में जयशंकर और लावरोव की मुलाकात का केंद्र 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन की तैयारी रहा. जयशंकर ने इसे द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊर्जा देने का अवसर बताया. दोनों देशों के बीच चल रही प्रमुख परियोजनाओं, ऊर्जा समझौतों और रणनीतिक सहयोग पर चर्चा हुई. बातचीत में यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व और अफगानिस्तान पर भी खुलकर विचार-विमर्श हुआ. भारत ने पुनः स्पष्ट किया कि वह स्थायी शांति और संघर्ष विराम का पक्षधर है और रचनात्मक कूटनीति को बढ़ावा देता रहेगा.
भारत की रणनीतिक ऑटोनॉमी का असली इम्तिहान
भारत अभी उस मोड़ पर खड़ा है जहां उसे अमेरिका और रूस, दोनों के साथ रिश्ते संतुलन में रखने हैं. अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से दूरी बनाए और पश्चिमी नीतियों के साथ चले. वहीं रूस चाहता है कि भारत पूरी तरह पश्चिमी खेमे में न जाए. भारत की प्राथमिकता स्पष्ट है कि सभी के साथ अच्छे रिश्ते, लेकिन किसी के प्रभाव क्षेत्र में नहीं. यही रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) भारत की विदेश नीति की रीढ़ है.
LNG डील, टेक-डिफेंस सहयोग और आर्थिक हित
ये कूटनीतिक हलचल ऐसे समय में हो रही है जब भारत-अमेरिका के बीच LNG और बड़े ट्रेड एग्रीमेंट फाइनल चरण में हैं. अमेरिका चाहता है कि भारत उसके LNG का दीर्घकालिक खरीदार बने. दूसरी ओर रूस भारत को सस्ती ऊर्जा देकर अपने संबंध और गहरे करना चाहता है. भारत दोनों देशों से लाभ उठाकर अपनी अर्थव्यवस्था, रक्षा जरूरतों और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर रहा है. भारत की नीति साफ है कि हम दोनों से रिश्ते रखेंगे, लेकिन किसी के झंडे तले नहीं चलेंगे.
रूस-यूक्रेन युद्ध और भारत की कूटनीतिक स्थिति
रूस आज भी पश्चिमी प्रतिबंधों और युद्ध की जटिलताओं में फंसा है. ऐसे में उसे भरोसेमंद साझेदारों की आवश्यकता है. भारत ने रूस को सार्वजनिक रूप से आलोचना का निशाना नहीं बनाया और व्यापार, तेल-गैस और रक्षा में सहयोग जारी रखा. रूस भी जानता है कि भारत एशिया में उसकी रणनीतिक उपस्थिति के लिए निर्णायक सहयोगी है. वहीं भारत के लिए रूस रक्षा सप्लाई, संयुक्त राष्ट्र समर्थन और चीन को बैलेंस करने के लिहाज से महत्त्वपूर्ण बना हुआ है.
पुतिन का भारत दौरा क्यों है बेहद अहम
पुतिन की भारत यात्रा 5 दिसंबर के आसपास होने की संभावना है. यह दौरा सिर्फ वार्षिक परंपरा नहीं, बल्कि कई मायनों में प्रतीकात्मक भी है, क्योंकि 2021 के बाद पहली बार पुतिन भारत आ रहे हैं. यूक्रेन युद्ध के दौरान यह उनके चुने हुए सीमित विदेशी दौरों में से एक है. पश्चिम इसे चीन-रूस करीबियों की पृष्ठभूमि में भी देख रहा है. यात्रा के दौरान तीन बड़े कदम संभव हैं कि ऊर्जा और गैस पर नए करार, रक्षा परियोजनाओं और को-प्रोडक्शन की घोषणाएँ, और रुपए-रूबल में पेमेंट को अगले चरण में ले जाना.
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