Political Popcorn: 2029 का विपक्षी दूल्हा कौन? राहुल के नाम पर लेफ्ट ने उठाए सवाल, शुरू हुआ सियासी ड्रामा

देश की सियासत में 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले ही नए समीकरण बनने लगे हैं. कहीं राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं, कहीं कांग्रेस ममता बनर्जी के साथ खड़ी नजर आ रही है तो गोवा में पार्टी के भीतर ही बगावत का बिगुल बज गया है. यानी विपक्षी खेमे में इन दिनों हर तरफ सियासी हलचल है.

Political Popcorn Who will be the Leader of Opposition over Rahul Gandhi
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Political Popcorn: 1. 2029 का विपक्षी दूल्हा' कौन?

लेफ्ट का सीधा दो टूक: राहुल गांधी का पीएम चेहरा अभी 'प्री-मैच्योर'!

विपक्षी गठबंधन 'इंडी' के भीतर सीटों और चेहरों की रस्साकशी पर सीपीआई (एम) के वरिष्ठ नेता एम.ए. बेबी के बयान ने नई सियासी सरगर्मी छेड़ दी है। उन्होंने साफ कर दिया कि 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बताना अभी बेहद जल्दबाजी होगी। अलबत्ता कांग्रेस इस बयान के बाद असहज नजर आई, लेकिन वामपंथी रणनीतिकार इसे वक्त की जरूरत मान रहे हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन विपक्षी खेमे में नेतृत्व की रेस अभी से सुलग उठी है। सचमुच गठबंधन की नाव चलाने के लिए हर चप्पू का एक दिशा में चलना जरूरी होता है, पर यहां तो पतवार थामने की होड़ पहले ही मच गई है। ऐसे में यक्ष प्रश्न यही उठता है कि क्या 2029 तक यह गठबंधन किसी एक सर्वसम्मत चेहरे पर बिना किसी मनमुटाव के मुहर लगा पाएगा?

2. 'जुबान' का फिसलना या सियासी दांव?

तेलंगाना में स्पीकर पर बयान देकर फंसे बीआरएस एमएलसी, गिरफ्तारी से गरमाई राजनीति !

तेलंगाना में विधानसभा स्पीकर के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में बीआरएस के एमएलसी टाटा मधु की गिरफ्तारी के बाद सियासी पारा चढ़ गया है। कांग्रेस सरकार ने इसे संवैधानिक पद की मर्यादा का उल्लंघन बताते हुए कानूनी कार्रवाई करार दिया, जबकि विपक्षी बीआरएस का आरोप है कि सरकार विरोध की आवाज दबाने के लिए तानाशाही कर रही है। अलबत्ता हाल के महीनों में दक्षिण के राज्यों में विधायी पदों की गरिमा को लेकर टकराव तेजी से बढ़ा है। राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि तेलंगाना में सत्ता परिवर्तन के बाद से कांग्रेस और बीआरएस के बीच का घमासान अब व्यक्तिगत और कानूनी लड़ाइयों में बदल चुका है। सचमुच लोकतांत्रिक बहस में मर्यादा की लक्ष्मण रेखा का सम्मान दोनों पक्षों को करना चाहिए। प्रश्न यही है कि क्या यह तनातनी सदन के आगामी सत्रों को पूरी तरह हंगामे की भेंट चढ़ा देगी?  

3. नंदीग्राम में 'दीदी' को हाथ का सहारा!

कभी लड़े थे आर-पार, अब ममता के रथ पर कांग्रेसी सवार !

बंगाल की राजनीति में 'दोस्ती और कुश्ती' का खेल हमेशा से निराला रहा है, लेकिन नंदीग्राम उपचुनाव ने तो सारे पुराने रिकॉर्ड ही तोड़ दिए। खबर गरम है कि इस हाई-वोल्टेज सीट पर कांग्रेस ममता बनर्जी के खिलाफ अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारेगी, बल्कि बाकायदा तृणमूल के समर्थन में झंडा थामकर प्रचार भी करेगी। अलबत्ता, दोनों दलों के रणनीतिकार इसे आगामी निकाय चुनावों के लिए जमीन तैयार करने का मास्टरस्ट्रोक बता रहे हैं ताकि बीजेपी के सामने मजबूत साझा मोर्चा खड़ा किया जा सके। राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि जिस नंदीग्राम ने बंगाल की सत्ता की तकदीर बदली थी, वहां कांग्रेस का यह यू-टर्न कार्यकर्ताओं के गले आसानी से नहीं उतरेगा। सचमुच सियासत में न कोई स्थायी दोस्त होता है और न दुश्मन, बस एक अदद सीट का समीकरण होता है। यक्ष प्रश्न यह है कि क्या जमीनी कांग्रेसी कार्यकर्ता इस 'दीदी प्रेम' को दिल से अपना पाएंगे या यह सिर्फ दिल्ली और कोलकाता के ड्राइंग रूम का समझौता बनकर रह जाएगा?

4.​ 'नौकरी' का डर या संगठन का फेर?

नए सचिवों के इंटरव्यू पर पुराने सिपाहियों की बगावत, आलाकमान के सामने खुली पोल !

पार्टी मुख्यालय में इन दिनों कॉरपोरेट दफ्तरों जैसा नजारा है, जहां राहुल और प्रियंका गांधी नए सचिवों के चयन के लिए वन-टू-वन इंटरव्यू ले रहे हैं। मगर इस एचआर स्टाइल कवायद ने पुराने और मौजूदा सचिवों की नींद हराम कर दी है। अपनी विदाई तय मान चुके पुराने चेहरों ने उलटे आलाकमान के सामने ही मोर्चा खोल दिया कि संगठन सृजन के नाम पर नेताओं ने अपनी चौधराहट चमकाई है, पार्टी मजबूत नहीं की। अलबत्ता, उनका दावा है कि नए जिला प्रभारियों ने सिर्फ कागजों पर संगठन खड़ा किया, जमीन पर सन्नाटा पसरा रहा। राजनीतिक प्रेक्षकों के मुताबिक कांग्रेस में पहली बार पदों के लिए ऐसी सीधी छंटनी देखने को मिल रही है, जिससे पुराने क्षत्रपों में हड़कंप मचना स्वाभाविक है। सचमुच जब कुर्सी हिलती है तो निष्ठावान से निष्ठावान सिपाही भी बगावती सुर अलापने लगता है। यक्ष प्रश्न यह है कि क्या यह नया इंटरव्यू मॉडल पार्टी को जमीन पर नई धार दे पाएगा या अंदरूनी कलह का नया मोर्चा खोल देगा?

5. समंदर किनारे 'तीसरा' तमाशा!

गोवा में कांग्रेस को पाटकर का झटका, 'आप' और जीएफपी संग रचाया नया सियासी ब्याह !

गोवा के सियासी बीच पर फिर एक नया बवंडर उठ खड़ा हुआ है। पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमित पाटकर ने आलाकमान के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकते हुए आम आदमी पार्टी और विजय सरदेसाई की गोवा फॉरवर्ड पार्टी के साथ मिलकर तीसरे मोर्चे का मंच सजा लिया है। पाटकर को हटाकर गिरीश चोडनकर को कमान सौंपने का फैसला दिल्ली के रणनीतिकार केसी वेणुगोपाल के लिए अब गले की फांस बनता दिख रहा है। अलबत्ता स्थानीय नेताओं का आरोप है कि दिल्ली का रिमोट कंट्रोल राज्य की नब्ज समझने में पूरी तरह नाकाम रहा है। राजनीतिक प्रेक्षकों का आकलन है कि इस नए तीसरे मोर्चे के उदय से सीधे तौर पर विपक्षी वोट बैंक में सेंध लगेगी, जिसका सीधा फायदा सत्ता पक्ष को मिल सकता है। सचमुच जब घर के लोग ही अलग चूल्हा जला लें तो चुनाव जीतना टेढ़ी खीर हो जाता है। यक्ष प्रश्न यही है कि क्या कांग्रेस अपने इस बिखरते किले को बचा पाएगी या गोवा में उसका जनाधार और सिमट जाएगा?