1. 'टैरिफ और वीज़ा' के दौर से दुनिया को मिलेगी मुक्ति?
ट्रंप की हार पर वैश्विक राहत..भारतवंशियों के चेहरों पर लौटी मुस्कान, लोकतंत्र ने ली चैन की सांस!
अमेरिकी में मिडटर्म चुनाव और डोनाल्ड ट्रंप की पराजय के साथ ही दुनिया भर के कूटनीतिक और कारोबारी गलियारों ने राहत की गहरी सांस ली है. भारी-भरकम टैरिफ और वीज़ा की मनमानी पाबंदियों से न सिर्फ वैश्विक अर्थव्यवस्था को बंधक बनाया गया, बल्कि भारत और भारतीय प्रवासियों के हितों पर भी लगातार चोट पहुंचाई गई थी. अलबत्ता ट्रंप के इस आक्रामक और संकीर्ण रुख के ढहने से अमेरिका में बसे लाखों भारतीयों और वहां जाने की उम्मीद लगाए बैठे युवाओं के चेहरों पर सुकून लौट आया है. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि ट्रंप का 'अमेरिका फर्स्ट' का उग्र नारा असल में अंतरराष्ट्रीय नियमों और स्वाभाविक साझेदारियों के लिए सिरदर्द बन चुका था, जिसकी हार से लोकतांत्रिक संतुलन बहाल होता दिख रहा है. सचमुच, जब संरक्षणवाद और अनिश्चितता का साया हटता है, तो कारोबार से लेकर रिश्तों तक में नई ताजगी आती है.
2. 'कृतघ्न' नीतियों को भारतवंशियों का करारा जवाब!
अमेरिकी संसद में बढ़ा भारतीय दबदबा, ट्रंप की लहर थमी!
अमेरिकी मिडटर्म चुनाव नतीजों में अगर किसी एक ताकत की सबसे ज्यादा गूंज सुनाई दी है, तो वह है जागरूक भारतीय-अमेरिकी मतदाता वर्ग. ट्रंप की नीतियों को लेकर उपजे इस गहरे आक्रोश के बीच कि वे एक कृतघ्न नेता साबित हुए जिन्होंने भारतवंशियों के योगदान को नजरअंदाज किया,प्रवासी भारतीयों ने डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में लामबंद होकर मतदान किया. वर्जीनिया से सुहास सुब्रमण्यम और फ्लोरिडा से पिया दांडिया की शानदार और ऐतिहासिक जीत ने साबित कर दिया कि भारतीय प्रभाव वाले क्षेत्रों ने रिपब्लिकन लहर को रोकने में दीवार का काम किया है. राजनीतिक प्रेक्षक रेखांकित कर रहे हैं कि अमेरिकी संसद में भारतवंशियों की बढ़ती यह धमक आने वाले वक्त में एच-1बी वीज़ा, ग्रीन कार्ड बैकलॉग और नागरिकता सुधारों पर ऐतिहासिक राहत का मार्ग प्रशस्त करेगी. सचमुच, जब कर्मठ और शिक्षित प्रवासी समाज अपनी एकजुट ताकत दिखाता है, तो सबसे बड़े हुक्मरानों को भी झुकना पड़ता है. अब अमेरिकी सियासत में यक्ष प्रश्न यही है कि क्या भारतवंशियों की यह नई राजनीतिक ताकत भविष्य में भारत-अमेरिका संबंधों की सबसे मजबूत और निर्णायक ढाल बनेगी?
3. कुमारस्वामी का तीर, सिद्धारमैया का शक... डीके पर फिर तनी भृकुटि!
कर्नाटक में स्टिंग कांड पर दिल्ली दरबार सख्त..वेणुगोपाल जुटाएंगे इनपुट?
कर्नाटक कांग्रेस में 'सब कुछ ठीक है' का पर्दा एक बार फिर तार-तार होता दिख रहा है. हालिया स्टिंग मामले और एचडी कुमारस्वामी की तीखी प्रेस कॉन्फ्रेंस के पीछे मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की संदिग्ध भूमिका की फुसफुसाहट ने पार्टी में भूचाल ला दिया है. सिद्धारमैया ने दिल्ली दरबार में सीधा गुहार लगाकर इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच की मांग ठोक दी है, जिसके बाद हाईकमान ने संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल को तथ्यात्मक रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी है. अलबत्ता भाजपा लगातार तंज कस रही है कि जहां सरकार में ही आंतरिक अविश्वास का दीमक लगा हो, वहां जनता का भला कैसे हो सकता है. राजनीतिक प्रेक्षक चुटकी ले रहे हैं कि डीके की दिल्ली रैली से दूरी और अब यह स्टिंग विवाद दोनों नेताओं के बीच कुर्सी की खींचतान को चरम पर पहुंचा चुका है. सचमुच, जब अपनों की ही जासूसी और घेराबंदी की खबरें आएं, तो सरकार की स्थिरता पर सवाल उठना लाजिमी है. अब यक्ष प्रश्न यही है कि क्या वेणुगोपाल की जांच इस अंदरूनी जंग को शांत कर पाएगी या कर्नाटक कांग्रेस का यह ज्वालामुखी जल्द ही दिल्ली के सामने फटेगा?
4. रैली में नहीं आए !..अब बाहर का रास्ता!
रामलीला मैदान में खाली कुर्सियों का गुस्सा..यूथ कांग्रेस के एमपी, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और हरियाणा पदाधिकारी नपे!
दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्ष के तथाकथित सत्याग्रह के दौरान खाली कुर्सियों के जो वीडियो वायरल हुए थे, उनका पहला शिकार अब कांग्रेस की अपनी ही युवा ब्रिगेड बन गई है. भीड़ न जुटा पाने और रैली से नदारद रहने के आरोप में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और हरियाणा के कई युवा पदाधिकारियों को आनन-फानन में निलंबित कर दिया गया है. अलबत्ता अंदरखाने सवाल यह उठ रहा है कि क्या सिर्फ जमीनी कार्यकर्ताओं की बलि देकर शीर्ष प्रभारियों और यूथ कांग्रेस के आलाकमान की नाकामी को छुपाया जा सकता है? भाजपा रणनीतिकार चुटकी ले रहे हैं कि जिस आंदोलन में जनता ही न पहुंचे, वहां कार्यकर्ताओं को निलंबित करना खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे जैसा है. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि जनता का भरोसा खो चुकी कांग्रेस अब संगठन में डर पैदा करके भीड़ जुटाने की नाकाम कोशिश कर रही है. सचमुच, जब जमीन पर उत्साह न हो, तो कार्रवाई से जोश पैदा नहीं किया जा सकता. अब यक्ष प्रश्न यही है कि क्या निलंबन के इस डंडे से यूथ कांग्रेस में जान फूंकी जा सकेगी या अंदरूनी असंतोष का लावा और भड़क जाएगा?
5. 'जुबान संभालिए गौतम जी!'... प्रियंका की दो टूक!
सपा-कांग्रेस गठबंधन पर बयानबाजी से नाराज हुईं प्रियंका!
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ तालमेल की खींचतान अब कांग्रेस के दफ्तरों से निकलकर सार्वजनिक हो रही है. सपा के साथ सीटों और बयानों को लेकर अनावश्यक बयानबाजी करने पर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम को जमकर आड़े हाथों लिया है. प्रियंका ने सख्त हिदायत दी है कि गठबंधन पर फैसले का अधिकार सिर्फ और सिर्फ शीर्ष नेतृत्व के पास है, लिहाजा कोई भी नेता कैमरे के सामने अपनी ढपली अपना राग न अलापे. अलबत्ता इस फटकार से यह साफ हो गया है कि कांग्रेस के भीतर अखिलेश यादव की 'बड़ी भूख' और दबाव के आगे सरेंडर करने को लेकर गहरा असमंजस है. राजनीतिक प्रेक्षक देख रहे हैं कि यूपी में कांग्रेस अपनी बची-खुची साख बचाने के लिए सपा की हर शर्त मानने को मजबूर दिख रही है और प्रभारी की फटकार इसी लाचारी का नतीजा है. सचमुच, जब क्षेत्रीय दल ड्राइविंग सीट पर हों, तो राष्ट्रीय पार्टी के प्रभारियों के हाथ सिर्फ डांट-फटकार ही लगती है. अब यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या प्रियंका की इस फटकार के बाद कांग्रेसी नेता सपा के सामने नतमस्तक रहेंगे या जमीन पर कार्यकर्ताओं का गुस्सा फूटेगा?