1.भतीजी पर ब्रेक, भाई के बेटे पर टेक!
बसपा में उत्तराधिकार की नई बिसात !
बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती के एक और आंतरिक संगठनात्मक फैसले ने लखनऊ से दिल्ली तक सबको चौंका दिया है. परिवार और संगठन के बीच चल रही रस्साकशी में भतीजी दीपिका की जगह अब ईशान आनंद को तवज्जो देने के संकेत मिले हैं. आकाश आनंद की पहले हुई विदाई और फिर वापसी की अटकलों के बीच यह नया मोड़ आया है. अलबत्ता बसपा के समर्पित कार्यकर्ता इसे पार्टी अनुशासन और जमीनी निष्ठा का सम्मान बता रहे हैं. राजनीतिक प्रेक्षक इस कदम को दलित जनाधार को साधे रखने और पार्टी के भीतर किसी भी तरह की गुटबाजी को पनपने से पहले कुचलने की रणनीति मानते हैं. सचमुच बसपा में कौन कब हाशिए पर चला जाए और कौन अचानक फलक पर चमक उठे, इसका अंदाजा लगाना हमेशा कठिन रहा है. सत्ता पक्ष और मुख्य विपक्षी दल सपा दोनों ही बसपा के इस आंतरिक मंथन से दलित वोट बैंक के छिटकने का इंतजार कर रहे हैं. अब सियासी चौपालों पर प्रश्न यही है कि क्या इस नए चेहरे के दम पर बसपा अपना पुराना गौरव हासिल कर पाएगी?
2.बद्री-केदार का द्वार और नैया पार?
देवभूमि में कांग्रेस का ‘टेंपल कार्ड’, प्रियंका-राहुल के चुनावी शंखनाद पर गरमाई सियासत !
उत्तराखंड के सियासी रण में पैर जमाने के लिए कांग्रेस ने इस बार सीधे देवभूमि के प्रमुख धामों का रुख करने का मन बना लिया है. अक्टूबर के पहले हफ्ते में प्रियंका गांधी बद्रीनाथ धाम में शीश नवाकर अभियान का आगाज करेंगी, तो महीने के तीसरे हफ्ते में राहुल गांधी बद्री-केदार दोनों धामों की परिक्रमा कर माहौल बनाएंगे. अलबत्ता सत्ताधारी दल के रणनीतिकार चुटकी लेते हुए इसे चुनावी मौसम की ‘मौसमी भक्ति’ करार दे रहे हैं. राजनीतिक प्रेक्षक इसे बहुसंख्यक वोट बैंक के बीच अपनी छवि को नरम हिंदुत्व के सांचे में ढालने की सोची-समझी कवायद मान रहे हैं. सचमुच जब-जब पहाड़ पर सियासी पारा चढ़ता है, मंदिरों की सीढ़ियों पर नतमस्तक होते नेताओं की तस्वीरें सबसे बड़ा विमर्श बन जाती हैं. भाजपा जहां अपने चारधाम ऑलवेदर रोड और पुनर्निर्माण के विकास कार्यों को आगे रख रही है, वहीं कांग्रेस अपनी धार्मिक आस्था के जरिए जनता से सीधा भावनात्मक तार जोड़ने में जुटी है. अब देवभूमि की जनता के सामने प्रश्न यही है कि क्या तीर्थ की चौखट से निकली यह सियासी पुकार वाकई कांग्रेस की तकदीर बदल पाएगी?
3.सात सीटें, पांच दावेदार और सन्नाटा अपार!
बिहार MLC चुनाव में ‘इंडी’ गठबंधन में रार, आरजेडी की चुप्पी से कांग्रेस की सांसें अटकीं !
बिहार विधान परिषद की सात सीटों के दंगल ने विपक्षी ‘इंडी’ गठबंधन के भीतर की दरार को एक बार फिर सतह पर ला दिया है. सात में से पांच सीटों पर राष्ट्रीय जनता दल ने अपने उम्मीदवार तय कर लिए हैं, जबकि बची दो सीटों पर सस्पेंस का ऐसा ताला जड़ा है कि सहयोगी दलों की नींद उड़ी हुई है. अलबत्ता कांग्रेस के गलियारों में सन्नाटा पसरा है क्योंकि आरजेडी फिलहाल अपने कोटे से एक भी सीट सहयोगियों को बख्शने के मूड में नहीं दिख रही. राजनीतिक प्रेक्षक साफ कहते हैं कि बिहार में मजबूत और जिताऊ चेहरों के अकाल से जूझ रही कांग्रेस के पास अब बड़े भाई के रहमो-करम पर टिके रहने के सिवा ज्यादा विकल्प नहीं बचे हैं. सचमुच गठबंधन धर्म का ढोल पीटने वाले दलों के बीच जब सीटों के बंटवारे की टेबल सजती है तो जमीनी तालमेल की कलई खुल जाती है. सत्ता पक्ष इस रस्साकशी को देखकर मुस्कुरा रहा है और इसे विपक्ष की स्वाभाविक बेबसी बता रहा है. ऐसे में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के सामने यक्ष प्रश्न यह आन खड़ा हुआ है कि क्या वे गठबंधन की खातिर यह मौन समर्पण स्वीकार करेंगे या बगावत का झंडा उठाएंगे?
4.35 हजार किमी, 20 टीमें और ‘सेवा’ का चक्रव्यूह!
वडनगर से वाराणसी तक बाइकर्स की गूंज, बीजेपी के सेवा पखवाड़े से जमीनी माहौल बनाने का मास्टरस्ट्रोक !
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन से शुरू हुआ ‘सेवा पखवाड़ा’ अब वडनगर से वाराणसी के 35,500 किलोमीटर लंबे रूट पर 20 टीमों की अनूठी सेवा यात्रा के रूप में धरातल पर उतर चुका है. 17 सितंबर से 7 अक्टूबर तक चलने वाली यह यात्रा केवल बाइकों का काफिला नहीं है, बल्कि तालाबों, मंदिरों, स्कूलों की सफाई, गौ सेवा, ‘एक पेड़ मां के नाम’ और पीएम श्री स्कूलों में स्टेशनरी बांटने का सघन जनसंपर्क अभियान बन चुकी है. अलबत्ता विपक्षी दल इसे सरकारी मशीनरी और संगठनात्मक तामझाम के जरिए आगामी चुनावी जमीन को सींचने की भव्य ब्रांडिंग बता रहे हैं. राजनीतिक प्रेक्षक इस यात्रा को बूथ स्तर पर महिलाओं, युवाओं, आशा वर्कर्स और लाभार्थियों को साधने का एक बेहद महीन और अभूतपूर्व सोशल-इंजीनियरिंग मॉडल मान रहे हैं. सचमुच अंगदान के संकल्प से लेकर शहीदों को नमन तक, यह अभियान सामाजिक सरोकार और राजनीतिक उपस्थिति का ऐसा संगम है जिसे अनदेखा करना किसी के लिए मुमकिन नहीं. सत्ता पक्ष इसे विशुद्ध सेवा और जनभागीदारी का उत्सव कह रहा है. अब सियासी चौपालों पर यक्ष प्रश्न यही है कि क्या 35 हजार किलोमीटर की यह सेवा यात्रा विपक्ष के तमाम बयानी हमलों को बेअसर कर जनता के दिलों में अपनी अमिट छाप छोड़ पाएगी?
5.एक मान, तीन कमान और गजब प्लान!
सीएम की धूरी सीट पर विपक्ष का ‘बैकअप मॉडल’, पर्चा रद्द होने के खौफ से 3-3 प्रत्याशी तैयार !
पंजाब की सियासत में इन दिनों चुनावी रणनीति का एक ऐसा अनूठा फॉर्मूला सामने आया है जिसने बड़े-बड़े सियासी पंडितों को हैरान कर दिया है. मुख्यमंत्री भगवंत मान की धूरी विधानसभा सीट पर विपक्ष ने पर्चा खारिज होने या अचानक गिरफ्तारी के खतरे से निपटने के लिए त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरा बना लिया है कांग्रेस जहां 3 तो अकाली दल 2-2 प्रत्याशियों के सेट तैयार करवा रहा है. अलबत्ता सत्ता पक्ष इसे विपक्ष की घबराहट और हार तय मानकर किया जा रहा बचकाना ड्रामा बता रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक रेखांकित करते हैं कि नंदीग्राम और डेरा बस्सी जैसी घटनाओं से सबक लेते हुए विपक्ष अब किसी भी कीमत पर मैदान खाली छोड़ने का जोखिम नहीं उठाना चाहता. सचमुच एक ही सीट पर उम्मीदवार नंबर एक का पर्चा रद्द हुआ तो दूसरा और दूसरे का हुआ तो तीसरा लड़ेगा, यह रणनीति लोकतंत्र की नई और विचित्र हकीकत बयां करती है. कानूनी दांव-पेंचों के इस दौर में अपनी गोटियां सुरक्षित रखना हर दल की मजबूरी बन चुका है. अब मतदाताओं के जेहन में प्रश्न यही तैर रहा है कि जब बैकअप की इतनी लंबी कतार होगी तो असल में जनता किसे अपना असली नुमाइंदा मानकर वोट डालेगी?
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