Pitru Paksha 2026: पितृपक्ष को हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता जताने और उनकी आत्मिक शांति के लिए धार्मिक कर्म करने का समय माना जाता है. इस दौरान श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के जरिए पितरों का स्मरण किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं में पितृ दोष को भी पूर्वजों से संबंधित माना गया है. कहा जाता है कि इससे जुड़े दोषों के निवारण के लिए पितृपक्ष में कुछ विशेष देवी-देवताओं की आराधना करना शुभ माना जाता है. आइए जानते हैं पितृ दोष की मान्यता क्या है और पितृपक्ष में किन देवताओं की पूजा की जा सकती है.
पितृ दोष क्या होता है?
ज्योतिष शास्त्र में पितृ दोष को कुंडली की कुछ ग्रह स्थितियों से जोड़कर देखा जाता है. मान्यता के अनुसार सूर्य, राहु, केतु या अन्य ग्रहों की विशेष स्थिति होने पर इसे पितृ दोष कहा जाता है. धार्मिक विश्वासों में इसे परिवार, संतान, विवाह, करियर और आर्थिक जीवन में आने वाली रुकावटों से जोड़ा जाता है. हालांकि, ये धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताएं हैं, जिनका वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है.
भगवान शिव की पूजा
पितृपक्ष में भगवान शिव की आराधना को भी विशेष महत्व दिया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि शिव पूजा के जरिए पूर्वजों की शांति और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जा सकती है. इस दौरान सुबह स्नान के बाद शिवलिंग पर जल अर्पित करके भगवान शिव का ध्यान किया जाता है. इसके साथ ही ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करने की परंपरा है. भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान शिव से पितरों की शांति और परिवार में सुख-शांति की प्रार्थना कर सकते हैं.
भगवान विष्णु की आराधना
पितृ कर्मों के साथ भगवान विष्णु की पूजा का भी धार्मिक परंपराओं में विशेष उल्लेख मिलता है. पितृपक्ष के दौरान भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित कर उनकी पूजा की जाती है. मान्यता है कि विष्णु भगवान की आराधना के साथ पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण करने से उनकी आत्मिक शांति की कामना की जाती है. इस दौरान श्रद्धालु भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं.
सूर्य देव और गणेश जी की पूजा
ज्योतिषीय मान्यताओं में सूर्य को पिता और पूर्वजों का कारक ग्रह माना जाता है, इसलिए पितृपक्ष में सूर्य देव को अर्घ्य देने की परंपरा बताई गई है. सुबह सूर्योदय के समय तांबे के पात्र से सूर्य को जल अर्पित किया जा सकता है. वहीं, भगवान गणेश को विघ्नहर्ता माना जाता है और किसी भी शुभ कार्य से पहले उनकी पूजा करने की परंपरा है. पितृपक्ष में गणेश जी की आराधना करके परिवार की बाधाओं को दूर करने और सुख-शांति की कामना की जाती है. साल 2026 में पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा.
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. भारत 24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.
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