35 साल की अदावत का हुआ अंत! ट्रंप ने इन दो कट्टर दुश्मन देशों को बनाया दोस्त, जानें क्या है पूरा मामला

Azerbaijan and Armenia: दशकों तक चला संघर्ष, हज़ारों जानें, लाखों विस्थापित परिवार, लेकिन अब उम्मीद की किरण दिख रही है. शुक्रवार को इतिहास में एक नया अध्याय लिखा गया जब अजरबैजान और आर्मेनिया ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता में एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए.

Peace agreement between Azerbaijan-Armenia President Aliyev aNobel Peace Prize to Trump
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Azerbaijan and Armenia: दशकों तक चला संघर्ष, हज़ारों जानें, लाखों विस्थापित परिवार, लेकिन अब उम्मीद की किरण दिख रही है. शुक्रवार को इतिहास में एक नया अध्याय लिखा गया जब अजरबैजान और आर्मेनिया ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता में एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए. यह समझौता सिर्फ दो देशों के बीच नहीं, बल्कि दो समुदायों के बीच रिश्तों को फिर से जोड़ने की कोशिश है.

व्हाइट हाउस में आयोजित इस महत्वपूर्ण समारोह में दोनों देशों के शीर्ष नेता, अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव और आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिनयान, एक ही मंच पर मुस्कुराते हुए खड़े थे. यह दृश्य उन सभी के लिए एक उम्मीद बनकर उभरा जो युद्ध और नफरत से तंग आ चुके हैं.

तीन दशक पुराना जख्म, अब भरने की उम्मीद

नागोर्नो-काराबाख को लेकर 1980 के दशक से चला आ रहा विवाद इस क्षेत्र की सबसे जटिल भू-राजनीतिक चुनौतियों में से एक रहा है. 2023 में अजरबैजान द्वारा पूरे क्षेत्र पर नियंत्रण के बाद लगभग एक लाख अर्मेनियाई मूल के लोगों को विस्थापित होना पड़ा था. यह समझौता इस दर्दनाक इतिहास को पीछे छोड़ने की शुरुआत मानी जा रही है.

राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने भाषण में कहा, “करीब 35 साल की लड़ाई अब खत्म हुई है. आज वे दुश्मन नहीं, दोस्त बन चुके हैं — और मुझे पूरा विश्वास है कि ये दोस्ती लंबे समय तक चलेगी.”

ट्रंप को बताया गया 'नोबेल शांति पुरस्कार' का दावेदार

समारोह में अजरबैजान के राष्ट्रपति अलीयेव ने अमेरिका की भूमिका की खुले दिल से सराहना की और यहां तक कह डाला, “अगर राष्ट्रपति ट्रंप नोबेल शांति पुरस्कार के हकदार नहीं हैं, तो फिर कौन है?” वहीं, दोनों देशों ने न केवल लड़ाई बंद करने पर सहमति जताई, बल्कि एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करने, राजनयिक संबंध स्थापित करने और तकनीक, ऊर्जा व व्यापार जैसे क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने का वादा किया.

एक वैश्विक शांतिदूत की छवि गढ़ने की कोशिश में ट्रंप

अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही डोनाल्ड ट्रंप ने खुद को एक वैश्विक शांति वाहक के रूप में पेश किया है. व्हाइट हाउस के अनुसार, कंबोडिया-थाईलैंड, रवांडा-कांगो और भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव कम करने में ट्रंप की भूमिका रही है. हालांकि यूक्रेन-रूस और इजरायल-हमास जैसे संघर्ष अभी भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं.

क्या यह शांति स्थायी होगी?

यह सवाल अभी बना हुआ है कि यह शांति समझौता जमीन पर कितनी देर टिकेगा. लेकिन एक बात साफ है, इस ऐतिहासिक हस्ताक्षर ने दोनों देशों को एक नई शुरुआत का मौका दिया है. कभी जिनके नाम से सिर्फ युद्ध की खबरें आती थीं, आज उनके हाथ में शांति का परचम है.

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