मुस्लिम उम्‍माह को धोखा देने की तैयारी में पाकिस्तान! 20000 जवानों को भेजेगा गाजा, क्या है मुनीर का प्लान?

पाकिस्तान की राजनीति और विदेश नीति में बड़ा मोड़ आता दिखाई दे रहा है. रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार गाज़ा पट्टी में सैनिक भेजने पर गंभीरता से विचार कर रही है.

Pakistan will send its soldiers to Gaza demilitarised Hamas
प्रतिकात्मक तस्वीर/ Social Media

इस्लामाबाद: पाकिस्तान की राजनीति और विदेश नीति में बड़ा मोड़ आता दिखाई दे रहा है. रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार गाज़ा पट्टी में सैनिक भेजने पर गंभीरता से विचार कर रही है. बताया जा रहा है कि इस योजना के तहत करीब 20,000 पाकिस्तानी सैनिकों को हमास के लड़ाकों को निरस्त्र (Disarm) करने के लिए तैनात किया जा सकता है.

यह फैसला पाकिस्तान की विदेश नीति में एक बड़ा यू-टर्न माना जा रहा है, क्योंकि पाकिस्तान अब तक हमास का परोक्ष समर्थन करता रहा है. यही नहीं, पाकिस्तान ने कभी भी इज़रायल को आधिकारिक मान्यता नहीं दी थी. ऐसे में इज़रायल और अमेरिका के कहने पर गाज़ा में सैनिक भेजने की तैयारी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

मिस्र में हुई मुलाकात के बाद हुआ फैसला

सूत्रों के मुताबिक, गाज़ा में पाकिस्तानी सैनिक भेजने का फैसला फील्ड मार्शल असीम मुनीर के मिस्र दौरे के दौरान हुआ. इस दौरे के दौरान मुनीर ने अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA और इज़रायली एजेंसी मोसाद के वरिष्ठ अधिकारियों से गुप्त बैठक की.

खुफिया सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि इसी मुलाकात के दौरान पाकिस्तानी सेना को गाज़ा में शांति स्थापित करने और हमास को कमजोर करने की जिम्मेदारी सौंपने पर सहमति बनी. यह योजना मानवीय सहायता और पुनर्निर्माण के नाम पर तैयार की जा रही है, लेकिन असल उद्देश्य गाज़ा में एक “नियंत्रित सैन्य उपस्थिति” बनाए रखना बताया जा रहा है.

हमास पर क्यों उलटा पाकिस्तान?

पिछले कई दशकों से पाकिस्तान ने फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर खुलकर इज़रायल का विरोध किया है. पाकिस्तान ने कभी भी इज़रायल को एक वैध राष्ट्र के रूप में स्वीकार नहीं किया, और हमास के कई नेताओं को पाकिस्तानी राजनीतिक और धार्मिक समूहों का समर्थन भी मिला.

लेकिन अब वही पाकिस्तान हमास के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी कर रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव अमेरिका और खाड़ी देशों के दबाव का परिणाम है. हाल के महीनों में पाकिस्तान गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा है और उसे IMF तथा विश्व बैंक से मदद की आवश्यकता है. माना जा रहा है कि गाज़ा में पाकिस्तानी सैनिकों की भागीदारी के बदले अमेरिका और इज़रायल ने आर्थिक रियायतें और कर्ज़ में राहत देने का वादा किया है.

पाकिस्तानी सैनिकों की भूमिका क्या होगी?

जानकारी के मुताबिक, प्रस्तावित मिशन में पाकिस्तानी सैनिकों को हमास के लड़ाकों को निरस्त्र करने और शांति बनाए रखने का काम सौंपा जाएगा. ये सैनिक गाज़ा में बफर ज़ोन फोर्स की भूमिका निभाएँगे, यानी इज़रायल और स्थानीय उग्रवादी गुटों के बीच एक “सुरक्षा परत” के रूप में तैनात रहेंगे.

इसके अलावा, पाकिस्तान को इस मिशन में इंडोनेशिया और अज़रबैजान के साथ सहयोग करना होगा. इन देशों को भी सीमित रूप से शांति स्थापना या प्रवर्तन कार्यों में शामिल किया जा सकता है. इस बहुराष्ट्रीय व्यवस्था का नेतृत्व पश्चिमी और अरब मध्यस्थों के हाथों में होगा, ताकि इसे "मानवीय हस्तक्षेप" का रूप दिया जा सके.

आर्थिक सौदे और रणनीतिक लाभ

खुफिया सूत्रों के अनुसार, इस संभावित समझौते में पाकिस्तान को सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक लाभ भी मिलेंगे.

अमेरिका और खाड़ी देशों ने पाकिस्तान को-

  • विश्व बैंक ऋणों में रियायत,
  • भुगतान स्थगन योजनाएँ,
  • और वित्तीय सहायता पैकेज देने का आश्वासन दिया है.

इसके साथ ही, पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीमित राजनयिक राहत भी मिलने की उम्मीद है. सूत्रों का कहना है कि यह सब “चुपचाप पुरस्कृत” किए जाने की रणनीति के तहत किया जा रहा है, ताकि पाकिस्तान की घरेलू जनता को इसका पता न चले.

पासपोर्ट से हटा इज़रायल विरोधी वाक्य

खबर यह भी है कि पाकिस्तान ने हाल ही में अपने पासपोर्ट डिज़ाइन में बदलाव करते हुए वह पंक्ति हटा दी है, जिसमें लिखा होता था- “यह पासपोर्ट इज़रायल के लिए मान्य नहीं है”. यह बदलाव इस ओर संकेत करता है कि पाकिस्तान धीरे-धीरे इज़रायल के प्रति अपने रुख को नरम कर रहा है.

इज़रायली मीडिया ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी है और इसे “रणनीतिक रूप से उपयोगी लेकिन बेहद संवेदनशील सहयोग” बताया है. हालांकि, इस कदम से अरब देशों और ईरान जैसे क्षेत्रीय सहयोगियों में असंतोष बढ़ा है.

‘मुस्लिम उम्माह’ के साथ धोखा? आलोचना तेज

पाकिस्तान के अंदर भी इस फैसले को लेकर जबरदस्त विरोध देखने को मिल रहा है. कई धार्मिक संगठनों और विपक्षी नेताओं ने कहा है कि यह कदम मुस्लिम उम्माह (इस्लामिक एकता) के साथ धोखा है. आलोचकों का कहना है कि असीम मुनीर ने सत्ता और विदेशी दबाव के लिए अपने वैचारिक रुख से पलटी खाई है.

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि असीम मुनीर की यह नीति घरेलू अस्थिरता को कम करने और अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करने की कोशिश है, लेकिन इससे पाकिस्तान की जनता के बीच भरोसा और अधिक कमजोर हो सकता है.

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