समंदर तक पहुंची धरती की आग! रिकॉर्ड स्तर पर महासागरों का तापमान, अल नीनो और ग्लोबल वार्मिंग का खतरा?

दुनिया का मौसम तेजी से बदल रहा है. प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है और गर्मी का असर भी बढ़ रहा है. दुनिया के कई देशों में भीषण गर्मी बड़ी समस्या बन चुकी है.

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प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

Global Warming: दुनिया का मौसम तेजी से बदल रहा है. प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है और गर्मी का असर भी बढ़ रहा है. दुनिया के कई देशों में भीषण गर्मी बड़ी समस्या बन चुकी है. अब इसका असर सिर्फ धरती पर ही नहीं, बल्कि समुद्रों पर भी दिख रहा है. महासागरों में बढ़ती गर्मी ने पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पिछले हफ्ते शनिवार को महासागरों का तापमान अब तक दर्ज किए गए तापमान से ज्यादा रहा.

महासागर की सतह का औसत तापमान शनिवार को 21.1 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया. इससे पहले 1 मार्च 2024 को यह तापमान 21.09 डिग्री सेल्सियस था. 1991 से 2020 तक समुद्र का तापमान औसत के आसपास रहा. लेकिन अब समुद्र में बढ़ती गर्मी जलवायु संकट का बड़ा संकेत मानी जा रही है. जीवाश्म ईंधन जलाने से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड से पैदा होने वाली गर्मी का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा महासागर सोख लेते हैं.

जलस्तर बढ़ने के साथ तूफानों का खतरा

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि गर्म महासागर समुद्र का जलस्तर बढ़ने और खतरनाक तूफानों की समस्या को और गंभीर बना सकते हैं. इससे दुनिया के करोड़ों लोगों की जिंदगी प्रभावित हो सकती है. गर्म समुद्र समुद्री हीटवेव को भी बढ़ाते हैं, जिससे समुद्री जीवों को नुकसान पहुंचता है. तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों की आजीविका पर भी इसका असर पड़ सकता है.

उत्तरी गोलार्ध में इस गर्मी के दौरान यूरोप और उत्तरी अमेरिका में रिकॉर्ड गर्मी, सूखे और जंगलों में आग की कई घटनाएं सामने आई हैं. वहीं एशिया के कई हिस्सों को भारी बारिश और तूफानों का सामना करना पड़ा है.

अल नीनो से और बढ़ रही समुद्र की गर्मी

महासागरों की बढ़ती गर्मी के पीछे अल नीनो भी एक बड़ी वजह है. अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो दुनिया के तापमान और मौसम के पैटर्न में बदलाव करती है. माना जा रहा है कि यह कम से कम एक सदी के सबसे गर्म अल नीनो में से एक हो सकता है.

नए अल नीनो का असर भारत के मानसून, इंडोनेशिया में जंगलों की आग और ऑस्ट्रेलिया में आग के बढ़ते खतरे के रूप में दिखाई दे रहा है.

तीन दशकों में तीन गुना बढ़ीं समुद्री हीटवेव

अगस्त में महासागरों की गर्मी का नया रिकॉर्ड बनना इसलिए खास है क्योंकि आम तौर पर समुद्र का तापमान मार्च और अप्रैल में सबसे ज्यादा रहता है. यह दक्षिणी गोलार्ध की गर्मियों के बाद का समय होता है. दक्षिणी गोलार्ध में उत्तरी गोलार्ध के मुकाबले समुद्र का क्षेत्र भी ज्यादा है.

यूरोपीय संघ की कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस की डॉक्टर सामंथा बर्गेस ने कहा कि यह रिकॉर्ड बताता है कि महासागर लगातार बढ़ते दबाव का सामना कर रहे हैं. उनके मुताबिक, अल नीनो गर्मी बढ़ा रहा है, लेकिन इसके साथ इंसानों की वजह से दशकों से बढ़ रही ग्लोबल वार्मिंग का असर भी जुड़ा है. 1990 के दशक की शुरुआत के मुकाबले समुद्री हीटवेव वाले दिनों की संख्या तीन गुना से ज्यादा हो गई है.

गर्म महासागरों की वजह से पानी फैलता है और समुद्र का जलस्तर बढ़ता है. इससे तटीय इलाकों और कम ऊंचाई वाले द्वीपीय देशों में बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है. गर्म समुद्र वातावरण में ज्यादा ऊर्जा और जलवाष्प पहुंचाते हैं, जिससे भारी बारिश और तूफान और तेज हो सकते हैं.

समुद्र का तापमान कम करने के लिए क्या करें?

जीवाश्म ईंधन जलाने और जंगलों की कटाई से निकलने वाली ज्यादातर कार्बन डाइऑक्साइड महासागर सोख लेते हैं. लेकिन गर्म महासागर कार्बन डाइऑक्साइड को कम सोख पाते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे ग्लोबल वार्मिंग को रोकने वाली धरती की एक अहम प्राकृतिक व्यवस्था कमजोर हो रही है.

कैंपेन फॉर नेचर के डायरेक्टर ब्रायन ओ’डोनेल के मुताबिक, समुद्र की बढ़ती गर्मी से निपटने के लिए जीवाश्म ईंधन से होने वाले उत्सर्जन को तेजी से कम करना होगा. साथ ही समुद्री और तटीय पर्यावरण की सुरक्षा भी जरूरी है. केल्प बेड, मैंग्रोव और दलदली इलाके कार्बन सोखने में मदद करते हैं, जबकि कोरल रीफ तूफानों से बचाव करते हैं और समुद्री जीवों को रहने की जगह देते हैं.

190 से ज्यादा देशों ने 2030 तक धरती के कम से कम 30 फीसदी हिस्से को सुरक्षित रखने का वादा किया है. अब जरूरत इस वादे को जमीन पर लागू करने की है. कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के ये आंकड़े ध्रुवीय इलाकों के बाहर के महासागरों से जुड़े हैं. आर्कटिक दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला इलाका है. समुद्र के तापमान के बेहतर सैटेलाइट रिकॉर्ड 1979 से उपलब्ध हैं.

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