नॉर्वे के प्रतिष्ठित शतरंज टूर्नामेंट में भारतीय ग्रैंडमास्टर डी. गुकेश ने दुनिया को चौंका दिया. 19 वर्षीय वर्ल्ड चैंपियन ने छठे राउंड में विश्व के नंबर-1 खिलाड़ी मैग्नस कार्लसन को क्लासिकल फॉर्मेट में शिकस्त दी, जो उनके करियर की इस फॉर्मेट में कार्लसन के खिलाफ पहली जीत है.
इस मुकाबले के बाद केवल परिणाम ही नहीं, बल्कि उसका असर भी सुर्खियों में रहा. हार से निराश कार्लसन ने गुस्से में चेस बोर्ड पर मुक्का मारा, जिससे मोहरे बिखर गए. हालांकि बाद में उन्होंने गुकेश से माफी मांगी और उनकी पीठ थपथपाकर खेल भावना का परिचय भी दिया. मीडिया से बातचीत से उन्होंने इस बार दूरी बनाए रखी.
टूर्नामेंट की रैंकिंग में खलबली
गुकेश की यह जीत न केवल उनके आत्मविश्वास की मिसाल बनी, बल्कि टूर्नामेंट की रैंकिंग में भी बदलाव ले आई. इस वक्त फाबियानो कारुआना और मैग्नस कार्लसन 9.5 अंकों के साथ संयुक्त रूप से पहले स्थान पर हैं, जबकि गुकेश 8.5 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर मजबूती से जमे हैं.
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— Norway Chess (@NorwayChess) June 1, 2025
बयानबाजी और जवाब का वक्त
गौरतलब है कि इसी टूर्नामेंट के पहले राउंड में कार्लसन ने गुकेश को हराया था. तब पांच बार के वर्ल्ड चैंपियन कार्लसन ने गुकेश के खेल पर सवाल उठाते हुए यहां तक कह दिया था कि “वर्ल्ड चैंपियनशिप में मैं नहीं खेलता, क्योंकि मुझे हराने वाला कोई नहीं.”
गुकेश ने तब संयम से जवाब दिया था: “अगर मौका मिला, तो मैं बोर्ड पर अपनी काबिलियत दिखाऊंगा.” और छठे राउंड में उन्होंने अपने उसी वादे को हकीकत में बदल दिया.
एक ऐतिहासिक चैंपियन का सफर
डी. गुकेश की यह जीत कोई तुक्का नहीं है. दिसंबर 2024 में सिंगापुर में आयोजित वर्ल्ड चेस चैंपियनशिप में उन्होंने चीन के डिंग लिरेन को बेहद रोमांचक फाइनल में 7.5-6.5 से हराकर खिताब अपने नाम किया था. उस वक्त वे सिर्फ 18 साल के थे, और इसी के साथ वे सबसे कम उम्र में वर्ल्ड चेस चैंपियन बनने वाले खिलाड़ी बन गए. इससे पहले यह रिकॉर्ड 22 साल की उम्र में खिताब जीतने वाले गैरी कास्पारोव के नाम था.
ओलिंपियाड में भी रचा था इतिहास
सितंबर 2024 में बुडापेस्ट में आयोजित चेस ओलिंपियाड में गुकेश ने भारत को ओपन कैटेगरी में ऐतिहासिक जीत दिलाई थी. उन्होंने निर्णायक फाइनल गेम जीतकर भारत को चैंपियन बनाया, जबकि महिला वर्ग में भी भारत ने बाजी मारी थी.
चेस के फॉर्मेट्स: जानिए अंतर
शतरंज को तीन मुख्य फॉर्मेट्स में खेला जाता है:
क्लासिकल: सबसे लंबा और गंभीर फॉर्मेट, जिसमें खिलाड़ियों को गहराई से सोचने के लिए 90-120 मिनट या उससे अधिक का समय मिलता है.
रैपिड: थोड़ा तेज़ खेल, जिसमें समय सीमा 15-60 मिनट के बीच होती है.
ब्लिट्ज: सबसे तेज़ फॉर्मेट, जिसमें खिलाड़ी को सिर्फ 3 से 10 मिनट का समय मिलता है.
गुकेश की कार्लसन पर यह जीत इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि यह क्लासिकल फॉर्मेट में आई — जिसमें रणनीति, धैर्य और अनुभव की सबसे कड़ी परीक्षा होती है.
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