NIA Three-App Model: देश में आतंकवाद का तरीका तेजी से बदल रहा है. अब आतंकी संगठन हथियारों से ज्यादा सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं. राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की हालिया जांच में सामने आया है कि युवाओं को फंसाने के लिए एक 'थ्री-ऐप मॉडल' अपनाया जा रहा है. जुलाई में देशभर में कई जगह हुई छापेमारी के दौरान जांच एजेंसियों को इस नए तरीके से जुड़े कई अहम सुराग मिले हैं.
क्या है 'थ्री-ऐप मॉडल'?
जांच के अनुसार, आतंकी संगठन युवाओं तक पहुंचने के लिए तीन अलग-अलग डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं. सबसे पहले इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर युवाओं से संपर्क किया जाता है.
इसके बाद उन्हें टेलीग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड ऐप पर ले जाया जाता है, जहां धीरे-धीरे उनका ब्रेनवॉश किया जाता है. इसके बाद आतंकी गतिविधियों के लिए पैसे जुटाने का काम क्रिप्टोकरेंसी के जरिए किया जाता है, जिससे लेनदेन का पता लगाना मुश्किल हो जाता है.
टेलीग्राम पर चलती है गुप्त ट्रेनिंग
जांच में पता चला कि शुरुआती बातचीत के बाद युवाओं को टेलीग्राम के प्राइवेट ग्रुप में जोड़ा जाता है. इन ग्रुपों में पहले धार्मिक और वैचारिक बातें साझा की जाती हैं. इसके बाद धीरे-धीरे हिंसक विचार फैलाए जाते हैं. कुछ मामलों में हथियार जुटाने, विस्फोटक बनाने और विदेश जाकर ट्रेनिंग लेने जैसी बातें भी सामने आई हैं.
पहचान छिपाने के लिए अपनाते हैं कई तरीके
जांच एजेंसियों के मुताबिक आतंकी अपनी पहचान छिपाने के लिए कई तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं. इनमें ऑटो-डिलीट चैट, फर्जी प्रोफाइल, कोड वर्ड, बर्नर फोन और VPN जैसी तकनीकें शामिल हैं. इससे उनकी गतिविधियों का पता लगाना और भी मुश्किल हो जाता है.
कई राज्यों में मिले अहम सुराग
जांच के दौरान तमिलनाडु, विजयवाड़ा और मंगलुरु से जुड़े कई मॉड्यूल सामने आए हैं. इन मामलों में सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप के जरिए युवाओं से संपर्क करने, अलग-अलग ग्रुप बनाने और डिजिटल माध्यम से कट्टरपंथी सामग्री साझा करने के सबूत मिले हैं. कुछ मामलों में क्रिप्टोकरेंसी के जरिए फंडिंग होने की भी जानकारी सामने आई है.
पढ़े-लिखे युवा भी बन रहे निशाना
जांच एजेंसियों के अनुसार, आतंकियों के निशाने पर सबसे ज्यादा 18 से 30 साल के युवा हैं. चिंता की बात यह है कि सिर्फ बेरोजगार ही नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग, मेडिकल और दूसरे प्रोफेशनल कोर्स करने वाले छात्र भी इस जाल में फंस रहे हैं.
पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़े मामले
जांच एजेंसियों का कहना है कि पिछले पांच वर्षों में डिजिटल माध्यम से जुड़ी आतंकी गतिविधियों में तेजी आई है. इसी वजह से सुरक्षा एजेंसियां अब सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड ऐप और क्रिप्टोकरेंसी के जरिए होने वाली संदिग्ध गतिविधियों पर पहले से ज्यादा नजर रख रही हैं.
विशेषज्ञों ने जताई चिंता
सुरक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि अब आतंकवाद और साइबर अपराध एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. डिजिटल प्लेटफॉर्म, एन्क्रिप्टेड ऐप और नई तकनीकों का इस्तेमाल कर युवाओं को गुमराह करने और गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल करने की कोशिश की जा रही है. ऐसे में साइबर सुरक्षा के साथ-साथ लोगों को जागरूक करना भी बेहद जरूरी हो गया है.
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