नीम करोली बाबा ने पूछा- 'कितने पैसे हैं?' फिर उस सवाल ने बदल दी अमेरिकी डॉक्टर की जिंदगी

Neem Karoli Baba Miracle: नीम करोली बाबा से मुलाकात के दौरान अमेरिकी डॉक्टर लैरी ब्रिलियंट से पैसों को लेकर एक सवाल पूछा गया था. बाबा की कही बातों और उस मुलाकात को लैरी ने अपनी जिंदगी का अहम मोड़ बताया.

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Neem Karoli Baba Miracle: उत्तराखंड के कैंची धाम से जुड़ी नीम करोली बाबा की कहानियां आज भी लोगों के बीच आस्था और जिज्ञासा का विषय बनी हुई हैं. इन दिनों बाबा के जीवन पर आधारित फिल्म 'हनुमान अंश' को लेकर भी चर्चा है. इसी बीच बाबा से जुड़े एक ऐसे अमेरिकी डॉक्टर की कहानी सामने आती है, जिसकी जिंदगी में कैंची धाम की एक मुलाकात ने नया मोड़ ला दिया था. यह कहानी है अमेरिकी डॉक्टर और पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञ डॉ. लैरी ब्रिलियंट की, जिन्होंने आगे चलकर भारत में चेचक उन्मूलन के अभियान में काम किया.

कैंची धाम पहुंचे थे डॉ. लैरी ब्रिलियंट

1970 के दशक में डॉ. लैरी ब्रिलियंट अपनी पत्नी और अन्य लोगों के साथ भारत पहुंचे थे. अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उनकी यात्रा उन्हें उत्तर भारत के कैंची आश्रम तक ले गई, जहां उनकी मुलाकात नीम करोली बाबा से हुई. लैरी के अनुसार, जुलाई 1973 में बाबा ने उन्हें दिल्ली जाकर संयुक्त राष्ट्र के साथ काम करने और चेचक के उन्मूलन में मदद करने के लिए कहा था.

लैरी ने अपने इंटरव्यू में बताया कि शुरुआत में उन्होंने इस सलाह को गंभीरता से नहीं लिया. लेकिन बाबा बार-बार उन्हें दिल्ली जाने के लिए कहते रहे. उनके मुताबिक, आखिरकार उन्होंने वहां जाकर विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO के साथ काम करने का रास्ता अपनाया.

दिल्ली जाओ और चेचक के खिलाफ काम करो- बाबा ने कहा

डॉ. लैरी ब्रिलियंट के मुताबिक, नीम करोली बाबा ने उन्हें चेचक जैसी घातक बीमारी को खत्म करने के अभियान से जुड़ने के लिए प्रेरित किया था. लैरी ने बताया कि वह कई बार कैंची आश्रम लौटे, लेकिन बाबा उन्हें फिर दिल्ली जाने के लिए कहते रहे. आखिरकार उन्होंने WHO के साथ काम करना शुरू किया और भारत के चेचक उन्मूलन अभियान का हिस्सा बने.

उस दौर में भारत में चेचक के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जा रहा था. WHO के दस्तावेजों के अनुसार, भारत का intensified National Smallpox Eradication Programme 1973 में शुरू हुआ था, जिसमें निगरानी, संक्रमित मामलों की पहचान और लक्षित टीकाकरण जैसी रणनीतियों पर जोर दिया गया.

'500 डॉलर' वाली बातचीत भी सुनाई थी लैरी ने

नीम करोली बाबा के साथ अपनी मुलाकातों को याद करते हुए लैरी ने एक मजेदार बातचीत का भी जिक्र किया था. उनके अनुसार, बाबा ने उनसे पूछा कि उनके पास कितने पैसे हैं. लैरी ने जवाब दिया कि उनके पास 500 डॉलर हैं. इसके बाद बाबा ने मजाकिया अंदाज में पूछा कि अमेरिका में उनके पास कितने पैसे हैं.

लैरी ने बताया कि बातचीत के दौरान बाबा उनके साथ हंसी-मजाक करते रहे और उन्हें 'डॉक्टर अमेरिका' कहकर संबोधित करते थे. इसी बातचीत में बाबा ने उन्हें संयुक्त राष्ट्र के डॉक्टर के तौर पर काम करने और चेचक के खिलाफ लड़ाई में योगदान देने की बात कही थी. यह पूरा प्रसंग लैरी ने अपने इंटरव्यू में अपनी व्यक्तिगत स्मृति के तौर पर साझा किया था.

भारत में चेचक के खिलाफ बड़ी मुहिम

लैरी ब्रिलियंट जिस दौर में इस अभियान से जुड़े, उस समय भारत में चेचक एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती था. देशभर में संक्रमित लोगों की पहचान, उनके संपर्कों की निगरानी और टीकाकरण पर जोर दिया गया. WHO के रिकॉर्ड के मुताबिक, भारत ने 1970 के दशक में इस अभियान में बड़ी प्रगति की और अप्रैल 1977 तक भारत को चेचक-मुक्त घोषित कर दिया गया था.

यह सफलता केवल किसी एक व्यक्ति के प्रयास का परिणाम नहीं थी. WHO के अनुसार, दुनियाभर में हजारों स्वास्थ्यकर्मियों, स्थानीय टीमों और वैज्ञानिकों के सामूहिक प्रयास से चेचक उन्मूलन अभियान सफल हुआ. भारत में भी बड़ी संख्या में स्वास्थ्यकर्मियों ने घर-घर जाकर बीमारी की निगरानी और टीकाकरण अभियान चलाया.

1980 में दुनिया ने चेचक से आजादी का ऐलान किया

चेचक का वैश्विक उन्मूलन आधुनिक चिकित्सा इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है. WHO के मुताबिक, दिसंबर 1979 में Global Commission ने चेचक के उन्मूलन को प्रमाणित किया और मई 1980 में World Health Assembly ने आधिकारिक तौर पर दुनिया को चेचक से मुक्त घोषित किया. यह मानव इतिहास में किसी संक्रामक बीमारी के सफल वैश्विक उन्मूलन का पहला मामला था.

डॉ. लैरी ब्रिलियंट के लिए कैंची धाम और नीम करोली बाबा से जुड़ी यादें उनके जीवन के इस महत्वपूर्ण अध्याय का हिस्सा रहीं. उन्होंने अपने इंटरव्यू में इस मुलाकात को अपनी जिंदगी की दिशा बदलने वाले अनुभव के तौर पर याद किया था. हालांकि चेचक के उन्मूलन की वास्तविक सफलता के पीछे दुनियाभर के वैज्ञानिकों, स्वास्थ्यकर्मियों और टीकाकरण अभियानों का सामूहिक योगदान था.

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