Mokama Result: गंगा के दक्षिणी किनारे स्थित मोकामा विधानसभा क्षेत्र को केवल पटना से 85 किलोमीटर की दूरी और उसके भौगोलिक महत्व से नहीं पहचाना जाता, बल्कि यह इलाका दशकों से बिहार की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है. यह स्थान उत्तर बिहार के लिए ‘प्रवेश द्वार’ माना जाता था, क्योंकि लंबे समय तक राजेंद्र सेतु ही वह मार्ग था जो उत्तरी इलाकों को राज्य की राजधानी और दक्षिणी बिहार से जोड़ता था.
1951 में विधानसभा क्षेत्र के रूप में स्थापित मोकामा आज भी राजनीतिक विश्लेषकों और दलों की रणनीति का केंद्र बना रहता है. यह मुंगेर लोकसभा सीट के तहत आता है और अपने जटिल राजनीतिक इतिहास और स्थानीय समीकरणों के कारण हमेशा चर्चाओं में रहता है.
तीन दशक का सत्ता-संघर्ष और राजनीति
मोकामा की राजनीति 1990 के दशक तक आते-आते पूरी तरह प्रभावशाली स्थानीय नेताओं के इर्द-गिर्द घूमने लगी थी. उस दौर में दिलीप कुमार सिंह, जिन्हें लोग ‘बड़े सरकार’ के नाम से जानते थे, चुनावी मैदान के सबसे मजबूत दावेदार माने जाते थे. उन्होंने 1990 और 1995 में जनता दल के टिकट पर जीत हासिल की और राज्य सरकार में मंत्री भी रहे.
लेकिन 2005 आते-आते मोकामा की राजनीतिक दिशा बदलने लगी. इसी समय इस क्षेत्र में उभरे अनंत सिंह, जिन्हें उनके समर्थक ‘छोटे सरकार’ के नाम से पहचानते हैं. पिछले दो दशकों में उनकी पकड़ इतनी मजबूत हो गई कि यह सीट लगभग उनका राजनीतिक गढ़ बन गई.
अनंत सिंह का उतार-चढ़ाव भरा सफर
अनंत सिंह ने 2005 में पहली बार जदयू के टिकट पर चुनाव जीता और इसके बाद लगातार जीत दर्ज करके एक अलग पहचान बना ली.
हालांकि 2022 में एक आपराधिक मामले में दोष सिद्ध होने के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द हो गई. लेकिन तब भी लोगों का भरोसा अनंत सिंह परिवार से नहीं टूटा.
नीलम देवी की जीत ने फिर जताया भरोसा
2022 के उपचुनाव में राजद ने अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी को टिकट दिया. उन्होंने BJP की सोनम देवी को बड़े अंतर से पराजित किया और यह संकेत दिया कि मोकामा में अनंत सिंह का प्रभाव अभी भी अडिग है.
नतीजे से पहले मोकामा फिर सुर्खियों में
जदयू ने इस बार भी अनंत सिंह पर विश्वास जताया है और उनके समर्थक पहले से ही उत्साहित दिख रहे हैं. कुछ क्षेत्रों में तो उनके कार्यकर्ताओं ने जीत का जश्न मनाने की तैयारी भी शुरू कर दी है.
लेकिन मुकाबला आसान नहीं है. राज्य में विपक्ष, खासकर महागठबंधन की तरफ से उम्मीदवार वीणा देवी, इस बार एक मजबूत चुनौती पेश कर सकती हैं. यह तय है कि मुकाबला काफी करीबी रहने वाला है.
जातीय समीकरण: भूमिहार प्रभाव
मोकामा सीट पर भूमिहार समाज की पकड़ हमेशा मजबूत रही है, लेकिन यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि चुनाव केवल एक ही जाति के आधार पर तय होते हैं. यहां यादव, राजपूत, पासवान, कुर्मी सहित कई समुदायों की मौजूदगी है और चुनावी नतीजे कई बार अप्रत्याशित रहे हैं.
अनंत सिंह का लगातार चुनाव जीतना इस बात का प्रमाण है कि व्यक्तिगत छवि, क्षेत्र में पकड़ और सामाजिक संबंध यहां अकसर जातीय गणित को पीछे छोड़ देते हैं.
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