भारत के इस हथियार से अमेरिका में मच गई थी खलबली, अचानक बजने लगे थे खुफिया एजेंसियों के फोन

America On India ASAT Test: मार्च 2019 में भारत ने जब ‘मिशन शक्ति’ के तहत अंतरिक्ष में एक सैटेलाइट को एंटी-सैटेलाइट मिसाइल से मार गिराया था, तब अमेरिका को इसकी पूरी जानकारी पहले से नहीं थी.

Mission Shakti US former intelligence officer reveals secure phones suddenly started ringing
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America On India ASAT Test: मार्च 2019 में भारत ने जब ‘मिशन शक्ति’ के तहत अंतरिक्ष में एक सैटेलाइट को एंटी-सैटेलाइट मिसाइल से मार गिराया था, तब अमेरिका को इसकी पूरी जानकारी पहले से नहीं थी. अब पूर्व अमेरिकी खुफिया अधिकारी डेविड ग्रश ने उस समय का अनुभव साझा किया है. उन्होंने बताया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को पता था कि भारत मिसाइल टेस्ट करने वाला है, लेकिन उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि यह एंटी-सैटेलाइट टेस्ट होगा.

ग्रश ने यह बात पॉडकास्टर जो रोगन के साथ बातचीत में बताई. उस समय वह अमेरिकी नेशनल रिकॉनिसेंस ऑफिस (NRO) के ऑपरेशन सेंटर में तैनात थे. उनके मुताबिक, टेस्ट की जानकारी सामने आने के बाद अमेरिकी खुफिया अधिकारियों के बीच तुरंत हलचल शुरू हो गई और सैटेलाइट से बने मलबे को लेकर भी चिंता बढ़ गई.

टेस्ट की खबर मिलते ही बजने लगे सिक्योर फोन

डेविड ग्रश ने बताया कि उनके ऑफिस में कई सिक्योर फोन थे और टेस्ट के बाद उन्होंने तुरंत अलग-अलग अधिकारियों और नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास से संपर्क करना शुरू किया. उनका कहना था कि अमेरिकी एजेंसियों को इस बात का अंदाजा नहीं था कि भारत इतना बड़ा एंटी-सैटेलाइट टेस्ट करने वाला है.

हालांकि, भारत ने ओडिशा के तट के पास मिसाइल टेस्ट के लिए पहले ही NOTAM जारी किया था. इसका मतलब था कि अमेरिका को मिसाइल परीक्षण की जानकारी थी, लेकिन यह पता नहीं था कि इसका निशाना अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 मार्च 2019 को देश को संबोधित कर मिशन की सफलता की जानकारी दी थी.

ग्रश के मुताबिक, टेस्ट के बाद NRO के अधिकारी यह पता लगाने में जुट गए कि सैटेलाइट के टुकड़े किस दिशा में जा रहे हैं और क्या किसी अमेरिकी सैटेलाइट को अपना रास्ता बदलना पड़ सकता है.

क्या था मिशन शक्ति?

27 मार्च 2019 को भारत ने ओडिशा के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से ‘मिशन शक्ति’ के तहत एंटी-सैटेलाइट मिसाइल का परीक्षण किया था. DRDO की ओर से विकसित इंटरसेप्टर मिसाइल ने लो अर्थ ऑर्बिट में मौजूद भारतीय सैटेलाइट को ‘हिट-टू-किल’ तकनीक से नष्ट किया था. इस परीक्षण के साथ भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद सैटेलाइट को मार गिराने की क्षमता दिखाने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया.

इस मिशन में जिस सैटेलाइट को निशाना बनाया गया था, वह Microsat-R था. इसे करीब 300 किलोमीटर की ऊंचाई वाली निचली कक्षा में रखा गया था. भारत ने इस ऊंचाई को इसलिए चुना था ताकि परीक्षण से बना मलबा ज्यादा समय तक अंतरिक्ष में न रहे और धीरे-धीरे पृथ्वी के वायुमंडल में वापस आ जाए.

सैटेलाइट के मलबे को लेकर अमेरिका को थी चिंता

सैटेलाइट के नष्ट होने के बाद उसके कई टुकड़े अंतरिक्ष में फैल गए थे. अमेरिकी सैन्य सेंसरों ने इस मलबे को ट्रैक करना शुरू किया. रिपोर्टों के मुताबिक, शुरुआती दौर में कम से कम 270 टुकड़ों को ट्रैक किया गया था. अमेरिका की चिंता यह थी कि इनमें से कोई टुकड़ा दूसरे सैटेलाइट या अंतरिक्ष में मौजूद किसी महत्वपूर्ण सिस्टम के लिए खतरा न बन जाए.

डेविड ग्रश ने भी बताया कि NRO में सबसे बड़ी चिंता मलबे को लेकर थी, क्योंकि अमेरिका के जासूसी सैटेलाइट अंतरिक्ष में काम करते हैं. उन्होंने कहा कि उस समय ऑर्बिटल एनालिस्ट से मलबे की दिशा और संभावित खतरे की जानकारी जुटाई गई थी.

भारत ने उस समय कहा था कि मिशन को जानबूझकर निचली कक्षा में किया गया, ताकि मलबा कुछ ही हफ्तों में नीचे आकर खत्म हो जाए. विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा था कि भारत का मकसद अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ शुरू करना नहीं है.

मिशन शक्ति से दुनिया को मिला बड़ा संदेश

मिशन शक्ति भारत के लिए अंतरिक्ष सुरक्षा के लिहाज से एक अहम तकनीकी उपलब्धि थी. इस परीक्षण ने दिखाया कि भारत के पास अंतरिक्ष में किसी सैटेलाइट को इंटरसेप्ट करने और नष्ट करने की क्षमता मौजूद है. सरकार ने उस समय इसे भारत की अंतरिक्ष संपत्तियों की सुरक्षा से जुड़ी तकनीकी क्षमता के प्रदर्शन के तौर पर बताया था.

डेविड ग्रश का हालिया बयान यह जरूर बताता है कि अमेरिका को मिसाइल परीक्षण की जानकारी होने के बावजूद उसके वास्तविक उद्देश्य का पहले से पता नहीं था. टेस्ट की घोषणा के बाद अमेरिकी खुफिया तंत्र ने तुरंत हालात का आकलन किया और अंतरिक्ष में फैले मलबे पर नजर रखनी शुरू कर दी.

मिशन शक्ति के करीब सात साल बाद सामने आया ग्रश का यह अनुभव 2019 के उस परीक्षण की संवेदनशीलता को एक बार फिर चर्चा में ले आया है. उस समय भारत ने पहली बार खुले तौर पर अपनी एंटी-सैटेलाइट क्षमता का प्रदर्शन किया था और इसके साथ ही वह उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया था, जिनके पास यह तकनीक है.

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