ऑनलाइन शॉपिंग करने वालों के लिए केंद्र सरकार एक अहम बदलाव लाने जा रही है. जल्द ही जब आप किसी ई-कॉमर्स साइट पर कोई प्रोडक्ट सर्च करेंगे, तो उसके साथ यह जानकारी भी साफ तौर पर दिखेगी कि वह सामान किस देश में बना है. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने लीगल मेट्रोलॉजी (पैकेज्ड कमोडिटीज) नियमों में संशोधन का प्रस्ताव लाया है, जिसके तहत सभी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स को ‘कंट्री ऑफ ओरिजिन’ फिल्टर देना अनिवार्य होगा. यह नियम अगर पास होता है, तो 2026 से लागू हो सकता है.
मंत्रालय ने सोमवार, 10 नवंबर को बताया कि नया बदलाव 2011 के लीगल मेट्रोलॉजी रूल्स में संशोधन के जरिए लागू किया जाएगा. दरअसल, फिलहाल पैकेज्ड प्रोडक्ट्स पर कंट्री ऑफ ओरिजिन लिखना जरूरी तो है, लेकिन ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर यह जानकारी उपभोक्ताओं के लिए आसानी से सर्चेबल नहीं होती. अब हर ई-कॉमर्स कंपनी को अपनी वेबसाइट या ऐप पर ओरिजिन फिल्टर लगाना होगा ताकि ग्राहक आसानी से तय कर सकें कि वे ‘मेड इन इंडिया’ प्रोडक्ट खरीदना चाहते हैं या इम्पोर्टेड आइटम.
मंत्रालय का नया ड्राफ्ट: पारदर्शिता और उपभोक्ता सशक्तिकरण पर जोर
उपभोक्ता मंत्रालय ने लीगल मेट्रोलॉजी (पैकेज्ड कमोडिटीज) (सेकंड) अमेंडमेंट रूल्स, 2025 का ड्राफ्ट जारी किया है. इसके मुताबिक हर ई-कॉमर्स एंटिटी, जो इम्पोर्टेड सामान बेचती है, उसे कंट्री ऑफ ओरिजिन फिल्टर देना होगा. यह फिल्टर सर्चेबल और सॉर्टेबल होंगे, ताकि ग्राहक स्थानीय और विदेशी उत्पादों में से अपनी पसंद के अनुसार चयन कर सकें. इससे उपभोक्ताओं को विस्तृत प्रोडक्ट लिस्टिंग्स में समय बचाने और जानकारी आधारित निर्णय लेने में मदद मिलेगी.
क्यों जरूरी पड़ा ये कदम
भारत का ई-कॉमर्स सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है. 2025 तक इसका आकार 3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है. लेकिन उपभोक्ताओं की शिकायत रही है कि उन्हें अक्सर यह पता नहीं चलता कि कोई प्रोडक्ट ‘मेड इन इंडिया’ है या विदेशी. कई बार उपभोक्ता ‘मेड इन इंडिया’ प्रोडक्ट्स खरीदना चाहते हैं, पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर यह जानकारी ढूंढना मुश्किल होता है. मंत्रालय का मानना है कि इससे विदेशी उत्पादों को अनावश्यक बढ़त मिलती है और स्थानीय निर्माताओं को नुकसान होता है. यही वजह है कि सरकार ने डिजिटल मार्केट में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए यह कदम उठाया है.
“ये कदम आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा फैसला”
सरकार का कहना है कि यह नियम ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों को नई मजबूती देगा. उपभोक्ताओं के लिए: अब वे आसानी से ‘मेड इन इंडिया’ प्रोडक्ट्स फिल्टर कर पाएंगे. निर्माताओं के लिए: घरेलू कंपनियों को विदेशी ब्रांड्स के बराबर प्लेटफॉर्म मिलेगा. सरकार के लिए: अब ‘फेक ओरिजिन’ दावे या नियमों के उल्लंघन की जांच ऑटोमेटेड होगी. एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, “यह फीचर कंज्यूमर ट्रस्ट बढ़ाएगा और डिजिटल इकोसिस्टम को ज्यादा कंप्लायंट और कॉम्पिटिटिव बनाएगा.”
एक्सपर्ट्स बोले “लोकल ब्रांड्स की बिक्री बढ़ेगी”
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव छोटे और स्थानीय ब्रांड्स के लिए बेहद फायदेमंद साबित होगा. “अगर यह फिल्टर लागू हो गया, तो ‘मेड इन इंडिया’ प्रोडक्ट्स की विजिबिलिटी बढ़ेगी और उनकी सेल्स में 20-30% तक का इजाफा संभव है,” एक्सपर्ट्स का अनुमान है.
प्लेटफॉर्म्स को करने होंगे टेक्निकल बदलाव
अमेजन, फ्लिपकार्ट और मिंत्रा जैसे बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स को अब अपने सिस्टम में तकनीकी बदलाव करने होंगे ताकि ग्राहक कंट्री ऑफ ओरिजिन के आधार पर प्रोडक्ट्स फिल्टर कर सकें. हालांकि कंपनियों के लिए यह चुनौतीपूर्ण होगा, लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया है कि ये बदलाव राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जुड़े हैं और इन्हें लागू करना जरूरी होगा.
दूसरी बड़ी कार्रवाई: ई-कॉमर्स कंपनियों पर ‘डार्क पैटर्न’ की जांच
सरकार ने हाल ही में ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर कैश ऑन डिलीवरी (COD) ऑर्डर्स पर एक्स्ट्रा चार्ज वसूलने के मामले में जांच शुरू की है. उपभोक्ता मामलों के मंत्री प्रह्लाद जोशी ने बताया कि COD पर अतिरिक्त शुल्क लगाना एक तरह का ‘डार्क पैटर्न’ है, और इस पर सख्त कार्रवाई की जाएगी. साथ ही रिपोर्ट्स के मुताबिक, 75% ग्राहकों ने शिकायत की है कि ई-कॉमर्स साइट्स पर उन्हें पहले कम कीमत दिखाई गई, लेकिन ऑर्डर फाइनल करते समय प्राइस बढ़ जाती है.
उपभोक्ता हितों की दिशा में सरकार का फोकस
पिछले कुछ महीनों से उपभोक्ता मंत्रालय लगातार डिजिटल मार्केट की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर जोर दे रहा है. चाहे बात ‘डार्क पैटर्न्स’ रोकने की हो या ‘कंट्री ऑफ ओरिजिन’ की जानकारी देने की— सरकार का मकसद है कि ग्राहक का भरोसा बना रहे और हर खरीदारी में उसे पूरी जानकारी मिले.
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