नई दिल्ली: भारतीय सेना के पश्चिमी कमान प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार ने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम को लेकर एक अहम और स्पष्ट बयान दिया है. उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल दो देशों के बीच का सैन्य टकराव नहीं था, बल्कि एक ऐसा युद्ध था, जो नैतिक जिम्मेदारी और मानवता की रक्षा के लिए लड़ा गया.
एक निजी टीवी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में लेफ्टिनेंट जनरल कटियार ने कहा कि उस समय भारत के सामने हस्तक्षेप के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था. हालात ऐसे थे कि चुप रहना न सिर्फ रणनीतिक गलती होती, बल्कि नैतिक रूप से भी गलत साबित होता.
‘पूर्वी पाकिस्तान में हो रहा था संगठित नरसंहार’
लेफ्टिनेंट जनरल कटियार ने कहा कि 1971 से पहले पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना द्वारा की जा रही हिंसा को सामान्य युद्ध की कार्रवाई नहीं कहा जा सकता. उनके अनुसार यह एक सुनियोजित और संगठित नरसंहार था, जिसमें आम नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा था.
उन्होंने इस हिंसा की तुलना होलोकॉस्ट से भी अधिक भयावह बताते हुए कहा कि उस दौर में पूरी दुनिया लगभग आंखें मूंदे बैठी थी. लाखों लोगों के विस्थापन, हत्याएं और अमानवीय अत्याचार अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निष्क्रियता को उजागर करते हैं.
‘अगर भारत चुप रहता, तो वह नैतिक पतन होता’
क्या भारत उस समय मूकदर्शक बना रह सकता था? इस सवाल पर लेफ्टिनेंट जनरल कटियार ने साफ शब्दों में कहा कि ऐसा करना भारत के मूल्यों के खिलाफ होता. उन्होंने कहा कि अगर भारत ने हस्तक्षेप नहीं किया होता, तो यह सिर्फ कूटनीतिक विफलता नहीं, बल्कि नैतिक पतन भी होता.
उन्होंने भावुक अंदाज में बताया कि हजारों बांग्लादेशी महिलाओं को पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा अमानवीय यातनाओं का सामना करना पड़ा. ऐसे समय में अन्याय के सामने मौन रहना भी अधर्म के समान होता है, और भारत ने ऐसा करने से इनकार किया.
1948 का कश्मीर युद्ध और पाकिस्तानी रणनीति
अपने बयान में लेफ्टिनेंट जनरल कटियार ने 1948 के भारत–पाक युद्ध का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि उस समय पाकिस्तानी सैनिक कबायली लड़ाकों के भेष में कश्मीर में दाखिल हुए थे.
उन्होंने बताया कि उस दौरान आम नागरिकों के खिलाफ हत्या, लूटपाट और अत्याचार की कई घटनाएं सामने आईं, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए अस्वीकार्य हैं. इसके विपरीत, भारतीय सेना ने सीमित संसाधनों के बावजूद कश्मीर के नागरिकों की रक्षा को अपना प्राथमिक दायित्व माना और मानवीय मूल्यों का पालन किया.
1971: जब धर्मयुद्ध अपने चरम पर था
लेफ्टिनेंट जनरल कटियार के अनुसार 1971 का युद्ध भारतीय इतिहास में धर्मयुद्ध का सबसे स्पष्ट उदाहरण है. उन्होंने कहा कि उस समय पूर्वी पाकिस्तान में हजारों निर्दोष लोगों की जान जा रही थी और अंतरराष्ट्रीय मंच पर लगभग चुप्पी छाई हुई थी.
उनका कहना था कि जब कोई समाज बुराई और अपराध के सामने खड़ा नहीं होता, तो अंततः उसकी आत्मा को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है. भारत ने उस कीमत को चुकाने से इनकार किया और इतिहास की दिशा बदल दी.
93 हजार युद्धबंदी और भारत की उदारता
1971 के युद्ध के बाद 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों के आत्मसमर्पण को याद करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल कटियार ने कहा कि यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य सरेंडर था.
उन्होंने बताया कि भारत ने इन युद्धबंदियों के साथ अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पूरी तरह पालन किया. उन्हें चिकित्सा सुविधाएं दी गईं और मानवीय व्यवहार किया गया. शिमला समझौते के जरिए भारत ने बदले की भावना की बजाय शांति और स्थिरता का रास्ता चुना, जिसे उन्होंने दुनिया के सबसे उदार शांति समझौतों में से एक बताया.