Rajnath Singh On Sindh: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान को अप्रत्यक्ष लेकिन बेहद स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ कभी भी स्थायी नहीं होतीं और भविष्य में परिस्थितियों के बदलने पर “सिंध का भारत में पुनः शामिल होना संभव है.” वे रविवार को सिंधी समुदाय के एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में बोल रहे थे, जहाँ उन्होंने इतिहास, संस्कृति, विभाजन और भारतीयता के संदर्भ में सिंध और सिंधी समाज की महत्ता पर विस्तृत चर्चा की.
अपने संबोधन के दौरान उन्होंने कहा कि भारत विभाजन के समय सिंधु नदी का बड़ा भूभाग पाकिस्तान में चला गया और पूरा सिंध प्रांत भी उससे अलग हो गया. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही वर्तमान भू-सीमाओं में परिवर्तन हुआ हो, लेकिन सिंध, सिंधी संस्कृति और सिंधी समाज का भारतीय पहचान में स्थान आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना सदियों पहले हुआ करता था.
Defence Minister Rajnath Singh says, "...Today, the land of Sindh may not be a part of India, but civilisationally, Sindh will always be a part of India. And as far as land is concerned, borders can change. Who knows, tomorrow Sindh may return to India again..."
— Vikrant (@Vikspeaks1) November 23, 2025
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख
राजनाथ सिंह ने अपने भाषण में 2005 के उस ऐतिहासिक फैसले को भी याद किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने भारत के राष्ट्रगान से “सिंध” शब्द हटाने की याचिका खारिज कर दी थी. उन्होंने समझाते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने यह मानते हुए याचिका अस्वीकार की थी कि “सिंध” को केवल भौगोलिक क्षेत्र के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह शब्द भारतीय संस्कृति, इतिहास और पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है.
उनके अनुसार, यह निर्णय इस बात का प्रतीक है कि सिंधी समुदाय का योगदान केवल एक क्षेत्रीय पहचान भर नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की निरंतरता और सांस्कृतिक प्रवाह का अहम हिस्सा है.
भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग
अपने संबोधन में रक्षा मंत्री ने सिंधी समुदाय को भारत की सांस्कृतिक आत्मा और विविधता का प्रतीक बताया. उन्होंने कहा कि सिंधी समाज केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि एक ऐसी विरासत है जिसकी जड़ें हजारों साल पुरानी भारतीय परंपरा में गहराई से जुड़ी हुई हैं. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सिंध और सिंधी परंपराएँ प्राचीन सनातन संस्कृति से जुड़ी रही हैं और इसके कई तत्वों का स्रोत भगवान राम के कालखंड से जोड़कर देखा जाता है.
राजनाथ सिंह ने कहा कि सिंधी समाज की अपनी भाषा, साहित्य, कला और अध्यात्मिक परंपराएँ भारतीय सभ्यता को समृद्ध बनाती हैं. चाहे संतों की काव्य-परंपरा हो, सिंधी भाषा की मधुरता या फिर उनकी कला का जीवंत सौंदर्य, इन सभी ने भारतीय सांस्कृतिक धरोहर में विशिष्ट स्थान बनाया है.
विभाजन के दर्द और सिंधियों की दृढ़ता का सम्मान
राजनाथ सिंह ने अपने भाषण में 1947 के विभाजन की त्रासदी का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि विभाजन का दौर सिंधी समाज के लिए सबसे कठिन समय था. अपनी जन्मभूमि छोड़ना और नए सिरे से जीवन शुरू करना किसी भी समुदाय के लिए सरल नहीं होता. लेकिन सिंधी समाज ने उस कठिन समय में भी धैर्य, साहस और दृढ़ता का परिचय दिया.
उन्होंने बताया कि भारत आने के बाद सिंधी समुदाय ने केवल अपने अस्तित्व को ही नहीं बचाया, बल्कि व्यापार, उद्योग, शिक्षा, कला, आध्यात्मिकता, समाजसेवा और उद्यमिता के क्षेत्रों में इतना बड़ा योगदान दिया कि वे देश के सर्वाधिक सफल, मेहनती और अनुशासित समुदायों में गिने जाते हैं.
भारतीय एवं वैश्विक मंच पर सिंधियों की पहचान
रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि आज दुनिया के कई देशों में बसे सिंधी लोग अपनी कार्यकुशलता, व्यापारिक समझ, शिक्षा और प्रतिभा के कारण सम्मानित स्थान रखते हैं. उन्होंने इस बात की सराहना की कि दुनिया में कहीं भी रहने के बावजूद सिंधी समाज ने अपनी सांस्कृतिक पहचान, भाषा और परंपराओं को सुरक्षित रखा है.
राजनाथ सिंह के अनुसार, सिंधी समाज की यही विशेषता है कि वह अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहकर भी आधुनिकता अपनाने में आगे है, भारत की विविध और समृद्ध परंपराओं का वास्तविक प्रतिनिधित्व करती है.
संदेश पाकिस्तान को, गर्व सिंधी समाज को
कार्यक्रम के दौरान राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान को यह स्पष्ट संकेत दिया कि इतिहास के घटनाक्रम बदलते देर नहीं लगती और सीमाएँ हमेशा स्थायी नहीं रहतीं. उन्होंने कहा कि भविष्य में परिस्थितियों के बदलने पर भारत और सिंध का सांस्कृतिक जुड़ाव भौगोलिक रूप से भी फिर से प्रकट हो सकता है. यह बयान भले ही राजनीतिक और कूटनीतिक संदर्भों से जुड़ा हो, लेकिन कार्यक्रम में उपस्थित सिंधी समाज के लोगों ने इसे सामरिक आत्मविश्वास और सांस्कृतिक सम्मान के रूप में देखा.
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