ईरान जंग के बीच भारत पर गहराया तेल संकट का खतरा, बैकअप स्टॉक भी हो रहे खत्म, अब क्या बचा है रास्ता?

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब भारत और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर साफ दिखाई देने लगा है. सबसे ज्यादा असर कच्चे तेल की आपूर्ति पर पड़ा है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही में भारी कमी आई है.

Iran war Oil LPG Crisis In India Backup stock is running out Due To Hormuz Closure
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब भारत और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर साफ दिखाई देने लगा है. सबसे ज्यादा असर कच्चे तेल की आपूर्ति पर पड़ा है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही में भारी कमी आई है. यह मार्ग दुनिया के बड़े हिस्से में तेल सप्लाई का मुख्य रास्ता है, और यहां आई बाधा ने एशियाई देशों के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुरुआत में भारत और चीन ने समुद्र में मौजूद तेल भंडार, रूस से अतिरिक्त खरीद और कुछ अस्थायी उपायों के जरिए स्थिति को संभालने की कोशिश की थी, लेकिन अब ये विकल्प तेजी से खत्म होते जा रहे हैं. ऐसे में बफर स्टॉक भी घटने लगे हैं और संकट गहराने के संकेत मिल रहे हैं.

शुरुआती राहत खत्म, अब सीमित विकल्प

शुरुआत में रिफाइनरियों ने उन तेल टैंकरों का इस्तेमाल किया जो पहले से समुद्र में मौजूद थे. लेकिन अब यह विकल्प लगभग खत्म हो चुका है. उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, फ्लोटिंग स्टोरेज में रखा रूसी कच्चा तेल फरवरी के मध्य में करीब 20 मिलियन बैरल था, जो अब घटकर 5 मिलियन बैरल से भी कम रह गया है.

इसका सीधा असर रिफाइनरियों की क्षमता पर पड़ रहा है, क्योंकि अब उनके पास तुरंत खरीद के सीमित विकल्प ही बचे हैं.

एलपीजी और डीजल पर असर की आशंका

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर काफी हद तक निर्भर है, खासकर कच्चे तेल और रसोई गैस (एलपीजी) के लिए. मौजूदा हालात में इन सप्लाई लाइनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है.

होर्मुज क्षेत्र से गुजरने की कोशिश कर रहे भारतीय जहाजों पर हमले की घटनाओं के बाद खाड़ी क्षेत्र में खाली टैंकर भेजने की योजना फिलहाल रोक दी गई है. इस मुद्दे को भारत सरकार ने ईरान के सामने कूटनीतिक स्तर पर उठाया है.

इसका असर घरेलू बाजार पर भी पड़ सकता है. करीब चार साल बाद डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है. साथ ही, कमजोर रुपया और महंगा आयात महंगाई को और बढ़ा सकता है.

ईरानी तेल का रास्ता भी बंद

भारत के लिए ईरान से तेल आयात एक अहम विकल्प था, लेकिन अब वह भी लगभग बंद हो गया है. अमेरिका द्वारा दी गई अस्थायी छूट समाप्त होने के बाद प्रतिबंध फिर से लागू हो गए हैं, जिससे ईरानी तेल की सप्लाई रुक गई है.

इससे भारत के पास उपलब्ध विकल्प और भी सीमित हो गए हैं.

चीन की स्थिति थोड़ी बेहतर

चीन के पास भारत के मुकाबले बड़ा रणनीतिक भंडार है, जो 1 अरब बैरल से अधिक बताया जाता है. इस कारण वह फिलहाल कुछ हद तक इस संकट का सामना कर पा रहा है.

फिर भी अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, होर्मुज में तनाव के चलते वैश्विक तेल आपूर्ति में करीब 10% तक गिरावट दर्ज की गई है, जिससे आने वाले समय में चीन पर भी दबाव बढ़ सकता है.

महंगा तेल और घटती सप्लाई

अब बाजार में वह कच्चा तेल भी ऊंची कीमतों पर बिक रहा है, जो पहले सस्ते में उपलब्ध होता था. इसमें रूसी तेल भी शामिल है.

रिफाइनरियों के सामने दोहरी चुनौती है- एक तरफ महंगा कच्चा तेल और दूसरी तरफ सीमित सप्लाई. इसका असर उत्पादन लागत पर पड़ रहा है, जो आगे चलकर आम लोगों तक पहुंच सकता है.

आगे क्या हो सकते हैं विकल्प

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर होर्मुज संकट लंबे समय तक बना रहता है, तो भारत को घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए कुछ कड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं. इसमें पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर नियंत्रण और वैकल्पिक देशों से आयात बढ़ाना शामिल हो सकता है.

संभावना यह भी जताई जा रही है कि भारत को अमेरिका जैसे देशों से तेल आयात बढ़ाना पड़े, ताकि सप्लाई की कमी को कुछ हद तक पूरा किया जा सके.

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