The JC Show: पश्चिम एशिया में जारी हालातों के बीच में आज सवाल सिर्फ सीजफायर को लेकर नहीं लेकिन सवाल यह है कि आखिर सीजफायर बार-बार क्यों टूट रहा है? एक तरफ दुनिया के बड़े देश शांति की बातें करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ जमीन पर बारूद अब भी जल रहा है. लेकिन इसी बीच में भारत ने वो करके दिखाया जो कोई भी ताकतवर देश नहीं कर पाया. जब तनाव अपने चरम पर था तब जब स्ट्रेट ऑफ हार्मोज जैसे संवेदनशील समुद्री रास्ते पर खतरा मंडरा रहा था तब भारत के टैंकर तिरंगा लहराते हुए वहां से सुरक्षित बाहर निकल रहे थे. यह सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं था. यह डिप्लोमेटिक मास्टर स्ट्रोक था. सवाल यह है क्या भारत ने दुनिया को यह दिखा दिया कि असली ताकत सिर्फ हथियारों से नहीं बल्कि रणनीति और संतुलन से आती है. लेकिन तस्वीर का एक दूसरा पहलू है जो खतरनाक है. सीज फायर की घोषणा के बाद जब उम्मीद जगी लेकिन फिर सीज फायर लड़खड़ाने लगता है. तो क्या यह शांति की कोशिश सिर्फ एक पॉलिटिकल नैरेटिव है या फिर जमीन पर हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि अब यह कंट्रोल से बाहर हो चुके हैं और सबसे बड़ा सवाल यह है क्या भारत अपने हित सुरक्षित रखने के साथ-साथ आने वाले समय में ग्लोबल पीसमेकर की भूमिका निभाता हुआ नजर आएगा. बाकी देश क्यों असफल हो रहे हैं? क्या इंटरनेशनल पावर बैलेंस बदल रहा है? और क्या यह एक लंबे संघर्ष की शुरुआत है? आज इन तमाम पहलुओं को हम समझने की कोशिश करेंगे द जेसी शो में और हमारे साथ मौजूद है भारत 24 के सीईओ और एडिटर इन चीफ और साथ ही फर्स्ट इंडिया के सीएमडी और
सवाल: क्यों लड़खड़ा रहा है सीज फायर? लेकिन भारत में मोदी पर पूरा भरोसा. इसके मायने क्या है?
जवाब :पहला पार्ट है कि क्यों लड़खड़ा रहा है ये सीज फायर? तो बेसिक रीजन है ट्रस्ट डेफिसिट एक दूसरे पर दूसरे को भरोसा आपस में नहीं है. आज वार्ता है इस्लामाबाद में वार्ता से पहले ही लड़खड़ाना नहीं केवल बल्कि मैं कहूंगा कि दम तोड़ रहा है सीज फायर. कोई संभावना नहीं कि किसी आम सहमति पे आज का यह समझौता पहुंचे. ईरान ने दो टूक कह दिया है. जब तक लेबनान को इस नेगोशिएशन में शामिल नहीं किया जाता वार्ता नहीं होगी. और अगर वार्ता दबाव में हो भी जाती है तो उसका कोई परिणाम नहीं निकलेगा. ट्रंप दूसरी तरफ कह रहे हैं कि अगर डील नहीं हुई तो फिर भीषण हमले होंगे. तो आज की जो वार्ता की शुरुआत है वो जिसे मिस ट्रस्ट कहते हैं जो ट्रस्ट डेफिसिट है उसके माहौल में हो रही है. इसलिए मैं केवल इतना नहीं कहूंगा कि लड़खड़ा रहा है. मैं कहूंगा कि यह अंतिम सांसे गिन रहा है और यह सीजफायर दम तोड़ने की स्थिति में है. दूसरा प्रश्न आपका है कि मोदी पे भारत में हर किसी को भरोसा. तो फैक्ट है संसार के सारे क्राइसिस के बावजूद भारत में स्थितियां सामान्य रही और इसका एक ही कारण रहा नरेंद्र मोदी की लीडरशिप. उन्होंने मोटे तौर पर दो बातें की. एक तो कहा सप्लाई चैन नहीं टूटने देंगे. फिर एक कहा सिटीजन फर्स्ट उनकी सेफ्टी फर्स्ट है यहां पे जो है. तीसरा क्या है कि पूरे मंत्रिमंडल को अफसरों को उस काम में लगाया. हर रोज दो घंटे खुद मॉनिटरिंग करते हैं. कुल मिला के वो सारे ऑपरेशन को इस तरह से डील कर रहे हैं जैसे घर का कोई व्यक्तिगत काम हो. इंडिविजुअल काम हो जिसके प्राइम मिनिस्टर फॉलो कर रहा हो. इसलिए पूरे देश का नरेंद्र मोदी में अटूट भरोसा है. उस भरोसे की पुनरावृति इस क्राइसिस में भी एक बार फिर से देखने को मिली.
सवाल: आई हैव अ फ्यू क्वेश्चंस हियर. फर्स्ट इज ट्रंप ट्राइंग टू रिगेन ह लॉस्ट प्रेस्टीज इन दिस वॉर. और ऐसा लग रहा है कि ट्रंप किसी ना किसी बहाने से इस युद्ध को दोबारा शुरू करना चाहते हैं क्योंकि एक तरफ तो वो इजराइल को कह रहे हैं कि हां लेबनन पे अटैक करो. और दूसरी तरफ वो बात कर रहे हैं कि हम नेगोशिएशनंस करते हैं. व्हाट इज इट ऑल अबाउट सर?
जवाब: यू आर अब्सोलुटली करेक्ट. यू आर करेक्ट ऑन ऑल द टू पॉइंट्स. फर्स्ट है ही इस ट्राइंग टू रीगे एनी लॉस्ट प्रेस्टीज और रेपुटेशन. एक सारे संसार में मैसेज चला गया है कि ट्रंप हार गया है. ईरान जीत गया है. दूसरा ये है कि जैसे ऑपरेशन सिंदूर में नरेंद्र मोदी के मन में कसक रह गई थी. एक बार और ठोकना है. मौका आने दो. गलती करने दो उनको. वही कसक अब ट्रंप के मन में है कि संसार में जो मैसेज चला गया हारा हुआ ट्रंप जीता हुआ ईरान इसको रिवर्स करना चाहते हैं वो इसलिए मौके की तलाश में है और आप देखिए कि शांति वार्ता शुरू होने से पहले ही लोगों को वो धमका रहे हैं तो ये फैक्ट है किसी न किसी बहाने से एक फिर मौका लेना चाहते हैं युद्ध को ऐसे निर्णायक मोड़ पे ले जाना चाहते हैं जहां ये इमेज बने सारे संसार में कि ट्रंप है विजेता ना कि ईरान सो लेट्स सी व्हाट कम्स आउट.
सवाल: आज की वार्ता में ऐसी कौन सी तीन बड़ी शर्तें हैं जो अमेरिका और ईरान के बीच में हो सकती हैं या होने वाली हैं अमेरिका की तरफ से या ईरान की तरफ से?
जवाब: बेसिक इशू यह है अमेरिका का दो टू मैसेज यह है कि लेबनान इसका पार्ट नहीं है. सीजफायर उस पे लागू नहीं होगा. दूसरा वो जो खाड़ी है उसको आप खोलिए. तीसरा जो है आपका परमाणु जो है ना सारे कार्यक्रम आप खत्म करिए. मोटी बात उनकी तरफ से यह है. ईरान वाले दूसरी बात कह रहे हैं. वो कह रहे हैं पहले लेबनान को हमारे साथ बैठाइए. हमारा जो नुकसान हुआ है आर्थिक उसकी क्षतिपूर्ति कीजिए और हमें पक्का भरोसा दीजिए कि इस बार जो समझौता होगा वह कायम होगा उसकी पालना सब लोग करेंगे. तो एक बेसिक डिफरेंस जो है वो ट्रस्ट डेफिसिट या जो कंडीशंस है वो इतनी इतनी कॉन्टरी है आपस में जिसकी उम्मीद बहुत कम है. बट दीज़ आर द टू कंडीशंस ऑन एव्री साइड. इस दोनों कंडीशंस के माहौल में आप देखिए घटनाक्रम आगे कैसे बढ़ता है.
सवाल: ऐसे तनावपूर्ण माहौल में इस्लामाबाद में आज यानी 11 अप्रैल को जो वार्ता हो रही है इसका भविष्य आप क्या देखते हैं?
जवाब: भविष्य देखिए आशावादी होना चाहिए व्यक्ति को. मानवता के हित में शांति के हित में मैं भी आशावादी होना चाहता हूं. लेकिन मन नहीं मान रहा क्योंकि यह जो जड़ है इस समझौते की या जो माहौल है वो इतना तनावपूर्ण है कि हर व्यक्ति पूर्वाग्रह के साथ वहां पर आया है. ऐसे में दोनों पक्षों में कोई समझौता कोई सहमति बने आशा बहुत कम है और सहमति बनी तो उसका जीवन बहुत अस्थाई होगा. कुछ घंटे होगा और उसका एक ही कारण होगा ट्रंप विमिकल ट्रंप. सो दिस इज ऑल.
सवाल: वार्ता शुरू होने से 10 मिनट पहले धमकियों पर धमकियों के सिलसिले को हम देख रहे हैं. तो ट्रंप का ये जो व्यवहार है इसे आप कैसे देखते हैं?
जवाब :ममिकल व्यवहार है. हाईली इरिसिबल व्यवहार है. आप देखिए आप किसी घर में जाते हैं इस्लामाबाद में जिसे इस्लामाबाद डिक्लेरेशन या इस्लामाबाद मीट कह रहे हैं वो लोग जो है दोनों पक्ष आए हैं वहां. इससे पहले कि दोनों पक्ष वार्ता पे बैठे कोई पानी पूछे उनसे चाय पूछे चाय में 10 मिनट लगते हैं. कोई पानी तो पूछे सांस लेने दे. कुर्सी भी ठीक से बैठने दे. अपनी जगह पे कागज पत्र संभालने दे. इससे पहले ट्रंप बम फोड़ देते हैं. हम और कहते हैं वार्ता असफल रही तो बहुत भीषण हमला होगा. हम आप देखिए हाईली इरिसिबल तो एक आदमी के मन में पूर्वाग्रह कितना है? ऐसे पूर्वाग्रह में वार्ता सफल कैसे हो सकती है?
सवाल: हम सो लेट्स सी सर क्या सही है कि आज इस्लामाबाद में जो टॉक्स चल रही है उसका रिमोट कंट्रोल वाशिंगटन में बैठे ट्रंप के पास रहेगा.
जवाब: अबब्सोलटली उनका रिमोट वाशिंगटन में ट्रंप के पास इसी तरह से जैसे आपका रिमोट पीसीआर के पास रहता है एज एंकर पीसीआर जो कहता है आप बोलते हैं तो केवल मुखौटा हैं वहां चाहे मुनीर है चाहे वहां के प्राइम मिनिस्टर हैं वो बिल्कुल कान से जुड़े हुए हैं वाशिंगटन से एक-एक पल एक-एक क्षण वहां से मैसेज आता है पोस्ट ऑफिस के उसको एग्जीक्यूट करते हैं तो ये बिल्कुल सच है बात आपकी कि रिमोट कंट्रोल इसका जो पूरे तौर पर ट्रंप के हाथ है वो वाशिंगटन में बैठ के इसे लाइव देख रहे होंगे
सवाल: आखिर इस्लामाबाद में कैसा रहा शांति वार्ता का पहला दिन और कितने चरणों में इस्लामाबाद टॉक्स होंगी इसकी संभावना है.
जवाब: अब पहला दिन तो ऐसे कल आप मान सकते हैं वार्ता तो आज शुरू हो रही है लेकिन संभावना कल की थी कि सब डेलीगेशन पहुंचे कुछ इनफॉर्मल डिस्कशन कल होगा तो कल कुछ ऐसा नहीं हुआ डेलीगेशन मिले एक दूसरे से ईरान का डेलीगेशन था पाकिस्तान के लोगों से मिला और हुआ लेकिन कुल मिला के अधूरा था और सबसे बड़ी खास बात क्या थी ईरान ने कल साफ कह दिया था मैं वार्ता में शामिल नहीं हो रहा तो ईरान था ही नहीं वहां पे इन दैट वे जो है तो कल का जो दिन है वो फ्लॉप था बिल्कुल जो है आज का घटनाक्रम उसमें आशावाद की किरण बहुत कम दिखाई देती है तो इसी से जुड़ा मेरा सवाल है कि जब इतनी बार ईरान ईरान अस्वीकार कर चुका है पाकिस्तान की तरफ से नेगोशिएशंस तो फिर ये नेगोशिएशन होंगे कैसे.
सवाल: ईरान कई बार ये कह चुका है दे डोंट ट्रस्ट पाकिस्तान कई बार बात रिपीट हो चुकी है लेकिन लगता है कास्परेसी सरकमस्ट्ससेस हालात की मजबूरी अमेरिका का दबाव इसलिए वो भारी मन से पाकिस्तान को स्वीकार कर रहे हैं लेकिन स्वीकार करने से पहले उनका बेसिक स्टेटमेंट आ गया है कि लेबनान को इसमें शामिल करिए इट मीन्स अगेन द फ्लॉप शो?
जवाब: एक बड़ा क्वेश्चन है युद्धवाद में डूबे नेतन्या बार-बार कह रहे हैं कि लेबनान पर हमारे हमले रुकने वाले नहीं जब ये हमले रुकेंगे नहीं तो फिर ईरान और अमेरिका के बीच में जो समझौता होना है जो बातचीत होनी है वो परवान कैसे चढ़ेगी इशू यही है उनका युद्ध उन्माद इतना जबरदस्त है उनका पैशन है युद्ध में रहना 24 * 7 उनको केवल युद्ध चाहिए उनको और कुछ बड़ा मजा आता है युद्ध करने में उनको जो है वो मौका देखते हैं मौके को लपक लेते हैं फिर लड़ाई चालू कर देते हैं और इस केस में यही हुआ है इससे पहले कि सीज फायर कोई आगे बढ़े कोई बात हो ट्रंप कुछ सुलझे समझाए उसको उन्होंने पहले फिर से फायर कर दिया लेबनान में आप देखिए एक साथ कितने फायर कर दिए वहां पे 300 लोग मार दिए एक ही दिन वहां पे तो ये समझौते कोई चांस नहीं है जो उसका युद्ध उन्माद रुख है जो युद्ध के प्रति पैशन है उसका जो है वो समझौता कोई होने नहीं देगा इससे पहले कि समझौता भारत है उन्होंने पहले ही माहौल बिगाड़ दिया लेबनान में हमला कर दिया नेक्स्ट डे जी कुछ वेट तो करते हैं कोई प्रतीक्षा नहीं की उन्होंने तो युद्ध से उनको बहुत लगाव है वो युद्ध के साथ ही जीना मरना चाहते हैं और ट्रंप की मजबूरी है इजराइल के प्रधानमंत्री जो है जी सो लेट्स सी.
सवाल: लेबनान पर जो इजरली हमले हुए उसमें नागरिक मारे गए बड़ी संख्या उस पर भारत की तरफ से कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की गई है?
जवाब: भारत देखिए मानवता का समर्थक है. मूल्यों का समर्थक है. विदाउट नेमिंग इजराइल उन्होंने कहा वी एक्सप्रेस आवर कंसर्न ऑन सिविलियन डेथ्स जो अस्पतालों में बच्चे मर रहे हैं और नागरिक मर रहे हैं. उसमें उन्होंने कहा है कि ये और ये भी कहा ये क्यों है कि हर राष्ट्र की जो अपनी स्वर्जिनिटी है और टेरिटोरियल इंटीग्रिटी है. हम उसका सम्मान करते हैं. और मानवीय पहलू देखिए बच्चों के मरने का. मैं देख रहा था 163 बच्चे मर चुके हैं. एक फिगर था अखबार में जो है तो वार्ता के लिए शष्ट मंडल वहां से आया ईरान से जो है वो प्लेन में जो है ना 25 सीटों पे जो मृत बच्चे हैं उनके तस्वीरें लगा के एक मैसेज देने के लिए आए कि ईरान में हम जो वार्ता के लिए आए हैं जो मृत बच्चे हैं इनकी आत्मा भी वार्ता के लिए हमारे साथ आई है. कितना इमोशनल दृश्य था वो. इसलिए वायरल हुआ वो.
सवाल: अमेरिका ईरान के बीच में समझौते का हॉल मजिस्ट्रेट कि वहां पर निर्वाद आवागमन होना चाहिए. स्वतंत्र रूप से आवागमन होना चाहिए शिप्स का, टैंकर्स का. लेकिन यह जो हमला किया इजराइल ने लेबनान के ऊपर क्या उसके बाद हम यह मान कर चल जो ईरान का अब स्टैंड है कि अब निर्वाद जो हमने बात कही थी वो नहीं होगा. तो अमेरिका क्या फिर से हमले करने वाला है अब ईरान के ऊपर?
जवाब: जैसे मैंने कहा ना के हमला अग्रेशन वॉर इज़ फर्स्ट लव ऑफ़ इजरली प्राइम मिनिस्टर. मोर और लेस लेस इज़ द कंपनी की. तो उनकी कंपनी में क्या ट्रंप का माइंड भी मोर और लेस ऐसा हो गया. तो मैंने आपसे कहा ना कि उन्होंने इंतजार ही नहीं किया इजराइल के प्राइम मिनिस्टर ने कि वार्ता आगे बढ़े सीधा हमला कर दिया वहां से जो है और रही बात ट्रंप के ट्रंप तो जीते जागते उठते बैठते एक ही बात कहते हैं अगर समझौता नहीं माना आपने अगर हमारी शर्तें नहीं मानी तो बहुत बुरा होगा भयंकर हमला होगा तो वो ट्रंप और जैसे इजराइली प्राइम मिनिस्टर जो हैं वो इस समय एक ही प्लेटफार्म पे हैं. इसीलिए वार्ता फेल हो रही है.
सवाल: लेबनान पर इजराइली हमलों से शुब्ध होकर ईरान ने अभी सीज फायर तोड़ने की धमकी दी है. इस डेवलपमेंट को आप कैसे देखते हैं?
जवाब: स्वाभाविक है. उन्होंने तो दो टू कहा बिकॉज़ एक बात तय है बिटवीन ट्रंप एंड ईरान ईरान टॉक्स मोर सेंस ही बियर्स लाइक अ नॉर्मल पॉलिटिशियन लाइक अ नॉर्मल कंट्री लाइक अ नॉर्मल डिप्लोमेट. ट्रंप का तो कुछ पता ही नहीं है. एक घंटे में कुछ है, अगले घंटे में कुछ है. तो उन्होंने साफ तौर पे कहा है कि जब तक बेसिक शर्तें नहीं मानी जाएंगी. लेबनान उसमें पार्ट बने और ये जो हारमज है इसका कंट्रोल हमारे पास है. बेसिक इश्यूज है वहां के. दैट इज तब तक हम भाग नहीं लेंगे इसमें. तो अपनी बात को बार-बार कह रहे हैं वो. इट्स ओनली रिपीटेशन ऑफ देयर डिमांड्स एंड द स्टेट ऑफ़ माइंड.
सवाल: इसी मुद्दे से जुड़ा एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल है कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय समझौते जब होते हैं तो क्या वहां पे गफलत हो जाती है? मिसकम्युनिकेशन हो जाता है. और इस गफलत के लिए जिम्मेदार कौन है?
जवाब: गफलत कहीं भी हो सकती है. और ये गफलत हुई है ना साहब. अब देखिए पाकिस्तान ये कह रहा है कि मैंने तो ठीक समझौता जो आया था वहां से वो भेजा था. ईरान कह रहा है नहीं आपने डॉक्यूमेंट हमें दिखाया वो अलग था. अमेरिका कहता है पाकिस्तानी प्राइम मिनिस्टर को आपका डॉक्यूमेंट जो आपने दिखाया अलग था. मतलब दोनों पक्षों को अविश्वास है पाकिस्तान के उस डॉक्यूमेंट में जो वाइस एक दूसरे को दिखाया गया. ईरान का कहना है कि इसमें शामिल था कि लेबनान इसका पार्ट है सीज फायर का. अमेरिका कहता है मेरे को जो कागज आया था उसमें पार्ट नहीं था. इसलिए समझने में गलती हुई. तो अब दोनों जो है उसको कोस रहे हैं पाकिस्तान के रोल को कि पाकिस्तान इमचोर हो. वैसे ही आप देखिए आर्मी के लोग वर्दी लगा के डिप्लोमेट थोड़ी हो सकते हैं. इट रिक्वायर्स मेजोरिटी एक्सपीरियंस एवरीथिंग व्हिच पाकिस्तान डजंट हैव इसीलिए ये डिबेकल हुआ.
सवाल: क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि युद्ध का कोई अगर प्रेरणा स्त्रोत है तो वह नेतन्याहू है और उनके प्रतिनिधि के तौर पर कोई रोल प्ले कर रहा है तो वो ट्रंप है?
जवाब: सही है. नेतन्याहू हैज़ टेकन ओवर द माइंड ऑफ़ ट्रंप जिसे कहते हैं अनुयायू बना लिया उन्होंने उनको और पहले भी बात आई थी कि लड़ाई जो है ना ट्रंप ने शुरू नहीं की थी. ये लड़ाई इसने आपके जो प्राइम मिनिस्टर है नेतन्याहू और सऊदी अरब के संकेत पे उकसाने पे लड़ाई शुरू हुई थी. तो फैक्ट है ट्रंप एट द मोमेंट फंक्शनिंग एस रिप्रेजेंटेटिव ऑफ नेतन्याहू तो सच है बात सर लेबनान पर जो इजराइली हमले हुए उसे लेकर यूरोपीय देशों की तरफ से तीखी प्रतिक्रिया आई है इस पर आप क्या कहना चाहेंगे सही है मानवता के साथ हैं सभी लोग यूरोपियन यूनियन ने कहा है कि लेबनान में जो हमले हो रहे हैं ये गलत है लेबनान को वार्ता में शामिल करना चाहिए इटालियन प्राइम मिनिस्टर मेलोनी ने यही बात कही है. ब्रिटेन ने यही बात कही है. फ्रांस ने यही बात कही है और कहा कि झगड़ा अगर खत्म करना है तो लेबनान को इसमें पार्टी बनाओ. लेबनान को पार्टी बनाए बिना कोई भी समझौता वार्ता सफल नहीं होगी. सो एवरीबडी मोस्ट ऑफ़ द कंट्रीज यूरोपियन कंट्रीज आर इन फेवर ऑफ इंक्लूडिंग तालिबान ऑन टॉक टेबल.
सवाल: तेल अवीव में अभी अक्टूबर के अंदर आम चुनाव होने जा रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि नेतन्याहू की राजनीतिक मजबूरी अब बन गई है इस युद्ध को जारी रखना. उनका शौक है वो मजबूरी बन गया है.
जवाब: आप ये कह सकते हैं युद्ध के माहौल में शायद ही कोई आ रहा हो कभी. एंड दैट वे ही इस परफॉर्मिंग वेरी वेल. क्या सिलेक्टेड टारगेट पे अटैक करता है ईरान के अंदर. कितने लीडरशिप को मारा है उसने? मिलिट्री लीडरशिप है, पॉलिटिकल लीडरशिप है. तो दैट वेर परफॉर्मेंस है. उसमें एक्सेल करता है वो. ही इस नंबर वन इन सेलेक्टिंग टारगेट्स एंड देन किलिंग आउट दोज़ टारगेट्स जो है. तो निश्चित तौर पे चुनाव में लाभ मिलेगा. उसके माइंड में है कि नहीं? मेरे हिसाब से यह सेकेंडरी पॉइंट है. उसके माइंड में पहला मुझे हर समय लड़ते रहना है. सो बात वही है. अल्टीमेटली इट विल लीड टू पॉलिटिकल बेनिफिट टू हिम.
सवाल: मैंने ये सुना है कि इस तनावपूर्ण माहौल के बीच में इजराइल और लेबोन के साथ वार्ता का प्रस्ताव दिया है.
जवाब: हां ये एक सुखद समाचार है. गुड डेवलपमेंट है. और एक दूसरे के राजदूत ने आपस में कल बातचीत की है. फिर एक मंगलवार को हम मिलेंगे. जी तो इस सारे क्राइसिस में सारे निराशा भरे माहौल में जो है एक ही आशा किरण है कि इजराइल और लेबनान के बीच वार्ता के द्वार खुलने की संभावना है.
सवाल: कुछ राजनीतिक प्रेक्षकों का यह कहना है कि इस पूरे माहौल में यूएनओ इररेलवेंट और रिडेंट हो गया है. आप कैसे देखते हैं साकलन आपका क्या कहता है?
जवाब: ट्रंप ने WHO की हत्या की. पहले क्लाइमेट चेंज का एग्रीमेंट था. उसकी हत्या की अब यू एनओ की हत्या कर दी. यू एनओ लाचार बेबस एक होता है इंस्टीट्यूशन उसकी तरह है. आपने ठीक कहा है रिटेंडेंट हो गया है एक तरह से. इससे बेहतर है कि ट्रंप उसके समापन की घोषणा कर दे बजाय इसके कि उसको आधा मृत आधा जिंदा रखा है उन्होंने. सहायता कभी देते हैं, कभी काट देते हैं सहायता उसकी. बट द बेसिक पॉइंट इज़ यू एनओ हैज़ गॉन कंप्लीटली इरिलवेंट इन दिस एंटायर सिनेरियो.
सवाल: आपको लगता है कि इस पूरे युद्ध के चलते ट्रंप की नजर ये जो नवंबर में होने वाले जो मिड टर्म इलेक्शंस है उस पर भी है?
जवाब: बिल्कुल है. ही इस फेसिंग सीरियस पॉपुलरिटी क्राइसिस जिसे कहना चाहिए वो इसमें उसको फेस कर रहे हैं. तो उनको लगता है कि अब ये मिड टर्म रेटिंग्स आएंगी तो अप्रूवल रेटिंग्स उनकी गिर रही है वहां पे. तो निश्चित तौर पे ही इस आइंग ऑल दोस रेटिंग्स और वो सोचते हैं शायद युद्ध के बहाने मेरी लोकप्रियता ग्राफ जो बहुत नीचे चला गया शायद ऊपर आ जाए. यह उनकी परिकल्पना है. अभी वक्त बताएगा कि उनकी जो पॉपुलरिटी का ग्राफ तेजी से गिर रहा है वो सुधरता है कि नहीं, कहीं रुकता है कि नहीं. लेट्स सी.
सवाल: कूटनीति के क्षेत्र में लोग बड़ा आश्चर्यज मान रहे हैं. एक तरफ तो अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता चल रही थी और उसी समय ट्रंप ने अचानक युद्ध का ऐलान कर दिया. क्या जो पूरी एक्सरसाइज थी वो अनकॉल्ड फॉर थी?
जवाब: एब्सोलुटली अनकॉल्ड फॉर थी. दिस शोज़ ट्रंप पॉलिटिकल इमैच्योरिटी, डिप्लोमेटिक इमैच्योरिटी. आप देखिए कि मस्कट में बात चल रही थी. वार्ता का पहला चरण पूरा हुआ. ईरान और इनके बीच में जो है दूसरा चरण चल रहा था. उससे पहले उन्होंने वॉर की घोषणा कर दी. ऐसा संसार में कभी नहीं हुआ कि वार्ता चल रही है. वार्ता अभी कंक्लूसिव नहीं हुई. वार्ता डिसाइड नहीं हुई. उसका परिणाम सामने नहीं आया है. यस और नो जो भी है आपने डिक्लेअर कर दिया. तो एब्सोलुटली इमैच्योर एंड अनकॉल्ड फॉर एक्सरसाइज ऑन द पार्ट ऑफ ट्रंप.
सवाल: अमेरिकी मामलों के जानकार लोगों का ये कहना है कि ट्रंप्स फेलियर एंड दिस वॉर मे प्रूफ टू बी एन अनसेरेमोनियल एंड ऑफ ह प्रेसिडेंसी. क्या आपको लगता है सर?
जवाब: अब्सोलुटली आई आल्सो एग्री दिस वॉर मे प्रूव ह वाटर लूप जिसे कहते हैं मे द बिगनिंग ऑफ ह एंड फ्रॉम ह प्रेसिडेंसी लगता तो ऐसे ही ऑफकोर्स इट इज़ अ लॉन्ग एक्सरसाइज इट विल टेक सम टाइम नॉट इमीडिएटली बट द प्रोसेस हैज़ ऑलरेडी बिगन द प्रोसेस टू रिमूव हिम फ्रॉम ह प्रेसिडेंसी और टू लूज ह प्रेसिडेंसी द प्रोसेस इज़ ऑलरेडी बिगन.
सवाल: कुछ लोग कह रहे हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं. ऐसे में वहां के संविधान में असाधारण परिस्थितियों में ऐसी व्यवस्था है कि राष्ट्रपति को पागल घोषित कर सकते हैं. इसको लेकर आपका क्या कहना है?
जवाब: देखो दो पार्ट हैं और मानसिक संतुलन तो खोए बैठे हैं. जो व्यक्ति सुबह कुछ कहता है, ब्रेकफास्ट पे, लंच पे कुछ कहता है, डिनर पे कुछ कहता है. तो, हम कहते हैं ना भैया कि मेंटल हो गए हैं आप या मेंटल इमंबैलेंस हो गया है. दैट इज़ रही पागल की बात तो पागल तो घोषित करने का ऐसा नहीं है. लेकिन ये कोई राष्ट्रपति अगर काम करने में, शारीरिक कारणों से, मानसिक कारणों से अगर असमर्थ हो जाता है. फिजिकली तो उसको हटाने का बकायदा प्रोसेस है. अभी जो है लेकिन पागल घोषित करने का ऐसा कुछ मैंने नहीं पढ़ा है. और ट्रंप को इन ग्राउंड के आधार पे अभी हटाने का या करने का अभी कोई आधार नहीं है. अभी क्या है कि तलवार ले मैदान में लड़ रहे हैं. वह अभी लड़ाई का परिणाम क्या होगा तब मालूम पड़ेगा.
सवाल: अमेरिका ने दो धमकियां दी. 7000 पुरानी जो सिविलाइजेशन है उसे तबाह करने की बात कही कि हम एक रात में इसको तबाह कर सकते हैं. फिर कहा पाषाण युग में पहुंचा देंगे. ट्रंप की जो इस तरह की धमकियां हैं आप इन्हें किस तरह देखते हैं?
जवाब: हाईली रिस्पांसिबल जिसे कहना चाहिए क्रिमिनल माइंड इमच्योर वेरी थ्रेटनिंग टू वर्ल्ड पीस और कितनी गंभीर बात है उनका इस तरह की धमकी देना साफसाफ तौर पे कि संसार की एक सभ्यता खत्म हो जाएगी फिर लौट के कभी नहीं आएगी क्या कहना चाहते हैं आप क्लियरली न्यूक्लियर की ओर संकेत दे रहे हैं दैट इज इसकी जितनी निंदा की जाए उतनी निंदा की जानी चाहिए और जितनी जल्दी हो विश्व शांति के हित में ट्रंप के हाथ से सत्ता वापस ले लेनी चाहिए ट्रंप को जिसे कह सत्ता से बाहर कर देना चाहिए एट द मोमेंट अगर संसार अपनी सुरक्षा चाहता है और ट्रंप की इस तरह के मानसिक असंतुलन से ऐसी धमकियां जो आ रही है तो धमकियां क्या पता कभी एक्सजीक्यूट हो जाए. कोई आर्मी जनरल ऐसा भी हो सकता है कि वो कहे बटन तो बटन दबा दे तो क्या होगा संसार का इट्स हाईली इरिसिबल एक्ट ऑन द पार्ट ऑफ़ अमेरिकन प्रेसिडेंट.
सवाल: क्या ट्रंप का इशारा तेहरान पर परमाणु बम गिराने का था.
जवाब: ऐसा ही है. उनके स्टेट ऑफ़ माइंड तो यही कहती है. वरना आप देखिए एक रात में सभ्यता समाप्त हो जाएगी. लौट के नहीं आएगी. आप समझ रहे हैं? और आज फिर उन्होंने अभी जो धमकी दी जो शिष्ट मंडल गया है इसको उन्होंने कहा है कि आप समझौता करिए इन वे सरेंडर करिए आपके लिए इस दुनिया में जिंदा रहने का यह वार्ता आखिरी मौका है तो फिर वो उसी बात को दोहरा रहे हैं परमाणु की ओर कि अगर वार्ता फेल होती है तो आई विल फिनिश यू आई विल डिस्ट्रॉय यू उनका संकेत परमाणु की तरफ है और उपराष्ट्रपति ने भी कुछ ऐसा हल्काफुल्का संकेत दिया था लेकिन बाद में उसकी प्रतिक्रिया हुई जबरदस्त तो वाशिंगटन में वाइट हाउस ने इसको डिनाई किया. ऐसा कंटशन किया कि नहीं परमाणु कोई इरादा नहीं है. लेकिन ट्रंप का हर वाक्य हर धमकी अल्टीमेटली परमाणु युद्ध की ओर संकेत करती है. सो वै सीरियस सिचुएशन.
सवाल: क्रिश्चियन कम्युनिटी के गॉड फादर पोप ने ईरान की सभ्यता नष्ट कर देंगे. ट्रंप के इस बयान की आलोचना की है. इस डेवलपमेंट को आप कैसे देखते हैं?
जवाब: डेवलपमेंट इज़ वेरी सीरियस. ही इज़ अ गुड पर्सन. गार्डियन और कस्टोडियन ऑफ़ ह्यूमेनिटी दैट इज है धर्म के लोग हैं. अच्छी बात करते हैं. उन्होंने निंदा की उन्होंने इसकी और एक बहुत गैर जिम्मेदाराना बात है. और सबसे बड़ी बात है वो खुद अमेरिकन है. अभी जो ट्रंप है नॉर्थ अमेरिका से आते हैं वो तो उनकी उनकी इस राय को सलाह को चेतावनी को गंभीरता से ले जाने की आवश्यकता है. और व्हाट टू डू ट्रंप डजंट लिसन टू एनीबडी. लेट्स सी पॉप का क्या इंपैक्ट होता है.
सवाल: आज से ठीक छ महीने पहले इसी जेसी शो में आपने भविष्यवाणी की थी कि ट्रंप विश्व शांति के लिए एक बहुत बड़ा खतरा साबित हो सकता है और आज वो भविष्यवाणी सच साबित होती हुई नजर आ रही है. तो इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
जवाब: अबब्सोलुटली वो होता है ना कि पूत के पांव पालने में ही देखने लग जाते हैं. तो ट्रंप ने जो शुरुआती तौर पर सत्ता संभाली थी उनके बयान थे उससे क्लियर हो गया था कि विश्व शांति के लिए खतरा बनेंगे और आज खतरा बन चुके हैं और खतरा सच बड़ा क्या होता है विश्व शांति का परमाणु युद्ध का बटन दबा देना और आज सारी वार्ताओं के बावजूद मेरा एक क्लियर असेसमेंट है कि ट्रंप द्वारा परमाणु बटन दबाए जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता तो भविष्यवाणी सही है.
सवाल: इसी तरह उस वक्त आपने यह भी कहा था कि ट्रंप अगर ऐसे ही चलते रहे, तो एक वक्त ऐसा आएगा जब अमेरिकी फोर्सेस उनकी बात मानने से इंकार कर देंगे. उनका आदेश नहीं मानेंगे. और अभी कुछ दिन पहले नीतिगत मामलों को लेकर आर्मी चीफ और दो जनरल्स को हटा दिया गया. अब इसको लेकर अगली आपकी भविष्यवाणी क्या है?
जवाब: क्योंकि मुझे वो आपकी बात याद आ गई. अब भविष्यवाणी यह है कि जिस दिन वो कहेंगे परमाणु बटन दबा दो. एक पल के लिए वो पल होगा आर्मी के निर्णय लेने. कई बार ऐसा होता है ना अफ्रीकन कंट्रीज में पाकिस्तान दूसरे देशों के अंदर आर्मी फिर आपको बैठा देती है. हम तो वह पल ऐसा आ सकता है कि जब परमाणु बटन दबाने के लिए कह दें तो हो सकता है डिफाइन ऐसी को ट्रंप को फिर एक तरह शक्तिहीन करके बैठा दिया जाए. दैट इज लेकिन वो खतरा बरकरार है. मैंने आपसे कहा ना कि भविष्यवाणी यह है कि वो स्थिति आ सकती है. ट्रंप के जो बयान चल रहे हैं अभी भी उनमें कोई सुधार नहीं है. उसमें कहीं ऐसा नहीं दिखाई देता है कि ये व्यक्ति आज समझौता वार्ता की टेबल पे बैठने वाला है. उससे पहले वो कह रहा है कि ईरान वाले लोगों को ख्याल रखना चाहिए कि उनके लिए यह आखरी मौका है अपनी बात कहने का. फिर वही धमकी पुराने वाली. दैट वे जो है सो वै सीरियस.
सवाल: मैंने सुना है कि ईरान के साथ युद्ध में ट्रंप की नीतियों के खिलाफ आर्मी जनरल्स के अलावा जो ट्रंप के कुछ बेहद करीबी जो राजनीतिक सलाहकार हैं जो उनके भरोसेमंद राजनीतिक सलाहकार हैं उनके भी इस्तीफे हुए हैं. क्या आपको इस बारे में कोई जानकारी
जवाब: देखिए उससे पहले आई विल कम बैक टू अगेन द आर्मी जनरल जो है उस समय मैंने कहा था कि आर्मी एक दिन उनका आदेश मानने से इंकार कर देगी और वो हुआ आर्मी चीफ ने विरोध किया उनकी बात का नहीं माना होगा उन्होंने इस्तीफा लिया उसका दूसरे जो टॉप जनरल्स थे उन्होंने ट्रंप को डिफाई किया एक तरह से उसका इस्तीफा लिया उन्होंने और 12 दूसरे आर्मी के टॉप ऑफिसर्स हटाए गए तो भविष्यवाणी बिल्कुल सही थी कि एक दिन ऐसा आएगा कि सिक्योरिटी फर्सेस में ट्रंप का आदेश मानने से इंकार करेंगी और इंकार हुआ अब आपका कहना ये है कि नॉट ओनली आर्मी उनके प्रमुख सलाहकार दूसरे हैं. वह लोग भी इससे बहुत परेशान है और ऐसी खबर एक आई थी बीच में कि भारतीय मूल की जो इंटेलिजेंस चीफ है वहां की तुलसी जो है उसको चेतावनी दे दी गई. क्यों उसने एक बयान दिया था खाली कि पाकिस्तान के पास ऐसी मिसाइल है जो अमेरिका तक आ सकती है.
मतलब ये कि डोंट ट्रस्ट पाकिस्तान. यू आर ब्लाइंग ट्रस्टिंग पाकिस्तान. दिस इज रोंग. मतभेद है ना डिफरेंस ओपिनियन. उसको मंजूर नहीं था. उसकी स्थिति हुई. सीआईए ने कह दिया कि आप सत्ता परिवर्तन चाहते हैं संभव नहीं है. वहां पर जो है इसके अलावा तीन उनके और बड़े सलाहकार हैं. उन्होंने कहा कि हमारी नीति गलत है. इस लड़ाई का अंत बुरा होगा. तो जो बड़े लोग जिन्होंने इस्तीफे दिए हैं या अपने आप को उन्हें वॉइस ऑफ़ डिसेंट के रूप में सामने आए हैं. वो संख्या धीरे-धीरे लोगों की और बढ़ेगी. अभी और वैसे देखा है तो उपराष्ट्रपति भी इनडायरेक्टली कह चुके हैं कि इसका अंत बुरा होगा. दैट वे. तो फैक्ट है कि अब बड़ी संख्या में दूसरे ट्रंप समर्थक जो सरकार में बैठे हुए हैं ओएसडी सेक्रेटरी वो लोग भी शायद छोड़ सकते हैं सरकार को.
सवाल: अब तो कुछ लोग कहने लगे हैं कि जिस तरीके से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सत्ता का दुरुपयोग किया प्रोफेशनल मिसकंडक्ट किया. अब तो राष्ट्रपति पद को खत्म कर देना चाहिए ताकि कोई और ऐसा राष्ट्रपति आके ऐसी डरावनी कोशिश ना करे. इसको लेकर जो आकलन चल रहा है उसमें आप सर क्या कहेंगे?
जवाब: आकलनीय है. ट्रंप के प्रति निराशा का भाव है. जो फ्रस्ट्रेशन है, जो उम्मीदों का अंत है, हम उसकी अभिव्यक्ति है. ये एक प्रकार से फ्रस्ट्रेशन की निराशा की अभिव्यक्ति है ट्रंप के प्रति कि बेहतर ये है कि पद ही समाप्त कर दो. अभूतपू शक्तियां वन मैन पावर सेंटर समाप्त कर दो. कोई तो कंट्रोल करे. युद्ध की शक्तियां उसे हटा लो. मतलब एक व्यक्ति ऐसा नहीं रहे. राष्ट्रपति जो अमेरिकन राष्ट्रपति संसार का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति है. उसको शक्तिहीन बनाया जाए. यह फ्रस्ट्रेशन है लोगों का जो इस रूप में सामने आया है. बट ट्रंप मस्ट टेक कॉग्निजेंस ऑफ दिस सेंटीमेंट ऑफ द एंटायर वर्ल्ड.
सवाल: कथित युद्ध विराम के इस पूरे सिनेरियो की अगर हम बात करते हैं तो कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है कि डोनाल्ड ट्रंप अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए और फेस सेविंग के लिए एक तरह से जो अपने दूत हैं उनके मारफत गिड़गिड़ाए होंगे ईरान के सामने. क्या आपको ऐसा लगता है?
जवाब: निश्चित तौर पे वो रात बड़ी सेंसिटिव रात थी. जब उन्होंने कहा था कि 48 घंटे में वो हरमज को खोल दो. खुला नहीं. 7 तारीख को सुबह अमेरिकन समय से 5:00 बजे समय सीमा समाप्त हो रही थी. ट्रंप परेशान मेरा मानना है कि कमरे में घूम रहे होंगे इधर से उधर परेशान होके कि क्या करें? प्रतिष्ठा दांव पे थी. तो उस समय उन्होंने चाइना का सहयोग लिया. पाकिस्तान के राष्ट्रपति पे दबाव डाला और एक प्रकार से गिड़गिड़ाए होंगे. किसी तरह मुझे बाहर निकालो इस स्थिति से वरना 5:02 पे तो उड़ाना था और मुझको दैट वे जो है तो इसलिए निश्चित तौर पे जो भाव था वहां उस दिन का जो है वो यही था कि ट्रंप ने गिड़गिड़ा के हाथ जोड़ के ये समझौता करवाया सीज फायर करवाया.
सवाल: इन सबके बीच एक आश्चर्यजनक घटनाक्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान की जो 15 सूत्री मांग है उसको लागू करने का संकेत दिया पॉजिटिव संकेत दिया है आखिर ये हृदय परिवर्तन हुआ कैसे?
जवाब: हृदय परिवर्तन ये हालात की मजबूरी है हां जब वो वो बचे उस सुविधा से बाहर निकले किसी तरह से जी और ये शुद्ध विराम हुआ तो जिसे कहते हैं ना कानों के हाथ लगाया होगा कि चलो बचे आज तो तो फिर क्या होता है जब बारगेन होता है तो आदमी फिर वीक होता है सामने वाला तो उन्होंने जो 15 शर्तें रखी थी उन्होंने कह दिया वर्केबल है इमेजिन अगर सारी शर्तें वर्केबल है ये तो आज समझौता वार्ता क्यों हो रही है युद्ध की धमकी क्यों दी जा रही है अगेन फ्लकचुएटिंग माइंड इरिसोंसिबल स्टेटमेंट कि इन प्रिंसिपली वर्केबल है अगर सारी शर्तें उनकी वर्केबल है तो झगड़ा किस बात का है आज वार्ता क्यों हो रही है? सो दिस इज ऑल.
सवाल: ईरान अमेरिका जंग में जब पॉज बटन आया उस दौरान भारत ने खाड़ी देशों के साथ संपर्क क्यों साधा और मोदी सरकार के वो कौन से तीन धुरंधर हैं जो इसमें एक्टिव हैं?
जवाब: मोदी तो बहुत स्मार्ट प्राइम मिनिस्टर हैं जो है एक पल नहीं गवाते. अपने देश के हितों की जहां परवाह करनी होती है, केयर करनी होती है. तो उन्हें लगा कि चलो अब समय मिला है कुछ तो अपने दूध दौड़ाओ. तो जयशंकर हैं, हरदीप पुरी है, फॉरेन सेक्रेटरी हैं. इनको अलग-अलग यूए में दौड़ाया, किसी को कतर में दौड़ाया जो है कि वहां जाके एक अच्छी सी पीआर करो, अपनी गुडविल बनाओ. उन्होंने जहाज हमारे आने दिए थैंक यू कहो. वो क्राइसिस में उनसे सहानुभूति रखो और इस तरह का रखो. कम से कम हमारी तेल की गैस की सप्लाई रुके नहीं इस झगड़े में. तो गुडविल क्रिएट करने का मिशन है जो वो कर रहे हैं. गुड ए गुड डिप्लोमेटिक एक्सरसाइज.
सवाल: मिडिल ईस्ट से जुड़े जो एक्सपर्ट्स हैं या कुछ पत्रकार हैं जो समझते हैं वहां की पॉलिटिक्स को उनका एक मानना है कि ये सब युद्ध के क्राइसिस में जो ट्रंप की किरकिरी हुई है या फिर जो ट्रंप का नुकसान हुआ है और बतौर मिडिल ईस्ट जो एक एलआई की तरह रहता था अमेरिका के साथ उसको भी एक सेटबैक लगा है. इन सबके बाद डाउटफुल है कि वो ट्रंप का समर्थन देंगे और आगे यूएस बेसिस जो होते हैं उनके वो वहां पर अमेरिकन आर्मी बेससेस लगाने देंगे.
जवाब: यू आर अब्सोलुटली करेक्ट. सारे खाड़ी देश गंभीरता से पुनर्विचार कर रहे हैं. ट्रंप के साथ खड़े रहे कि नहीं? वन टू अमेरिकन बेसिस हमने अपने आप बना लिए. मौत का सामान जब मुसीबत का सामान अपने यहां कर ले इसको रखें कि नहीं. उन्होंने देखा है उनके मन में था कि ट्रंप अमेरिका इतना शक्तिशाली देश है. उसकी छतरी में उसके अंब्रेला हम सारे सुरक्षित हैं. यह भ्रम उनका टूट गया. उन्होंने देखा कि ट्रंप किसी देश को पॉलिटिकल लीडरशिप को मार सकता है, बर्बाद कर सकता है. कंट्री को जीत नहीं सकता. सुरक्षा गारंटी नहीं दे सकता. खाड़ी देशों पे कितने हमले हुए हैं. ईरान से आप देखिए ये तो इनको लगा ये क्या हुआ? ये तो काउंटर प्रोडक्टिव हो गया उनका. तो सीरियसली सोच रहे हैं कि हमारा इतना नुकसान हमने उठाया और हमारे पॉलिटिकल रिश्ते खाड़ी में मुस्लिम वर्सेस मुस्लिम हो गए. दैट वे और किसके लिए हुए? ट्रंप की सुरक्षा के उस कारण से कि ट्रंप हमारा ही इज़ द गॉड फादर. हमारा गॉड फादर है. हमारी सुरक्षा गारंटी है. अब सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है. तो मेरा ऐसा मानना है आने वाले दिनों में हालात को देख के बहुत टैफुली और बहुत स्लोली जो है खाड़ी देश ट्रंप से डिस्टेंस मेंटेन कर सकते हैं.
सवाल: इन 40 दिनों के युद्ध के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी वॉर पॉलिसी वॉर गोल्स को कम से कम एक दर्जन से ज्यादा बार चेंज या फिर शिफ्ट किया है. इस तरह के सेंसिटिव मैटर में भी डोनाल्ड ट्रंप के चेंजिंग मूड को आप किस तरह से देखते हैं?
जवाब: वही जिसे कहना चाहिए अब खराब भाषा में कहूं तो वही पागलपन वही मेंटल इनस्टेबिलिटी वही गैर जिम्मेदाराना वक्तव्य कभी कुछ कहना कभी कुछ कहना और सुनते नहीं है किसी की लोग इतने परेशान है सारे संसार में ट्रंप के इन गैर जिम्मेदाराना व्यक्तियों से बड़ा गुस्सा आता है लेकिन क्या करें अब दिल्ली में बैठा व्यक्ति क्या करें ठीक है अफ्रीका की राजधानी में बैठा व्यक्ति क्या करें पेरिस में बैठा व्यक्ति क्या करें ट्रंप है ये तो तो अब क्या है कि लोग परेशान है उसके बार-बार ये वॉर गोल शिफ्ट करने से एलआई परेशान है. सबसे बढ़िया बात कही है फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रो ने. उसने ट्रंप को समझाया या यो कहूं कि लताड़ा इन्हें वे जो है समझाया और ये कहा दिस इज नॉट योर टेलीविजन शो. वी आर टॉकिंग अबाउट वॉर सच अ सेंसिटिव इशू. और साथ में यह भी कहा उसको के भाई देयर इज नो नीड टू स्पीक एवरीडे. तुम्हें हर रोज बयान देने की जरूरत नहीं है. पर ट्रंप का क्या करें? ट्रंप को तो ब्रेकफास्ट पे, लंच पे बयान देने की जरूरत है. और मैं कहूंगा हर दो घंटे से पहले उन्हें बयान देने की एक पैशन है उनका कहीं या उनका मेंटल स्टेट बना हुआ है. तो ये निराशा की स्थिति है. लोग समझा रहे हैं ट्रंप को. अब वो मानेंगे तब जिसे कहते हैं हालात मजबूर करते हैं. तो लेट्स सी हालात ऐसे कब होते हैं कि ट्रंप कम से कम कोई बयान दें. एक सुलझे हुए राष्ट्रपति की तरह या किसी आम व्यक्ति की तरह आम राजा की तरह बयान दें. 5 दिन में, 7 दिन में, 20 दिन में, 10 दिन में. यह नहीं कि हर दो घंटे वाला एक नया बयान वहां पे आ रहा है.
सवाल: क्या सचमुच ट्रंप नाटो छोड़ने का मन बना रहे हैं? और क्यों वो नाटो देशों से निराश हैं? और क्या ऐसा ही नाटो देश भी सोच रहे हैं?
जवाब: ये तो लव लॉस्ट स्टोरी है. अच्छा दोनों की दोनों निराश हैं एक दूसरे से. ठीक है. ट्रंप वो उनको अपमानित कर रहे हैं नाटो को. कह रहे हैं कि व्हेन देयर वाज़ ए नीड. नो वन वास हियर. तुम कागजी शेर हो. समय पे काम नहीं आते हो. और वो कहते हैं भाई यह लड़ाई आपकी हमारी नहीं है. ब्रिटेन ने कहा ना दिस इज नॉट आवर वॉर. आपने हमसे पूछ के शुरू नहीं किया था और इतने खराब हालात हो गए हैं. तो नोटोटोो भी क्या है उसी तरह देख रहा है कि सुरक्षा गारंटी नहीं है ट्रंप अब. चाइना से कहो, उत्तर कोरिया से कहो, किसी से कहो तो हम क्यों रहे उसके साथ? दैट वे जो है तो धीरेधी डिस्टेंस कर रहे हैं. ट्रंप परेशान है तो दोनों एक दूसरे से परेशान है. दोनों एक दूसरे से मुक्ति चाहते हैं. ट्रंप का तो क्या पैसा लगता है वहां पे तो सोचता है चलो पैसा भेजना बंद करो इनको. वो लोग सोचते हैं कि नाउ ट्रंप इस एमर्जिंग मोर लायबिलिटी देन एन एसेट. तो रिलेशनशिप जैसे खाड़ी देशों के रिलेशनशिप टूटने के कगार पे है. ऐसे ही ये रिलेशनशिप टूटने के कगार पे है. खाड़ी देशों में मजबूरियां कुछ ज्यादा है. इनकी मजबूरियां कुछ कम है. तो ये रिलेशनशिप धीरे-धीरे टूटेगी. मोह भंग हो गया एक दूसरे से. ठीक है ना? तो दे आर स्लोली मूविंग टू टेकिंग डिवोर्स फ्रॉम ईच अदर. राष्ट्रों की बात हो रही थी.
सवाल: आखिर नेटो के किन-किन सदस्य देशों ने और साथ ही कुछ बड़े राष्ट्रों ने इस युद्ध में सीधे तौर पर शामिल होने या फिर अपने एयरबेस को देने से इंकार कर दिया. इस डेवलपमेंट को आप कैसे देख रहे हैं?
जवाब: बिल्कुल सही इंकार कर दिया. देखिए फ्रांस है, ब्रिटेन है, स्पेन है, जापान का भी कुछ ऐसा ही था विचार उसके अंदर जो है तो ये सब है जो कहते हैं एयरबेस देख के क्या करेंगे हम इसको जो है तो उसे डिस्टेंस मेंटेन कर रहे हैं. दे डोंट वांट कि जो उसकी लायबिलिटी है उसका एक्सटेंशन हमारे देश में आए किसी तरह से. और फिर ट्रंप भी पलट के कहता है ट्रंप कहता है मत आओ मेरे साथ में. या तो मेरे साथ खड़े रहो कंधे से कंधा मिला के और गेट लॉस्ट जिसे कहते हैं. और तेल अगर आपको चाहिए वहां से जो है गो एंड गेट योर ऑयल. फिर मेरी गारंटी नहीं कि मैं आपको हर मुझसे से तेल दिलवाऊंगा. तो एक रिलेशनशिप जो है वो टूटने के कगार पे है.
सवाल: इन सारी नेगेटिविटी के बीच में जो अमेरिकी पायलट वहां फंसा हुआ था जिसका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के लीडरशिप में वहां की आर्मी एयरफोर्स ने जाके शत्रु देश ईरान के अंदर घुस के अधम्य शौर्य का परिचय देते हुए पायलट को बचाया. तो इसमें तो कम से कम 100 में 100 नंबर मिलते हैं उनको. और ये जो हिस्टोरिकल रे ऑपरेशन हुआ इसकी इनसाइड स्टोरी क्या है?
जवाब: एक पढ़ते हैं ना अपन हर बुरे व्यक्ति में भी एक अच्छाई होती है. हां. बुरे व्यक्ति नॉट पर्सनली उसकी नीतियां बुरी होती है. उसका अर्थशास्त्र बुरा होता है. दर्शनशास्त्र बुरा होता है. उसका जो है तो ट्रंप का जो बुरा दर्शन शास्त्र है उसमें एक अच्छाई ये है अमेरिकन सिपाही की रक्षा के लिए वो जान देता है. राष्ट्र प्रेम को राष्ट्रभक्ति को और अमेरिका में क्या है कि सैनिक की सुरक्षा है. उसको सर्वोच्च स्थान है. अमेरिका पूरी जान लगा देता है अपने एक आर्मी एक जवान को बचाने के लिए. दैट वे तो ये जो घटना हुई है उसी का एक्सटेंशन है एक प्रकार से. तो ये पता लगा वहां पे ढूंढा उसको. मैंने सुना कि 155 एयरक्राफ्ट लगाए गए और कोई 7 800 लोगों को वहां ग्राउंड पे उतारा गया और जबरदस्त उसको कवर अप किया गया उसको वहां से निकाला गया उसी प्रोसेस में दो तीन इनके जहाज कूद के नष्ट हो गए उन्होंने कहा नष्ट होने दो इसको बचाना जरूरी है तो ये इतना सक्सेसफुल ऑपरेशन था कि 21वीं सदी में ये ऑपरेशन याद रखा जाएगा और इसका श्रेय ट्रंप को मिलेगा ऑफ कोर्स इस बात के लिए कि ट्रंप की लीडरशिप में ये ऑपरेशन हुआ और गर्व के साथ जो है ना अमेरिका ने अपने सैनिक को वहां से बाहर निकाला और संसार की जो वार स्ट्रेटजी है ठीक ठीक है. उस समय एक स्वर्णिम अध्याय जो है ना ये ट्रंप की लीडरशिप में जोड़ा गया.
सवाल: क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि ट्रंप के आने के बाद छोटे से छोटा बड़े से बड़ा देश जो अमेरिका की मिलिट्री और इकोनॉमिक सुप्रीमेसी है उसके बारे में जान पाए. दूसरा ये कि जो हॉर्मोन जैसे जटिल ज्योग्राफिकल विषय हैं उसके बारे में भी लोगों को जानकारी हुई.
जवाब: बिल्कुल ठीक कह रहे हैं आप. ये आज क्या है कि भारत के गांव में बैठा हुआ, अफ्रीका के गांव में बैठा हुआ, चाइना के गांव में बैठा हुआ, वियतनाम के गांव में बैठा हुआ व्यक्ति. इसका कभी उसने सुना नहीं था कि अमेरिकन राष्ट्रपति कौन होता है? हम उसको पता है अरे ट्रंप है कोई. जी. अरे कौन है ट्रंप ये? तो रोज सुबह चाय पे जैसे लोग चाय पीते हैं तो आजकल क्या होता है? मॉर्निंग बुलेटिन में इसका देखते हैं कि आज उसने कौन सा ट्वीट किया है. हां. तो सारे संसार में मालूम पड़ गया ये ट्रंप क्या है? ये विषय क्या है? हॉर्मोज क्या है? जी हमें मालूम नहीं था क्या है. तो ट्रंप ने इतना पॉपुलराइज कर दिया इन विषयों को कि पूरे संसार में उसकी प्रेसिडेंसी ऐसी लगती है आज प्रैक्टिकली कि राष्ट्रपति अमेरिका का नहीं है. ये सारे संसार का राष्ट्रपति है. जी ऐसा माहौल बन गया है. तो सही है. तो ब्रांडिंग कैसे करो ये ट्रंप से सीखना चाहिए.
सवाल: व्हाट हैज़ एक्चुअली गॉन रोंग वि ट्रंप वेल डीलिंग विद ईरान? क्योंकि ट्रंप ने भी कभी ये सोचा नहीं होगा कि ईरान इस तरीके से काउंटर अटैक कर देगा. कौन-कौन से ऐसे इंसिडेंट्स घटनाएं रही जो इस पूरे सिनेरियो को इस्टैब्लिश करती हैं?
जवाब: इट इज़ अ सीरियस एरो ऑफ़ जजमेंट ऑन द पार्ट ऑफ ट्रंप. इट इज़ अ स्ट्रेटेजिक ब्लंडर जिसे कहना चाहिए ट्रंप के पार्ट पे जो है. तो अब यह है वो प्रायश्चित कर रहे हैं. रिवैलुएट कर रहे हैं अपने वर्किंग को जो है तो अब आपने पूछा कि ऐसी कौन-कौन सी घटनाएं हुई जो अप्रत्याशित थी? जैसे ट्रंप डीमोरलाइज हुआ. ऐसा क्या हुआ? तो सबसे पहले तो ये हुआ ट्रंप को अनुमान था कि वेनेजुला से उठा के ले आए. मान लो किसी को वो तो अलग बात थी. यह गलती रही उनका पहचानने में कि ईरान इज़ नॉट वेनेजुला दैट वे और दूसरा क्या उनको इराक का अनुभव रहा कि सद्दाम को उठा लाएंगे खड्डे से भी निकाल लाएंगे कब्जा कर लेंगे देश पे तो उनका अनुमान था कि जैसे ही खुमेनी मारे जाएंगे तो आकलन था कि आधे लोग या 40% लोग खुमेनी के खिलाफ थे. उसकी ज्यादतों के खिलाफ थे और 47 वर्ष शासन उसका चल रहा था. तो आकलन था कि जैसे ही हमारी सेनाएं वहां घुसेंगी उसकी मौत हो जाएगी.
तो ऑटोमेटिकली जो सेकंड लीडरशिप है वो ट्रंप की शरण में आएगी और कहेगी हमारी शपथ करा दो हम आपके साथ रहेंगे वो नहीं हुआ और ट्रंप का दुर्भाग्य है सबसे बड़ा दुर्भाग्य है उल्टा क्या हुआ राष्ट्रवाद हिरे लेने लग गया उन लोगों में वो सारे लोग खड़े हो गए और खुमेनी का पुत्र जिंदा था एक ब्रैंड जिंदा था उस लीगसी को आगे बढ़ाने के लिए तो वहां से बढ़ा वो तीसरा उन्होंने क्या देखा उसके अंदर कि ये ट्रंप ने कल्पना नहीं थी कि ये ईरान जो मुस्लिम राष्ट्रों पे हमला कर देगा खाड़ी देशों पे हमला कर देगा अपने भाई बहन पे हमला कर देगा. कभी कल्पना नहीं की थी उसने. सारा संतुलन बिगड़ा. और दूसरा पिछले दो दशकों में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी देश ने मतलब ईरान ने अमेरिका के फाइटर जेट को गिरा दिया. उसको शूट कर दिया. ये और फिर उसने देखा कुछ ईरान में बदला नहीं. ईरान का सिस्टम है 31 स्टेट्स हैं वहां पे. वो एज इट इज़ काम कर रहा है. तो हैरान है वो. तो ये उसका आकलन जो था वो गलत हुआ. तो ये वो घटनाएं हैं जिनसे वो खुद आश्चर्य में है कि यार ऐसे कैसे हो गया? हो गया.
सवाल: मैंने सुना है कि इस युद्ध के चलते डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता लगातार घटती जा रही है. अमेरिका में भी कई जगह ट्रंप प्रशासन का विरोध देखने को मिल रहा है. यूएस सीनेट ट्रंप प्रशासन के खिलाफ एक प्रस्ताव ला सकती है. क्या कहना चाहेंगे सर?
जवाब: सही बात है. ट्रंप की लोकप्रियता गिर रही है. 80 लाख लोगों ने अलग-अलग राज्यों में ट्रंप की युद्ध नीति के खिलाफ प्रदर्शन किया. और पत्नी के साथ एक गए थे. कोई म्यूजिक हुट हुआ. युद्ध के माहौल में कोई हूट होता है क्या? कोई राष्ट्रपति, कोई प्रधानमंत्री वो हुट हुआ वहां पे. दूसरा सवाल यह है कि यह जो ट्रंप का गिरता हुआ लोकप्रियता का ग्राफ है तो लोग तो देखते हैं ना आसपास में. उनको तो देश चलाना है. तो सीनेट में सीरियस थिंकिंग चल रहा है कि इसके खिलाफ हम प्रस्ताव लाए. युद्ध की शक्तियां ले लेंगे. सारी इसकी जो है ये तो ये सच है. उसकी घटती हुई लोकप्रियता के कारण से और उसके गलत फैसलों के कारण से उसकी जो जो कंट्रोलिंग बॉडी है सीनेट है कांग्रेस है उनमें इसके खिलाफ प्रस्ताव लाने पे जो है गंभीरता पूर्वक विचार हो रहा है.
सवाल: अमेरिका समझौते में मध्यस्थ के तौर पर आप पाकिस्तान को कैसे देखते हैं पाकिस्तान के रोल को और दूसरा ये कि आखिर कैसे फ्लॉप हुआ इस्लामाबाद का पाक स्पॉन्सर एक समझौता शो.
जवाब: पाकिस्तान तो मैंने पहले आपसे कहा ना वो तो पीसीआर वाली बात है. पीसीआर बोलता है एंकर एक्ट करती है. उसका रिमोट जो है उसके हाथ में है. वाशिंगटन में बैठे हुए का जो है और मध्यस्थ के रूप में जो है वो डिजास्टर है. क्यों डिजास्टर इन एक्सपीरियंस्ड है. कभी पॉलिटिक्स करी नहीं है. और मुनीर ने कहां डिप्लोमेसी की? कहां राजनीति करी है? क्या है? वो तो आर्मी के लोग हैं. दैट वे जो है. तब इसमें क्या हुआ? जो प्रस्ताव बना मैंने आपसे कहा ना प्रस्ताव उल्टे सुल्टे हो गए. आपस में कम्युनिकेशन गैप हो गया. दोनों नाराज हो गए उससे. तो एक मध्यस्थ के रूप में क्या है कि पाकिस्तान मध्यस्थ है ही नहीं. उसका खुद का कोई रोल नहीं है. जिसे कहते हैं वो केवल एक पोस्ट ऑफिस है जो कहना चाहिए. तो उसका कोई रोल नहीं है. तो बस फ्लॉप शो है एक तरह से लेकिन ये है कि एक पोस्टमैन का काम वो अच्छे से कर रहा है.
सवाल: एक बात बताइए जिससे आप बात कर रहे हैं इस्लामाबाद वार्ता की. आपको लगता है कि इतनी कटुता अमेरिका, इजराइल, ईरान के बीच में आया है. सब कुछ इतना हो चुका है. इतनी नेगेटिविटी के बाद कोई पॉजिटिव नतीजा निकलेगा इसका और वो भी लॉन्ग टर्म डिपेंड करता है.
जवाब: कूटनीति तो यही होती है. जब संघर्ष हो रहा होता है तो संघर्ष के अंदर से शांति की राह निकलती है. कूटनीति इसे कहते हैं. अब देखने की बात है इस्लामाबाद में डिप्लोमेसी होती है कि नहीं या ट्रंप की धमकियों के कारण से सारा काम अस्त-वस्त हो जाता है. इसके बुल इन चाइना शॉप. तो वार्ता जो है वहां के बुल इन चाइना शॉप में कन्वर्ट हो जाती है या कि प्यार से बैठ के तसल्ली से बैठ के गिव एंड टेक करके डिप्लोमेटिक डील होती है और डिप्लोमेटिक डील होगी तो लंबा चलेगा वैसे अगर समझदारी से देखा जाए तो ट्रंप की पहली आवश्यकता है डिप्लोमेसी प्ले करने की डिप्लोमेसी की डील करने की क्योंकि उसमें जो है ना सारी एक्सरसाइज अनकल्ड फॉर थी उसकी डिप्लोमेसी वाज़ नॉट गिवेन अ चांस टू प्ले नाउ देयर इज़ अ चांस फॉर ट्रंप टू प्ले डिप्लोमेसी अब वो करते हैं कि नहीं इस पे डिपेंड करेगा
सवाल: अमेरिकी प्रशासन ट्रंप परिवार और पाकिस्तान का व्यापारिक संबंध क्या है?
जवाब: इसको लेकर भी कई सारे सवाल उठते हैं. चर्चा भी होती है. देखिए व्यापारिक रिश्तों की बात ये है कि आम व्यक्ति जानता है सारे संसार में मालूम है डिप्लोमेटिक सर्किल्स में कि वहां पे पहला जो रिश्ता उनका बना व्यापारिक रिश्ता वो जो रेयर अर्थ मिनरल्स है उसको लेके बना. क्रिप्टो करेंसी को लेके बना और एक व्यापारिक रिश्ते डेवलप हुए और उन्होंने थाने पर बुलाया मुनीर को और व्यापारिक रिश्ते आगे बढ़े उनके तो सच है ट्रंप के परिवार के पाकिस्तान के साथ व्यापारिक रिश्ते हैं. ये सारा संसार आज जानता है. सर मैंने सुना है कि इस युद्ध से ट्रंप के फैमिली मेंबर्स खासतौर पर उनके बेटे अरबों रुपया कमा रहे हैं. इसको लेकर आप क्या कहेंगे? युद्ध से तो कमा रहे हैं लेकिन युद्ध के साथ क्या है कि व्यापार रिश्ते डिफेंस में डील करने लग गए हैं. वो जो है एक बहुत बड़ा कांटेक्ट वहां पर उनको मिला है पाकिस्तान सरकार से. तो ड्रोन के काम में, डिफेंस इक्विपमेंट के काम में वो इन्वॉल्वड हैं. तो आप कह सकते हैं डायरेक्टली कि ट्रंप एंड ह फैमिली स्पेशली ह एल्डर सन जो है वो टोटली इनवॉल्व इन डिफेंस डील्स इन पाकिस्तान और ये उनके जो व्यापारिक रिश्ते हैं उनका एक प्रतीक है.
सवाल: भारत में आतंकवाद का मुद्दा और अब अमेरिका ईरान के युद्ध का पंच बनाकर अमेरिकी प्रशासन ट्रंप ने पाकिस्तान के पक्ष में जो यूटर्न लिया है उसे आप कैसे देखते हैं?
जवाब: ट्रंप हैज़ नो वैल्यू सिस्टम. ही केयर्स ओनली फॉर बिजनेस. ही इज ए ट्रांजक्शनल मैन. ठीक है? आतंक की बात हुई ट्रंप के आने के बाद. उसने खड़े होकर कहा नरेंद्र मोदी से हम आपके साथ हैं. क्रॉस बॉर्डर टेररिज्म में हम साथ हैं. आतंक को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे सारे संसार से और थोड़े दिनों में परिवार की ये बिजनेस की डील हुई उनकी. ठीक है? मुनीर डिनर पे गए वहां पे और सब कुछ बदल गया. ट्रंप के सिर बदल गए. उन्होंने कहा कि विश्व में आतंकवाद के खिलाफ जो लड़ाई है पाकिस्तान हमारा बड़ा प्राइम पार्टनर है. उसके अंदर यूटर्न ले लिया उन्होंने दैट बिकॉज़ ही हैज़ नो वैल्यू सिस्टम.
सवाल: कुछ लोगों का कहना ये है कि समझौता वार्ता में ट्रंप के द्वारा भारत की जगह पाकिस्तान को ज्यादा महत्व देना भारत की विदेश नीति का फेलियर है. और सर दूसरा ये कि ट्रंप ने आखिर भारत को एंबरेस करने के लिए ऐसा क्यों किया?
जवाब: विदेश नीति का फेलर बिल्कुल नहीं है. जिसे कहना चाहिए इट ए मिसचीफ बाय अमेरिकन लीडरशिप इन कंसल्टेशन विद ट्रंप जिसे कहना चाहिए टू पब्लिकली एक एंबरेस इंडिया जिसे कहते हैं लेकिन भारत उससे ए्बरेस नहीं होता. अमेरिका भारत से वैसी की वैसी बना के रख रहा है. आप देखिए वहां के विदेश मंत्री आ रहे हैं. एक फोटो जारी हुआ है. अमेरिका इस कोशियस. तो ऐसा कुछ नहीं है कि पाकिस्तान कोई बहुत बड़ा मध्यस्थ बन गया और भारत के लिए ए्बरेसमेंट हुआ हो. लेकिन हां एक मैसेज जाता है मीडिया में और देखने के लिए कि यार पाकिस्तान की तो बल्ले बल्ले हो रही है ऐसा तो ऐसा कुछ नहीं है. अब सवाल यह है कि ट्रंप ने ऐसा क्यों किया? एक तो उनका दर्तक पुत्र है पाकिस्तान. उसके प्रति उनका प्रेम भाव है. जिसे कहना चाहिए. ठीक है. और दूसरा क्या है? ट्रंप बेसिकली इज अ अनग्रेटफुल पर्सन. नरेंद्र मोदी ने क्या नहीं किया उनके लिए?
एक तरह से भारतीय जो मतदाता है वहां पर प्रवासी अमेरिका में कहा भी था लोगों ने कि नरेंद्र मोदी उसके लिए वोट मांगने आए हैं. उस सीमा तक गए वहां पे टेक्सास में गए वहां पे 500 लोग थे वो हुआ था ना हाउ डी मोदी उसको एक इलेक्शन रैली के रूप में देखा गया अमेरिका में और उस समय सब ने महसूस किया कि इनके लिए एक तरह से वोट मांग रहे हैं. इनके आधार को मजबूत कर रहे हैं वहां पे ताकि भारतीय मतदाता लाखों में है और ट्रंप के साथ खड़े रहे. फिर नरेंद्र मोदी ने उनको अहमदाबाद बुलाया. डेढ़ लाल थे स्टेडियम में इतना महिमा मंडण, इतना ब्रांड जो ट्रंप का ब्रांड है उसको मजबूत किया एशियन महाद्वीप में जो है आप देखिए उसका परिणाम क्या है तो नरेंद्र मोदी जानते हैं इस बात को उन्होंने एक ही बार सोच के एक पल के लिए रात को सोचा होगा ही यूज़लेस ही इस अनग्रेटफुल बस और फिर भूल गए उसको ऐसा लगता है मुझे जो है लेकिन सारा संसार देख रहा है तो ये जो आपने कहा ना कि ऐसा क्यों हुआ तो ट्रंप का ये नो वैल्यू सिस्टम एंड ही अपीयर्स टू बी अनग्रेटफुल पर्सन दिस इज ऑल भारत का कोई एंबरेसमेंट नहीं है.
सवाल: पाकिस्तान दौरे से पहले अमेरिका ने जेडी वांस और प्रधानमंत्री मोदी की एक गरमजशोभरी तस्वीर साझा की है. ये एक इत्तेफाक है महज या फिर आपको लगता है ये दोहरी कूटनीति का हिस्सा है.
जवाब: नहीं दोहरी नहीं इत्तेफाक नहीं इट अ वेल थॉट मूव. इट इज़ अ स्मार्ट डिप्लोमेटिक मूव ऑन द पार्ट ऑफ़ अमेरिकन एडमिनिस्ट्रेशन जिसे आप कहते हैं. वो ये कहना चाहते हैं कि दक्षिण एशिया की जो राजनीति है जी. आज भी उसका केंद्र उसका सेंटर दिल्ली रहेगा ना कि इस्लामाबाद. इसमें एक मैसेज है जो अमेरिका ने दिया है. नॉट अ कोइंसिडेंट
सवाल: मैंने सुना है मौजूदा संघर्ष को देखते हुए ट्रंप प्रशासन ने 2025 की तुलना में 2026 में जो अमेरिका का रक्षा बजट था उसे 42% तक बढ़ा दिया है. तो क्या अमेरिका अब विकास का रास्ता छोड़कर सारा जीवन युद्ध लड़ता रहेगा.
जवाब: ऐसा ही दिख रहा है. अभी तो अगर अमेरिका लंबा उलझ गया इसमें जैसी संभावनाएं दिख रही हैं. उन्होंने दूरदर्शिता नहीं दिखाई, बुद्धिमता नहीं दिखाई, दो चार पांच साल युद्ध में उलझ गए तो युद्ध रहेगा. लोग अमेरिका को विकास के लिए याद करते थे. साइंटिफिक रिसर्च के लिए याद करते थे. भूल जाएंगे. एक दूसरा वियतनाम बन जाएगा. आप लड़ते रहेंगे. इसकी संभावना से आप इंकार नहीं कर सकते. और जो बजट बढ़ाया उन्होंने आप देखिए और उसको देखा देखी जो संसार के 100 राष्ट्रों ने मैंने पढ़ा अपना रक्षा बजट बढ़ा दिया. सारे विश्व के अंदर एक युद्ध उन्मुख माहौल जो है ना ट्रंप ने क्रिएट कर दिया है. डेवलपमेंट हैज़ टेकन बैक सीट. वॉर है टेकन द फ्रंट सीट एंड द एंटायर कटसी और डिटसी गोस टू ट्रंप ओनली
सवाल: अभी चार दिन पहले अमेरिका ने ईरान को चेतावनी दी और चेतावनी में गाली गलौज उनकी ओर से की गई ये जो भाषा है ट्रंप की आप इसे कैसे देखते हैं
जवाब: इस पे सारा देश शर्मिंदा है. संसार शर्मिंदा है. अमेरिका को भी शर्मिंदा होना चाहिए. कि हम अंग्रेजी स्कूलों में जाते हैं, पढ़ते लेकिन इसके लिए जाते हैं कि हम एक ईरान की लीडरशिप को गाली गलौज कह दे. आप बताइए मैंने देखा ट्वीट इतनी निराशा, इतना फ्रस्ट्रेशन अरे कुछ तो ध्यान रखो और सबसे बात है कि उसे कंट्रोल करने वाला कोई व्यक्ति नहीं है अमेरिका में. कोई ऐसा मैकेनिज्म नहीं है कंट्रोल करे उसको के स्टॉप इट. क्या कर रहे हैं आप ये? हम तो सारा संसार हैरान है. तो जैसे कहते हैं ना आदमी जब वृद्ध होता है तो अपना लूज़ कर जाता है. जैसे मुझे लोग कहते हैं याददाश्त खो जाती है. ठीक. हम उम्र के साथसाथ ये लक्षण कहते हैं दिखते हैं उसमें जो है तो उम्र के साथ-साथ लक्षण दे रहे हैं क्योंकि मानसिक संतुलन खो रहे हैं. दैट है और कितनी मतलब गाली गलौज करना इस लेवल पे तो ये बहुत ही शर्मनाक घटना है संसार के लिए अमेरिकनंस के लिए और डिप्लोमेटिक वर्ल्ड के लिए. हम तो
सवाल: इन सारे हालात में युद्ध खत्म कैसे होगा और किन शर्तों पर होगा?
जवाब: इसका सीधा उत्तर तो यह है कि इसका जवाब उस आदमी के पास भी नहीं है जिसने युद्ध शुरू किया है. ट्रंप कोई भी युद्ध शुरू होता है तो उसके दो काम होते हैं. एक तो लक्ष्य तय होता है. फिर लक्ष्य प्राप्त हुए कि नहीं उसके मूल्यांकन पे उसका भविष्य तय होता है. ट्रंप का लक्ष्य ही तय नहीं है. एक पल में कहते हैं मैंने युद्ध जीत लिया है अमेरिका में. एक कहते हैं युद्ध की शुरुआत कर रहे हैं. अभी जो है ये उनके दिन के तीन स्टेटमेंट तीनों कंट्राडिक्टरी होते हैं. तो ये तय ही नहीं है ट्रंप के माइंड में कि मेरा लक्ष्य क्या था? अपेरेंटली सबको मालूम है. उसे परमाणु हथियार हटाने थे. उनको लाइन पे लाना था और मुझको खुला करना था. सारी बातें हैं. लेकिन ये तो एक उस तरह से ना बाकी लक्ष्य क्या था? टारगेट व्हाट इंस्पायर्ड ट्रंप टू कॉल ए मिडनाइट अटैक ऑन ईरान जो कि वार्ता चल रही थी. किसी को मालूम नहीं है. ट्रंप को मालूम नहीं है. जिसने युद्ध शुरू किया उसी को मालूम नहीं है युद्ध कब खत्म होगा.
सवाल: कितने महीने कितने साल तक ये लड़ाई चलने वाली है. क्या अमेरिका एक बार फिर से तेहरान में बगदाद की पुनरावृत्ति करेगा?
जवाब: हो सकता है कह नहीं सकते. शुरुआत होगी तो ठीक है और वरना कुछ पता नहीं ये यूक्रेन और रूस के युद्ध से भी लंबा चल सकता है. आप देखिए वियतनाम का लंबा चला वो चल सकता है. तो अमेरिका खत्म हो जाएगा. हर समय युद्ध में ही लगा रहेगा.
सवाल: ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका ने ईरान के न्यूक्लियर कैपेबिलिटीज को खत्म कर दिया है. क्या सचमुच में ऐसा हुआ है?
जवाब: ये कहते हैं कि दिल खुश करने के लिए ख्याल अच्छा है. एक केवल परमाणु केंद्र था उनका. उसमें उन्होंने हमला किया और फिर ईरान ने कहा कि भाई ऐसा मत करो. इसे रेडिएशन होगा तो सारे देश में फैल जाएगा यहां पे. तो रुके घबराए. इंटरनेशनल एटॉमिक एजेंसी ने रोका. उनको जो है तो कोई अमेरिका का जो परमाणु का जो कार्यक्रम था उनका जो सेंटर थे सारे आपके जो है किसी पर कोई बड़ा उनको सफलता अभी तक नहीं मिली है और अगर यह परमाणु कार्यक्रम को बंद कर चुके होते तो आज वार्ता में क्यों मांग उठाते कि हम उनके परमाणु कार्यक्रम को बंद करना चाहते हैं और मेरी 99% मांग यही है ट्रंप ने कहा है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद करे तो अगर यह बात सच है कि उन्होंने परमाणु नष्ट कर दिए सारे ईरान के तो फिर आज की डिमांड कहां थी तो वास्तविकता यह है कि कोई इसमें बड़ी सफलता उनको अभी तक जो है नहीं मिली है. टॉप लीडरशिप को मारा है उन्होंने. ना तो उनका मिसाइल सिस्टम खत्म हुआ ना दूसरा सिस्टम खत्म हुआ जो है और इसलिए कुछ लोग कहते हैं कर्नल गद्दाफी ने उस समय जो है परमाणु कार्यक्रम बंद करके गलती की है और उत्तर कोरिया के वो उनके लिए कहते हैं इसने परमाणु कार्यक्रम के अच्छा किया है तो कर्स ट्रंप के सारे संसार में परमाणु शक्तिशाली होने का एक नया पैशन नई रिक्वायरमेंट नया माहौल बन गया है ट्रंप ने शोर मचाया ईरान के परमाणु कार्यक्रम बंद करने का सारा जो है इससे और फैल गया वो संसार के देशों में जो कांसेप्ट है नॉन न्यूक्लियर होने का वह डैमेज हुआ इससे.
सवाल: इसी बीच ट्रंप ने एक और नई धमकी दे दी कि जो भी ईरान को जो भी देश हथियार बेचेगा उस पर 50% एक्स्ट्रा टेरिफ लगेगा. तो सर ये जो ट्रंप का टेरिफ वॉर है वो कहां जाकर थमेगा?
जवाब: अब तो क्या है के मतलब लोग इसका मजाक उड़ाते हैं. हंसी उड़ाते हैं. टेरिफ हैज़ बिकम अ सब्जेक्ट ऑफ़ जॉक एंड मिजरी. कि क्या है ये? दैट वे जो है तो कोई सीरियसली नहीं ले रहा इसको. कल ही बयान आ जाएगा कि मैं उसको स्थगित करता हूं अगले तीन महीने के लिए. पीपल आर फेड अप एंड पीपल हैव मेड देर माइंड टू नॉट टू लुक एट एनी थ्रेट ऑफ ट्रंप ऑन टेरिफ एटलीस्ट.
सवाल: मुझे लगता है कि ग्लोबल पॉलिटिक्स में ईरान का रुतबा, दबदबा और क्रेडिबिलिटी काफी ज्यादा बढ़ी है. खासकर मुस्लिम वर्ल्ड में और भारत में ईरान हीरो और खाड़ी देशों में ईरान एक सुपर पावर बनकर उभरा है.
जवाब: फैक्ट ईरान हैज़ अमर्ज एज अ विनर विद हाई मोरल. ट्रंप एस एस ए लूजर विद लो क्रेडिबिलिटी लो मोराल और सारे संसार ने देखा है कि वो लीडरशिप को किल कर पाया इजराइल के सहयोग से जो है नष्ट कर पाया आपके जो इंस्टीटश है उनको इंफ्रास्ट्रक्चर उसको लेकिन लड़ाई जीत नहीं सका उनके मोराल को तोड़ नहीं सका और उल्टा क्या हुआ गल्फ कंट्रीज हिट हो गए उसके अंदर आपने देखा जापान और वो लोग सोचने लग गए दूसरे जो है तो कुल मिला के ये स्थिति बिल्कुल फैक्ट है ईरान एज अमर्ज अगेन ए जैसे रेकलिनिंग फोर्स और ए हीरो और ए न्यू ब्रांड इन द एंटायर मुस्लिम वर्ल्ड स्पेशली जो है और संसार के सारे मुस्लिम राष्ट्र क्योंकि मुस्लिम राष्ट्र में क्या है मुस्लिम लोगों में एकता बड़ी अदूत होती है एक जैसा सोचते हैं एक जैसा करते हैं दैट विल है तो आज चाहे भारत है मुस्लिम जहां भी है ईरान हैज़ एमर्ज एज अ हीरो अमंग ऑल मुस्लिम स्पेशली और जो नॉन मुस्लिम है उन्हें उसका दबदबा है कि देखो हमने क्या किया हमने ट्रंप को हरा दिया इम्रेशन तो ये है ना ईरान हैज़ वन बैटल ऑफ़ परसेप्शन और वो परसेप्शन सारे संसार में आज तक तो यही है कि भाई ट्रंप हारा ईरान जीता. नैतिक हार की बात हो रही है. तो आज तो यही स्थिति है.
सवाल: क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि जो इस ऑपरेशन में ईरान के खिलाफ जो चल रहा है इजराइल और अमेरिका का अनकॉल्ड फॉर ऑपरेशन में कहीं ना कहीं अमेरिका की इकॉनमी पर ही फर्क पड़ा है और लॉन्ग रन में आप क्या कुछ इफेक्ट देख पाते हैं?
जवाब: अमेरिका बर्बाद हो रहा है. लॉन्ग रन में अगर ये चलता रहा तो और बर्बाद हो जाएगा. आज धनी राष्ट्र की इमेज है. एक भिखारी तो नहीं कहूंगा लेकिन एक गरीब राष्ट्र की इमेज उसकी जो है बन जाएगी. रही बात इकॉनमी की तो अब एक दिन का खर्चा जो है वो एक अरब डॉलर का वो रोज का आ रहा है. हम और लड़ाई कितने दिन चलेगी मालूम नहीं. वियतनाम में घुसे थे तो 3000 सैनिक लेकर के घुसे थे. ठीक है? और ये था कि जल्दी खत्म कर लेंगे. चार साल बाद मालूम पड़ा कि 5 लाख अमेरिकन सैनिक हो गए हैं और अमेरिका दिवाली होने की कगार पर आ गया है. तो यह स्थिति अगर चलती रही यहां पे जिसे कहते हैं इट वेरी वेरी सीरियस सिचुएशन फॉर अमेरिका.
सवाल: जहां तक तेल और गैस का सवाल है इस संघर्ष के चलते ईरान और खाड़ी देशों के तेल, गैस और इंफ्रास्ट्रक्चर को काफी ज्यादा नुकसान पहुंचा है. उनको फिर से डेवलप करने में, पुन निर्माण करने में और उस नुकसान की भरपाई करने में कितना वक्त लग सकता है?
जवाब: बहुत वक्त लगेगा. अभी तो कैपेसिटी 70% रह गई है. और यह एक ऐसा पॉइंट है जब सब लड़ाई करके लोग आकर बैठ जाएंगे अपने-अपने कैंप में तो बहुत रोएंगे कि हमने क्या किया अपने हाथ से. सारे हमने पोल उड़ा दिए. सारे गैस की फैक्ट्रियां उड़ा दी हमने ऑयल के जो इंस्टॉलेशन थे वो उड़ा दिए. समय लगेगा इसमें. और इस उस इस कमी को और इस दुख को सारा संसार भुगतेगा. ऑयल और गैस केवल वहीं के लिए थोड़ी है. सारे संसार में आती है. आप देखते हैं तो बहुत नुकसान हुआ है इससे. एंड इट विल टेक इयर्स अभी 70% कैपेसिटी है. लड़ाई रुक जाएगी तो साल दो साल में वापस 100 पे आ जाएंगे. लड़ाई नहीं रुकेगी तो दे गो डाउन एंड डाउन एंड डाउन.
सवाल: इसी बीच ईरान ने एक और चेतावनी दी कि अगर ट्रंप ने अपनी सेना भेजकर स्टेट ऑफ हॉर्मोज को खुलवाने की कोशिश की तो फिर ईरान हूतियों की मदद से लाल सागर में बाबल मनदीप को बंद करवा देगा. इसको लेकर आप क्या कहेंगे?
जवाब: ठीक है उनका एवरीथिंग इस फेयर इन वॉर जो है अब 20% ट्रैफिक सारा संसार का जो है यह होम से गुजरता है और जो दूसरा लाल सागर का है 10% कैपेसिटी उसकी है इफ दे जॉइन हैंड्स तो 30% संसार की स्थिति जो है उसमें फंस जाएगी थोड़ा ईरान का एक मोरल मैसेज जाएगा परसेप्शन का कि हम अकेले नहीं है. हम केवल अपने साधनों तक सीमित नहीं है. दूसरे लोग भी हमारे साथ खड़े हैं. और हम संसार की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं. तो यह जो उनका है जो पॉलिटिकल बारगेन है अमेरिका का उसको एडवर्सरी जो है प्रभावित करेगा. तो फैक्ट है ये कि ताकत बढ़ेगी ईरान के इससे.
सवाल: हॉर्मोज को खुलवाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी कि यूएनएससी में फ्रांस, चीन और रशिया का बार-बार वीटो रखना ईरान के पक्ष में?
जवाब: वो दोस्ती निभा रहे हैं. अपने डिप्लोमेसी कर रहे हैं. ईरान के पक्ष में और मुझे नहीं खुले इसके लिए क्या ईरान के साथ हैं. वो इनके खिलाफ हैं. इज़ अ पार्ट ऑफ़ द डिप्लोमेसी मूव. नथिंग रोंग इन इट.
सवाल: सीजफायर के बारे में अलग-अलग दावे हो रहे थे. ईरान अमेरिका के बीच में तनाव था. फिर एंड वक्त पर युद्ध विराम कराया किसने?
जवाब: दोनों पक्ष ये कहते हैं कि हम नहीं झुके. सामने वाले ने युद्ध विराम कराया. ठीक है. लेकिन एक्चुअल में इसमें चाइना का रोल रहा है. यह भी कहा गया है कि ट्रंप ने पाकिस्तान पे प्रेशर डाला. यार कराओ किस तरह से? मुझे निकालो इस संकट में से सुबह 5:00 बजे. दैट इज है. लेकिन चाइना का रोल मेरे आकलन में डिसाइसिव था. चाइना ने धमकी दी ईरान को कि आप कर लो इसको मान जाओ बस बात. मेरा सपोर्ट चाहते हो तुम मोटी भाषा में. तो ईरान ने पलट के कहा कि हमें इस बात की सुरक्षा गारंटी चाहिए कि जो वार्ताओं के दौर होंगे इजरायल कहीं हमें वहीं नहीं उड़ा दे आके हम जो है तो सुरक्षा गारंटी चाहिए. तो गारंटी दी गई. तो मोटे तौर पर मैं मानता हूं कि यह जो हुआ है इसमें पाकिस्तान का थोड़ा सा रोल रहा है लिटिल और मेजर चाइना का रोल रहा है डिसाइसिव रोल रहा है और मुझे ये भी लगता है कि कोई ना कोई सीक्रेट अंडरस्टैंडिंग पॉलिटिक्स में होता है ना साथ-साथ चलती है तो ट्रंप और चाइना के बीच कोई चल रही है और ट्रंप जा भी रहे हैं चाइना आप देखिए तो हो सकता है ट्रंप ने चाइना का मोरल सपोर्ट मांगा हो कि यार मुझे बाहर निकालो ऐसा लगता है.
सवाल: अमेरिका और ईरान दोनों ही इस बात का दावा कर रहे हैं लगातार कि यह जो युद्ध विराम की घोषणा हुई है इससे जीत उनकी हुई है और सीज़ फायर सीज़ फायर जो हुआ उससे कहीं ना कहीं यह माना जा रहा है कि एक तरीके से पहल भी दूसरी पार्टी ने की यानी कि अमेरिका कह रहा है ईरान ने की और ईरान कह रहा है अमेरिका ने किया.
जवाब: बिल्कुल सही है. ट्रंप कह रहे हैं कि ईरान की अपील पे हमने समझौता किया है. ठीक. ईरान साइलेंट है. लेकिन ईरान का एक्शन और सराउंडिंग्स यह बताती है चारों तरफ कि जो प्रेशर ट्रंप ने क्रिएट किया समझौते के लिए उसे मैसेज क्लियर जाता है एक तरह से कि ये समझौता तो जैसे कहा ना गिड़गिड़ाया क्या अमेरिका जो है हम तो अमेरिका ने प्रेशर क्रिएट करके इधर से उधर से वो समझौता जो है वो करवाया ईरान हो सकता है उतना इंटरेस्टेड नहीं था समझौते के अंदर जो है तो हम ये इसको कंक्लूड कर सकते हैं कि ट्रंप ने अपने प्रयासों से और अपने व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और रेपुटेशन की उसके लिए जो है ये समझौता करवाया आया और यह जो कह रहे हैं ना कि ईरान की अपील पे हुआ इससे मैं सहमत नहीं हूं.
सवाल: तो फिर आपको यह लगता है क्योंकि ट्रंप ने भी इस तरह के संकेत दिए कि इस पूरे सीज फायर के प्रकरण में चीन का भी एक बड़ा रोल रहा.
जवाब: वो तो खुद कहते हैं कि चीन का रोल है. उसको उन्होंने एकनॉलेज किया है. तो यह मतलब बड़ी डिप्लोमेसी ब्रिलियंस की बात है कि ट्रंप मतलब एक सामान्य व्यक्ति की भाषा बोल रहा है. कोई व्यक्ति अगर आपको कर रहा है तो उस उस ऑब्लिगेशन को स्वीकार कर रहे हैं वो और कह रहे हैं कि ठीक है चाइना से रख रहा है. तो अच्छी बात है कि ट्रंप रिकॉग्नाइजेस द कंट्रीब्यूशन ऑफ़ चाइना जो है तो इससे अल्टीमेटली जो विश्व शांति है उस दिशा में ये एक अच्छा कदम है कि ट्रंप और चाइना दे आर कमिंग क्लोजर.
सवाल: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का एक स्टेटमेंट आया नेवर इंटरप्ट योर एनिमी व्हेन ही इज मेकिंग अ मिस्टेक. तो किस तरफ इशारा है शी जिनपिंग का?
जवाब: इशारा क्लियर है ट्रंप की तरफ है इशारा उनका. बड़े अ ब्रिलियंट स्टेटमेंट. इसे कहते हैं राष्ट्र अध्यक्ष होना. इसे कहते हैं राष्ट्रपति होना. साल में एक बार बोलना. ठीक है? बुद्धिमता की बात करना, विज़डम की बात करना, अकल की बात करना, स्ट्रेटजी की बात करना, डिप्लोमेसी की बात करना. आप देखिए और यह तो सब जानते हैं एक तरह से खुद शक है ट्रंप को शक है कि मेरे मित्र जरूर हैं अपेरेंटली लेकिन चाइना रशिया जो है ना ये बैक डोर से और रिमोट कंट्रोल पे ईरान के साथ खड़े हैं और पिन पॉइंटेड जानकारी देके उनको हमारे जो अटैक हो रहे हैं अमेरिकन इंस्टालेशन पे ईरान कर रहा है वो खुद इस बात से हैरान है दैट वे तो ये तो है पॉलिटिक्स में एवरीथिंग इज जायज जो कहना चाहिए तो वो डायरेक्टली इनडायरेक्टली है ना उसको सपोर्ट कर रहे हैं
सवाल: एक बात बताइए ये सब कुछ सीज फायर के बावज जूद भी क्या अमेरिका मान जाएगा? वो अपनी ग्राउंड फर्सेस या अपनी जो सेना है जमीनी सेना वो ईरान में नहीं भेजेगा?
जवाब: देखो ये बड़ा मुश्किल सवाल है लेकिन जहां तक मेरा खुद का आकलन है वो आकलन ट्रंप के विचारों पे उनके उद्रत करते हैं विचार जो उनकी घोषणाएं हैं उस पे आधारित है. वो घोषणाएं रोज बदलती है दिन में तीन बार. तो वह जो मोह है उनका घोषणा करने का और आगे बढ़ने का और यह कहने का समझौते पालना मैं पूरी दुनिया को नष्ट कर दूंगा तो कोई बड़ी बात नहीं कि ग्राउंड फर्सेस को वहां उतार दें वहां पे जो है और यह एक आत्मघाती फैसला हो सकता है उनके लिए कारण क्या है 14 लाख आर्मी है ईरान के पास और राष्ट्र में ऐसा राष्ट्रवाद का माहौल चल रहा है इसमें जैसे कहना चाहिए उसकी आंच में राष्ट्रवाद पक रहा है राष्ट्रीयता की आंच में जो है तो जो जनता है वो कहती है हम रजिस्ट्रेशन करवा रहे हम सैनिक बनना चाहते हैं. हम लड़ना चाहते हैं. दूसरा वियतनाम दैट विल है तो बहुत लंबा चलेगा. तो ऐसा लगता नहीं है मुझे कि ट्रंप जमीन पे उतारे लेकिन कह नहीं सकते ट्रंप के बारे में. उसके मन में ऐसा होगा कि चलो एक बार मैं इसको डिस्ट्रॉय कर देता हूं को नीचे उतार के लोगों को वहां पे जो है वो भी एक डिफरेंट स्टोरी है. मैं इस संभावना से इंकार नहीं करता. ट्रंप का जो मूड आज जो है उसकी धमकियां जो है उससे मैं इंकार ये नहीं करता कि वो वहां अपनी सेना नहीं उतार दे उतार सकता है.
सवाल: ये जो स्टेट ऑफ हार्मोज के इर्द-गिर्द सारी बातें रहती हैं. क्रिटिकल जो ये जगह है स्टेट ऑफ हार्मोस है जहां से इतना 20% तेल गैस जाता है क्या डोनल्ड ट्रंप अपनी मिलिट्री को भेजकर इसको खुलवा सकते हैं? क्या इतनी क्षमता है?
जवाब: कर सकते हैं. क्षमता में तो कोई इशू नहीं है. कुछ ग्राउंड फोर्सर्सेस भेज देंगे. बाकी एयरफोर्स है, नेवी है. बिल्डिंग उड़ाना ही तो है उस रास्ते को. सकरासा रूट है उस रास्ते को उड़ाना है और वह क्या उड़ाएंगे ईरान ने पहले इल्जाम कर रखा है कि जैसे था कि रानियां कूद जाती थी कि शत्रु आ रहा है एक जमाने में तो आत्मरक्षा व्यक्ति कारवाई करता है कभी-कभी जैसे कहते हैं बिखेर देता है चीजों को दैट वे तो ईरान ने तैयार कर रखा है सारी उसने सुरंगे बिछा रखी है अंदर उनको दिक्कत आ रही है जहाज को पास करने में वो सोचते हैं कल को अमेरिका अगर आया तो हम अपने हाथ से उड़ा देंगे इसको दैट वे तो सवाल ये है कि होरमज के उड़ने की पूरी संभावनाएं हैं चाहे अमेरिका उड़ाए उसको चाहे ईरान खुद उड़ाए उसको तो संसार में जो अंधेरा होगा उसके कारण से पेट्रोल डीजल का वो देखा जाएगा उसमें लेकिन आज उसको उड़ाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता अगर ट्रंप का यही मूड रहा तो
सवाल: भारत और अन्य देशों के शेयर मार्केट पर क्या असर पड़ रहा है इस कथित सेस फायर का और भारत की अगर शेयर मार्केट की बात करें क्या फिर से धीरे-धीरे खड़ा हो रहा है
जवाब: भाई शेयर मार्केट तो डूब ही गया था देखिए ₹51 लाख करोड़ लोगों के डूबे इसी 40 दिन में अब मार्केट खड़ा हो रहा है. मेरे एक मित्र हैं संजीव श्रीवास्तव थोड़ा बहुत शेयर देखते हैं. तो उन्होंने कहा 86,000 जो है पे पहुंच गया था इंडेक्स जो है और वो 71 पे आ गया. आज मैंने देखा रात की 77 पे बता रहे हैं आ गया. तो जबरदस्त इसे कहना चाहिए इंप्रूवमेंट है रिकवरी है इसमें. दैट वे जो है तो अच्छी बात है शेयर मार्केट खड़ा होगा तो इकॉनमी खड़ी होगी. तो शेयर मार्केट बिल्कुल जो सो गया था एक तरह से निराशा का भाव था वो धीरे-धीरे इज़ ग्रोइंग अप.
सवाल: क्या इस युद्ध विराम में भी प्रधानमंत्री मोदी का जो सिद्धांत है कि युद्ध में जो भी समाधान होता है वह युद्ध के मैदान में नहीं बल्कि टेबल टॉक से होता है. क्या वो प्रमाणित हुआ?
जवाब: 100% प्रूव मोर देन वंस जिसे कहना चाहिए वो कई बार कह चुके हैं इसके अंदर है कि लड़ाई डिप्लोमेसी डायलॉग से ही जीती जा सकती है. स्यूशन वार का वहीं से आएगा. अल्टीमेटली क्या हो रहा है आज? इस्लामाबाद में बात हो रही है ना हम लड़ लिए 40 दिन 40 दिन तक आपस में एक दूसरे को नष्ट कर दिया घूम के कहां आए वापस उसी टॉक टेबल पे आए हैं और नरेंद्र मोदी को इंतजार है कि रूस और यूक्रेन उन्हें कब बुलाते हैं पहले बुलाने वाले थे समझौता कराने के लिए फिर कुछ डलट हो गई सिचुएशनंस तो जाके समझौता कराओ वहां पे इससे तो नरेंद्र मोदी का जो डॉक्टाइन है जो प्रिंसिपल है ये ग्लोबली प्रूव हो गया इस बार कि सशन ऑफ़ वॉर नॉट इन ग्राउंड इट्स ऑन द टेबल ओनली डिप्लोमेसी एंड डायलॉग जो नरेंद्र मोदी का डॉक्ट्राइन प्रूव हुआ है कि सॉल्यूशन लाइ ओनली विद डायलॉग एंड डिप्लोमेसी उसे मीडिया ने लिखा संवाद की राह जो है तो नरेंद्र मोदी के जो स्लोगन होते हैं जो सक्सेस होते हैं जो ब्रांडिंग करते हैं एक तरह से एक और पॉपुलर ये स्लोगन है इसका नरेंद्र मोदी के उस लोकन को देखते हुए संवाद की राह अर्थात डायलॉग इज द ओनली सलूशन.
सवाल: युद्ध के पहले दिन से नरेंद्र मोदी का स्टैंड रहा है कि युद्ध में फंसे भारतीयों की सुरक्षा सरकार की टॉप प्रायोरिटी है. आम नागरिकों के प्रति प्रधानमंत्री की इस कमिटमेंट को आप कैसे देखते हैं?
जवाब: अब्सोलटली सारा देश प्रभावित है इससे. उन्होंने सरेआम कैबिनेट में और सब जगह कहा कि सिटीजन सेफ्टी फर्स्ट जो है यह और किया उन्होंने और इसकी तारीफ है सब जगह. सबसे बड़ी बात यह है वो जो कहते हैं ना कई बार लोग फिर वही पुरानी बात मोदी है तो मुमकिन है. इस सारी लड़ाई में उन्होंने एक-एक दिन बैठ के इस तरह से सिचुएशन को मॉनिटरिंग किया. कौन आदमी कहां फंस गया है? उसको निकालो वहां से. कौन सा सामान कहां अटक गया? हमारा गैस ऑयल अटक गया. उसको ये लाओ यहां पे जो है तो नरेंद्र मोदी का कमिटमेंट है. एंड वंस अगेन नरेंद्र मोदी हैज़ प्रूव्ड ह कमिटमेंट ही हैज़ स्टुड बाय ह कमिटमेंट और सारा देश जानता है इस पूरी लड़ाई के अंदर में भारतीय सुरक्षित है सब जगह भारतीय में कोई हमला नहीं हुआ जो सामान नहीं आ रहा था और टैंकर भी आए तो ईरान इन अवे उनकी लड़ाई थी ईरान ने हमें टैंकर आने दिए तो नरेंद्र मोदी का जो प्रिंसिपल है दैट जो है ना कि सिटीजन सेफ्टी फर्स्ट वो उन्होंने प्रूव किया है इसमें सर और पीएम मोदी की कूटनीति का एक ऐसा चमत्कार है कि इस युद्ध में अमेरिका और ईरान दोनों ही भारत को और पीएम मोदी को अपना मित्र राष्ट्र समझ रहे हैं. मित्र समझ रहे हैं पीएम मोदी को भी.
सवाल: जिस तरीके से ईरान ने स्टेट ऑफ हॉरमोस से भारत के जहाजों को निकलने के लिए सेफ पैसेज दिया है. ये कैसे देखते हैं आप?
जवाब: अब्सोलुटली इट इज अ डिप्लोमेटिक मिरेकल ऑफ नरेंद्र मोदी. ईरान कभी हमारे खिलाफ हुआ करता था. ठीक है? अमेरिका के साथ रिश्ते हमारे अच्छे हैं. इसके बावजूद ईरान आज एक मित्र के रूप में खड़ा है. उन्होंने कहा कि वी आर फ्रेंड्स डोंट वरी. आप चिंता मत कीजिए. आप मित्र के साथ खड़े हैं और हमारे टैंकर तिरंगा लगाए उस पर जो पूर्णिमा ने कहा कि आ रहे हैं वहां से चले जो है कितनी बड़ी डिप्लोमेटिक विक्ट्री है नरेंद्र मोदी की जो है तो इसे स्वीकार किया जाना चाहिए. तो इसमें क्या हुआ इससे कि जब इंडियन शिप्स को सेफ पैसे दिया ईरान ने तो संसार में हैरानी थी इस बात की. अमेरिका हैरान था कि ये क्या हुआ? इनकी दोस्ती कैसे हुई? तो दिस इज ओनली नरेंद्र मोदी डिप्लोमेसी ह पर्सनल रिलेशनशिप द पीपल एंड ह इमेज ऑफ अ कंस्ट्रक्टिव ग्लोबल लीडर जो है उसके कारण से ईरान ने ये फ्रेंडशिप का हाथ जो आगे बढ़ाया संसार के कई देशों को आश्चर्य हुआ बट वही बात मोदी है तो मुमकिन है.
सवाल: पीएम नरेंद्र मोदी की कूटनीति और ईरान से दोस्ती के चलते अब तक कितने इंडियनशिप हॉर्मोज को पार करके भारत पहुंच चुके हैं
जवाब: 810 शिप्स आ गए हैं एक-एक करके एक-एक शिप ऐसे आता था राष्ट्र उत्सव का माहौल होता था नरेंद्र मोदी खुस सुबह 4:00 बजे बैठकर उसको मॉनिटर करते थे और रोज दिन में मीटिंग करते हैं विदेश मंत्रालय के साथ आप देखिए गैस मंत्रालय के साथ रक्षा मंत्रालय के साथ वहां का फीडबैक लेते हैं हर दो घंटे में एक-एक शिप को मॉनिटर करते थे वहां से निकला कि नहीं गुजरात पहुंचा कि नहीं महाराष्ट्र के उस पोर्ट पे पहुंचा कि नहीं सारा जो है तो 810 शिप आए बहुत बड़ी बात थी उस समय कुल देखें अगर तो आज मैंने सुना है 27 शिप अभी भी खड़े हैं वहां पे और अब कैपेसिटी ऐसी है कि कल जो फर्स्ट डे था बहुत मुश्किल से सात शिप निकले सात वो निकले जिनका पहले एग्रीमेंट था ईरान के साथ में क्लीयरेंसेस थी उनके पास अब थोड़ा सा समझौता वार्ता का थोड़ा बहुत माहौल बना है. तो लेट्स होप कुल मिला के सुना है कि 800 जहाज वहां अटके हुए हैं और बंदरगाहों पे अरबों रुपए का सामान वहां पड़ा हुआ है. लेकिन इंडिया कंपेरेटिवली सेफ है. जो यहां की रिक्वायरमेंट है दैट वे जो नरेंद्र मोदी ने कहा है कि चिंता मत करिए. गैस और पेट्रोल की कमी कभी नहीं आने दूंगा. दैट वे जो है तो वो सिचुएशन स्टैंड करती है. इंडिया डजंट नीड टू वरी मच जिसे कहते हैं. हमारी स्थिति कंपेरेटिवली काफी ठीक है इस समय.
सवाल: प्रधानमंत्री ने कहा कि यह युद्ध की घड़ी है और युद्ध की घड़ी में परेशानियां हमें मिलकर साथ में इससे निकलना होगा. परेशानियों का सामना हमें करना होगा. सवाल यह है सर तमाम प्रयासों के बावजूद भी क्या आने वाले दिन परेशानी भरे होंगे? और दूसरा यह कि पूरे दुनिया में हम देख रहे हैं कई देश इस वक्त परेशानी से जूझ रहे हैं. तेल महंगा हो गया, पेट्रोल महंगा हो गया, गैस महंगे हो गई, फर्टिलाइजर महंगी हो गई. क्या आने वाले दिनों में भारत में भी यह स्थिति रहने वाली है?
जवाब: बेसिकली क्या नरेंद्र मोदी कॉन्फिडेंस जिसे कहते हैं हर सिचुएशन को फेस करने का जो कहते हैं मैं चुनौतियों को चुनौती देता हूं दैट वे और इस सारे संघर्ष में इस 42 दिन में सिद्ध किया है कि भारत पे भारत के इंटरेस्ट पे भारत की जनता पे कोई आंच नहीं आए कितनी बड़ी बात है आप देखिए कि पेट्रोल डीजल गैस के भाव नहीं बढ़े जी आप देख रहे हैं कितनी बड़ी बात है और सप्लाई आई थिंक जस्ट टू द ट्यून ऑफ़ 95% आप कह सकते हैं थोड़े बहुत तो हर जगह गली मोहल्ले में लाइन लगती है होता है लेकिन सारा बिलकुल जो है परफेक्ट रहा था. अब महंगाई की बात देखिए तो कोई छोटामोटा कोई असर हुआ यहां एज कंपेयर टू अदर कंट्रीज जो है यहां ना तो लॉकडाउन हुआ आप देखिए ना कीमतें बढ़ी ना ही वर्क फ्रॉम होम हुआ यहां पे जो है तो दूसरे देशों ने कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए भारत में ऐसा कुछ नहीं हुआ और मोटे तौर पे इसका सारा शेयर नेचुरली लीडरशिप को जाता है तो नरेंद्र मोदी डिर्व्स अ वोट ऑफ जिसे कहना चाहिए एप्रिसिएशन जी.
सवाल: फिलहाल तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिचुएशन को संभाल लिया है लेकिन आगे चलके इस युद्ध का भारत पर क्या असर पड़ेगा
जवाब: युद्ध अगर लंबा चलता है तो इंडिया आल्सो हैज़ लिमिटेशंस. यहां तक नरेंद्र मोदी खींच के लाए हैं देश को देश की जनता को. उन्हें तकलीफ नहीं आने दी. शॉर्टेज नहीं आने दी. भाव नहीं बढ़ने दिए. डिलीवरी सप्लाई बनाए रखी. लेकिन लिमिट है हर चीज की. अगर वहां से माल आना ही बंद हो गया, पेट्रोल आना बंद हो गया, डीजल आना बंद हो गया, गैस आना बंद हो गई. वहां से आप देखिए उसके कारण से अगर फिर महंगाई और यह सारी बातें होती हैं दैट वे जो है तो कुछ तो असर आएगा भारत पे लेकिन यह निश्चित है कि आज जो लीडरशिप है और जो उनका जो कमिटमेंट है उनकी सरकार का जिस तरह से इनवॉल्व है वो सारे प्रोसेस में असर आएगा तो वो टोकन असर होगा नॉमिनल असर होगा और संसार के किसी भी दूसरे देश की तुलना में हमारा जो नेगेटिव इंपैक्ट है इस वॉर का वो आपको कम से कम दिखाई देगा. आप देखिए ना एक सर्वदलीय बैठक करी उन्होंने पहले विश्वास में लिया सबको मिनिस्ट्रियल ग्रुप बना दिया सेक्रेटरी का ग्रुप बना दिया दिन में सबकी मीटिंग होने लग गई इतना मॉनिटरिंग तो बहुत मुश्किल है शायद ही कोई देश करता हो शायद ही कोई प्रधानमंत्री करता हो या राष्ट्रपति करता हो दैट इज तो दिक्कतें आ सकती हैं. मेजर चिंता की बात नहीं है.
सवाल: मोदी सरकार ने इस ऐतिहासिक संकट से निपटने के लिए क्या-क्या महत्वपूर्ण कदम उठाए?
जवाब: सबसे बड़ा कदम तो उन्होंने जो छूटते हुए कहा था उसके अंदर है कि सिटीजन सेफ्टी फर्स्ट जो है और दूसरा उनका भरोसा कमी नहीं आने दूंगा सप्लाई में गैस हो पेट्रोल हो ये है और तीसरा क्या है कि मॉनिटरिंग फिर जमाखों के खिलाफ कारवाई सर्वदलीय बैठक में सबको विश्वास में लेना मंत्रियों के ग्रुप बनाना सेक्रेटरी के ग्रुप बनाना दैट डेली मॉनिटरिंग करना और संसार के जो दूसरे देश हैं जहां से हमारी सप्लाई होती है उनसे पर्स पर्सनली फोन करके अपना संवाद बनाए रखना, अपना कनेक्ट बनाए रखना और अपनी जो पर्सनल इनफ्लुएंस है, पर्सनल जो मोरल अथॉरिटी है, उसको देश के लिए यूज़ करके वो इस स्थिति पे यहां तक लाए कि ये 42 दिन हमारे जो है अभी तो लगभग अच्छे कट गए. कोई बड़ी मुसीबत हमारे सामने नहीं आई है. लेकिन थोड़ा बहुत तो आएगा जब वक्त आएगा तो.
सवाल: भारत में हम कहां-कहां से यूरिया, तेल, एलपीजी, गैस ये सब ले रहे हैं. कितना स्टॉक इन सबका हमारे पास बचा हुआ है. और एक ये डेवलपमेंट जो हुआ है. कितने सालों बाद ईरान से हम तेल वापस खरीद रहे हैं. गैस खरीद रहे हैं. तो ये एक पॉजिटिव डेवलपमेंट देखते हैं आप.
जवाब: देखिए पहला तो आपने कहा तो मैंने कहा कि 92% एलपीजी तो जो है चार देशों से आता है. तेल और ये सब 41 राष्ट्रों से खरीद रहे हैं. पहले लिमिटेड था. नरेंद्र मोदी ने एक्सपैंड कर दिया उस सारे एरिया को ताकि एक सा वजन नहीं पड़े और हम किसी एक पे डिपेंड नहीं करें. तो वो तो स्थिति अच्छी है. इसमें एलपीजी की स्थिति ठीक है और पेट्रोल इसकी स्थिति ठीक है और रशिया का एक और अच्छा पॉजिटिव डेवलपमेंट हो गया. तो अब तो इंडिया में पेट्रोल और इसकी कोई कमी नहीं है. भरे पड़े हैं. अब रशिया से मैंने पढ़ा कि उनके पास में 9.5 मिलियन बैरल का स्टॉक है. तो 5.1 मिलियन बैरल जो है वो इंडिया के पास आ गया है. तो अभी तो क्या है कि इंडिया का गोदाम भरा हुआ है तेल से. आपने कह दीजिए कटसी रशियन ऑयल तो कुल मिला के कि इंडिया इज़ लकी मोदी लीडरशिप इस लकी एट द मोमेंट देश में जाने पेट्रोल गैस की उस तरह की कोई मेजर शॉर्टेज नहीं है इस समय.
सवाल: मेजर क्राइसिस ना भी हो इसकी तैयारी जैसे इसी क्रम में भारत ने सस्ता तेल और गैस लेने के लिए वेनेजुएला और अंगोला के साथ भी समझौता किया है. आपको कोई जानकारी है इसकी?
जवाब: हां समझौता किया है. 6 साल का अह समझौता है दैट जो है अभी इसी महीने 1.2 मिलियन बैरल जो है पेट्रोल आया है दोनों से. तो क्या ये नरेंद्र मोदी के वैकल्पिक रूट्स हैं जिसे कहना चाहिए. कल को कोई क्राइसिस हो जाए स्थिति में तो भारत 41 देशों से संबंध बना के छह देशों से संबंध बना के अलग-अलग अल्टरनेटिव रूट्स लेकर के अपना घर को भर के रखे. अपने स्टोर को गोदाम को भर के रखे जिसे कहते हैं. तो इट्स अ गुड डेवलपमेंट. रशियन का गुड डेवलपमेंट है. वेनेजुअला गुड डेवलपमेंट है. एंगोला गुड डेवलपमेंट है. तो दे आर एनरचिंग इंडियास कैपेसिटी टू हैव पेट्रोल, डीजल, गैस ये सारा जो है अच्छा डेवलपमेंट
सवाल: सीजफायर के कुछ दिन पहले ही भारत समेत 35 राष्ट्रों ने मिलकर शांतिपूर्ण तरीके से स्टेट ऑफ हार्मोस को खुलवाने की एक पहल की थी. सर उसका क्या नतीजा हुआ?
जवाब: नतीजा था कि दे क्रिएटेड अ प्रॉपर मोरल इन्फ्लुएंस ओवर ट्रंप एंड द एंटायर वर्ल्ड. और ट्रंप को दो लाइन का मैसेज था कि ठीक है कीप ऑफ फ्रॉम होमज हम खुद खुलवा लेंगे इसको बैठ के जो है आप एक तरफ बैठिए तो ट्रंप बाहर हुए उस समय उस एक्सरसाइज से उस दिन जो है और 35 देश से जो थे इन्होंने बैठ के एक अल्टरनेट सारा प्लान बनाया वहां पे वो प्लान आगे बढ़ता इससे पहले तो ट्रंप की धमकियां हमले और ये सब चालू हो गया दैट वे दैट एक्सपेरिमेंट और एफर्ट्स इज टू बी सीन एज एन अल्टरनेटिव टू ट्रंप मैकेनिज्म या ट्रंप थ्रेट्स ट्रंप की जो धमकियां और मुझ पे उसके विकल्प के रूप में ये राष्ट्रीय इकट्ठे हुए हैं और फिर कभी ऐसी स्थिति आती है तो यह राष्ट्र एक विकल्प के रूप में फिर से खड़े होंगे.
सवाल: युद्ध के कारण खाड़ी देशों से केरलम के लोग वापस लौट रहे हैं. उनकी तादाद अच्छी खासी है. इनके आने से जो अरबों रुपए का रेमिटेंस है उस पर प्रभाव पड़ेगा. साथ ही साथ इनके रोजगार का भारत में क्या होगा?
जवाब: देखो लौट के तो आ रहे हैं. अब दो तरह से लोग लौट के आते हैं. एक तो पहले दूसरे कई देशों में क्राइसिस हुआ तो अपने प्लेंस गए एयर इंडिया के लेके आए. अब इससे क्या मन से तो कोई लौटना नहीं चाहता. हम जो काम धंधा चल रहा है उनका यूएई में खाड़ी देशों में दुबई में आप देखिए कतर में कुवैत में सब काम चल रहा है कोई आना नहीं चाहता मजबूरी में आना पड़ा अगर वहां से तो उनका स्वागत है एट द सेम टाइम लेकिन स्वागत में क्या दो बाधाएं हैं रेमिटेंसेस बंद हो जाएंगी हम तो रेमिटेंसेस 5 लाख करोड़ की रेमिटेंसेस आती है हर साल में बहुत बड़ी बात है और एंप्लॉयमेंट का इशू है जी तो मुझे ऐसा लगता नहीं है कि कोई बड़ी संख्या में लोग छोड़ के आएंगे यहां पे लोग समय के साथ-साथ जीना सीख जाते हैं. थोड़ी बहुत लड़ाई चलती रहेगी. तो कहेंगे हम यहां ठीक हैं. दुबई में अपने जो भी है ठीक है. दुबई में यूएई में जहां बैठे हैं वहां पे हम ठीक है. कातर में बहरीन में जहां बैठे हैं ठीक है. तो बड़ा क्राइसिस आएगा नहीं. आएगा तो एक तो क्या है वो लोग जो फ़ वहां से आएगी वकेबल फ़ है वो जी. वो बाबू नहीं है वहां से काम करने वाले लोग हैं. टेक्निकल लोग हैं. वो रास्ता अपना खुद ढूंढ लेंगे. तो मेजर कोई क्राइसिस इसमें आने वाला नहीं है. लेकिन हां रेमिटेंसेस पे जरूर थोड़ा बहुत फर्क पड़ेगा. थोड़ा बहुत कुछ लोग तो आ ही जाएंगे ना यहां पे. हम वो तो कहेंगे नहीं हम तो य रहेंगे वापस नहीं जाएंगे वो एक 10 20% का उसमें फर्क पड़ सकता है
सवाल: आखिर ट्रंप और मोदी के बीच में बेसिक अंतर क्या है?
जवाब: बहुत अंतर है अगर आप एक सेंटेंस में कहे मोदी इज अ सेंसिबल एंड वाइस पर्सन ट्रंप इज अनप्रेटेबल एंड विमिकल वेरी सिंपल मोदी इज़ अ विज़नरी ट्रंप आई डोंट से ही डजंट हैव एनी विज़न बट हिज विज़न इज़ ओनली डिस्ट्रक्टिव ह विज़ नॉट कंस्ट्रक्टिव मोदी विज़ इज कंस्ट्रक्टिव यू कैन से दिस
सवाल: आखिर स्टेट ऑफ हॉर्मोस क्या है और वर्ल्ड की बाकी कंट्रीज के लिए इतना रेलेवेंट क्यों रेलेवेंट है
जवाब: कभी कोई भगवान किसी देश को कोई वरदान देता है तो ईरान को वरदान दिया उन्होंने ईरान को ओमान को वरदान दिया है का सड़ा सा रास्ता है आप देखोगे ना कोई शक्ल ना सूरत ना कोई बात ना समुद्र में हजारों मील समुद्र फैला हुआ है वो भी फैला हुआ है लेकिन ईश्वर ने उसको ऐसा दिया है कि सारा जो ट्रैफिक है 20% पूरे संसार का जो है एक तरह से क्रूड ऑयल एंड गैस सब जो है वो वहां से निकलता है. वहां से निकलना जरूरी है. अब वैसे तो आम बात है संसार में समुद्र खुला हुआ है कि आप करिए लेकिन वो मानते नहीं है. वो कहते नहीं हमारा अधिकार है और ईरान वाले और अंतरराष्ट्रीय कानून ये है कि अगर 22 कि.मी. में कोई प्रॉपर्टी ऐसी है तो आपका अधिकार है. अब ये तो क्या है कि ईरान की सीमा में केवल 5 कि.मी. भी होमूज है. इन्होंने अपना अधिकार बना लिया है. ट्रंप कहता है मैं इस अधिकार को मानता नहीं हूं. यह अंतरराष्ट्रीय जल संपत्ति है. हम इसको वैसे करेंगे. लेकिन अभी तो यह नहीं कि उनकी संपत्ति है और मतलब उनका बड़ा स्ट्रेटेजिक पॉइंट है और इस वॉर में जो अमेरिका को उन्होंने जो झुकाया है या जो किया है उसमें होरमज एक एक बड़ा सेंट्रल पॉइंट रहा है तो होरमज है उसकी एक एक गॉड गिफ्टेड एक उसकी लोकेशन है एक ज्योग्राफिकल उसकी सिचुएशन है दैट वे जो है और वो लोग अरबों रुपए कमा रहे हैं इससे
सवाल: हॉर्मोज को बंद करने के साथ-साथ ईरान ने यह कहकर भी एक बड़ा बखेड़ा यहां पर खड़ा कर दिया कि स्टेट ऑफ हॉर्मोस से चीन के जहाज के अलावा प्रत्येक देशों के जो जहाज निकलेंगे उनको $ मिलियन यानी कि हर बैरल पर $ का टोल टैक्स परमिट साथ ही लाइसेंस लेना होगा. यह मुद्दा कैसे सुलझेगा?
जवाब: बिल्कुल ठीक कह रहे हैं आप ये. अब ये तो क्या है ब्लैकमेल है. आदमी को कई अपनी शक्तियों का एहसास होता है तो आदमी मांग करता है उसको. अनरीज़नेबल मांग होती है तो आदमी कहता है ब्लैकमेल है. तो उनका ब्लैकमेल है. पैसा किसको बुरा लगता है? लेकिन ट्रंप पे होने नहीं देगा. यह तो तय मानिए आप. फिर झगड़ा हो जाएगा चार दिन बाद. वो मानेंगे नहीं. क्योंकि अभी तक होम खुला नहीं है ना प्रॉपर्ली ट्रंप कब तक वेट करेगा 4 दिन छ दिन 8 दिन और फिर वापस उसी मुद्रा में आ जाएंगे तो होरमूस से पहली बात तो ये है कि स्वतंत्र आवागमन तो हो हम टोल टैक्स तो बाद की बात है रीज़नेबल टोल टैक्स मांगेंगे तो लोग दे देंगे अगर आप दोद मिलियन डॉलर मांगोगे एक दिन के तो कोई आपको देने वाला नहीं है.
अब उनके दिमाग में आ गया मुझे तो सिर्फ 2500 करोड़ की इनकम होगी रोज की तो मैं लूंगा अब ये तो फिर वो वो वाली बात है ना ही इस नॉट फेयर दैट वे जो है तो लेट्स सी आने वाले दिनों में इस हॉर्मोस का होता क्या है? खुलता है कि नहीं खुलता है? टोल टैक्स तो बाद में है. पहले उसने कहा मैं चाइना की करेंसी में लूंगा पेमेंट. फिर उसने कहा मैं क्रिप्टो की करेंसी में लूंगा पेमेंट. फिर उन्होंने युवान में पेमेंट लिया. अब फ़ॉर्चूनेटली उन्होंने कहा ठीक है मैं तो अपनी मुद्रा में पेमेंट ले लूंगा. इसका तो वो पेमेंट का मुद्दा सॉल्व हो गया. अब सवाल यह है कि वो कब खुलता है? नंबर वन और नंबर टू $2 मिलियन जो रोज मांग रहा है इस पे राष्ट्र तैयार होते हैं कि नहीं? दिस क्वेश्चंस आर टू बी सीन इन फ्यूचर.
सवाल: और एक पल के लिए अगर मान भी लेते हैं कि अमेरिका और ईरान की जंग लंबी चलती है और स्टेट ऑफ हार्मोस लंबे समय तक बंद रहता है तो भारत समेत दूसरे देशों के पास में और समुद्री वैकल्पिक रास्ते क्या बचते हैं?
जवाब: आवश्यकता आविष्कार की जननी है. देखिए निश्चित तौर पे रास्ते बनेंगे डेवलप होंगे. वैसे तो कोई इशू नहीं है ना. समुद्र हजारों लाखों किलोमीटर समुद्र फैला हुआ है. अब मुझ फस गया बीच में हटा देंगे इसको किसी दिन जो है विकल्प में टाइम लग सकता है कुछ दिन जो है लेकिन संसार बहुत आधुनिक है. अमेरिका आधुनिक कंट्री है. बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर वगैरह उसका बड़ा स्ट्रांग है. आप देखते हैं दैट विल है तो सशन ढूंढ लेंगे लोग जो है. बेसिकली इसमें ये है कि अमेरिका विल फाइंड ए सशन इफ द सिचुएशन कम्स.
सवाल: इस युद्ध के बीच में अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने के लिए जो छूट दी थी 11 अप्रैल उसकी तारीख थी वो आज खत्म हो रही है. तो नाउ व्हाट नेक्स्ट?
जवाब: अब इसके बाद क्या मेरा आकलन की तारीख बढ़ेगी आगे हम आज अमेरिका कंडीशन थोपने की स्थिति में नहीं है और खास हॉर्मोज का जो क्राइसिस है उसको और उसे इंडिया का मोरल सपोर्ट भी चाहिए तो लगता है मुझे और आगे बढ़ जाएगी वो जो छूट है कि रशियन तेल आप खरीद सकते हो अमेरिका का कोई प्रतिबंध नहीं है तो वो जो छूट है उनकी आई एम होपफुल ये आगे एक्सटेंड हो जाएगी
सवाल: हॉब ब्लॉकेज की जो घटना है इसके बाद मुझे याद आता है 1956-57 का स्वेज नहर ब्लॉकेज वुड लाइक टू एक्सप्लेन दिस इंसिडेंट्स.
जवाब: कह सकते हैं टू सम एक्सटेंट 56-57 में नासर थे मिस्र के राष्ट्रपति एक दिन उनको ऐसा ख्याल आया तो उन्होंने स्पेस नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया हम ही तय करेंगे होम जैसे ईरान कह रहा है तो ब्रिटेन फ्रांस ने कहा ऐसा कैसे हो सकता है अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र है हम जाते आते हैं टैक्स लेना है ले लो रीज़नेबल हो जाओ तो उन्होंने कहा नहीं है ये तो हम ही तय करेंगे झगड़ा हुआ जो है आर्मी आई बीच में सब कुछ हुआ लेकिन सशन नहीं निकला अल्टीमेटली क्या डिप्लोमेटिक सशन ही निकला जो इस बात को फिर ये संकेत देता वापस कि होमज का सशन भी फोर्स को यूज़ करने में आर्मी को ग्राउंड पे लाने में नहीं है. इसका सशन डिप्लोमेसी से है जैसे स्वेज नहर का हुआ था. तो पीपल शुड लर्न ए मैसेज ए लेसन फ्रॉम स्वेज इंसिडेंट.
सवाल: 42 दिन पहले तक जो एक दुबई की छवि थी इस संसार में सेफ टूरिस्ट बिजनेस डेस्टिनेशन और प्रॉफिट मेकिंग रियलस्टेट कंट्री की इस युद्ध ने उसे तोड़ कर रख दिया. क्या आपको लगता है कि एक बार फिर से दुबई के गोल्डन डेज वापस लौटेंगे?
जवाब: लाने तो पड़ेंगे. व्हाई इज अ ट्रेजडी? स्पेशली फॉर इंडियंस आल्सो. एक घूमने का स्थान था. सस्ता था. रीज़नेबल था. जाते थे लोग विदेश है. और दुबई क्या सारे संसार की सभ्यताओं का एक मिश्रण बन गया था. जिसे कहते हैं जिओ ग्लोबल सिटी या एक सेकुलर कंट्री वर्ल्ड का जो है और संसार का जो भी नया आविष्कार होता था खासकर आरसीटेक में बिल्डिंग में आपको दुबई में देखने मिलता था. संसार का सारा फैशन, सारा ग्लैमर और संसार का सारा जो बिजनेस है, रियल स्टेट है वो दुबई में था. एक तरह से दुबई वाज़ ए न्यू डेस्टिनेशन सेंटर और बाकी देश के पुराने हो गए थे. लंदन है, आपका फ्रांस है, अमेरिका है. यह जो है दुबई 21वीं सदी का राष्ट्र था. संसार का नए से नया जो प्रयोग है दुबई में होता था. लोग खुश थे, खुशहाल थे. अब नजर लग गई. अब यह कितने दिनों में ठीक होगा जैसे कश्मीर में हुआ था पहलगांव हुआ तो तीन चार महीने हालात खराब रहे बाद में ठीक हो गए अब मैं गया श्रीनगर तो फुल था श्रीनगर सारे होटल फुल थे दैट वे तो समय लगेगा और डिपेंड इस पे करेगा आने वाले दिनों में फिर हमले तो नहीं हो रहे वहां पे जिस दिन हमले बंद हो जाएंगे दुबई पे किसी भी सिस्टम के तहत जो है उसके तीन चार पांच महीने के अंदर दुबई खड़ा होगा लेकिन फिर भी वो नहीं होगा जो था
सवाल: मैंने मैंने दूसरी ओर यह भी सुना है कि युद्ध के चलते दुबई में काम करने वाले जो लोग हैं उनकी सैलरी को अचानक से बढ़ा दिया गया. ये क्या पूरा मामला है?
जवाब: बढ़ा नहीं दिया गया. ऐसे कहना चाहिए एक इंसिडेंट है खाली. क्या हुआ? डॉलर थोड़ा ठीक रेट था. रुपया गिर गया. वो 84 था या 95 हो गया. अब वो रुपी का रेट गिर गया. उस कैलकुलेशन में सैलेड लोग जो हैं उनको एक दो महीने के लिए प्रतिमा ज्यादा मिलने लग गई. तो बस एक बात ऐसी आ गई कि युद्ध का आस्पेक्ट यह है कि जो छोटे लोग थे, सैलरी लोग थे उनको दो पैसे उसमें ज्यादा मिले.
सवाल: आपकी नजरों में हु इज दी रियल और अल्टीमेट बेनिफिशरी और अ विनर ऑफ दिस एंटायर गोइंग ऑन वॉर एक्सरसाइज?
जवाब: आई थिंक बेसिकली चाइना फॉल बाय रशिया कि उन्होंने अपने जो सबसे पावरफुल व्यक्ति था शत्रु नहीं कहूंगा कंपिटिट था इकॉनमी के अंदर सब उसके अंदर जो है उसको उन्होंने एक लंबी लड़ाई में उलझा दिया जो है और लड़ाई में उलझने से फिर नुकसान ही होता है इस पर डिबेट हो सकती है नुकसान कितना है लेकिन साइड तो नेगेटिव है ना तो रियल बेनिफिशरी जो है अब ये कोइंसिडेंस भी हो सकता है डेलीबेट तो नहीं होगा लेकिन मौके का फायदा उठाया उन्होंने या नेचर उनको फायदा दे रही है दैट वे बट द रियल बेनिफिशरी इज़ बेसिकली चाइना फॉललोड बाय रशिया
सवाल: मैंने सुना है कि अयातुल्लाह अली खामेनेई के बेटे और ईरान के सुप्रीम लीडर मुस्तबा खामनई अमेरिका के हमलों में बुरी तरह से जख्मी हो गए. अब ईरान के कौम शहर में एक अस्पताल में वो कोमा में चले गए हैं. इसे लेकर आपके पास क्या जानकारी है?
जवाब: मैंने भी पढ़ा है ये मे क्यों ट्रंप वगैरह क्या ये अमेरिकन लोग हैं या दैट ईरान का ही मानना चाहिए. यह कंपेरेटली झूठ नहीं बोलते. दैट वे दे टॉक सेंस दे आर ऑथेंटिक. एक कल्चर है. ईरान की कल्चर भी है. जब खामेनेई मारा गया तो टेलीविजन पे स्वीकार किया. उन्होंने क्या मारे गए हैं. एक दूसरे वही लीडर मारे गए थे आर्मी के उनके. वो तो उन्होंने स्वीकार किया. तो ट्रंप ने कहा कि वो किसी ऐसी शेप में है. अंग्रेजी में एक शब्द उन्होंने काम में लिया था. वो किसी शेप में जिंदा है. ट्रंप ने कहा था. उसके बाद ये लीड आई कि वहीं के एक अस्पताल में वो कोमा में चले गए हैं. इलाज करा रहे हैं. तो नथिंग रूल्ड आउट मे बी ट्रू.
सवाल: क्या ये बात सही है कि आयातुल्लाह खामिई का जो रूढ़िवादी शासन था उसके खिलाफ जो 35 से 40% की जनता थी वो अब राष्ट्रवाद के नाम पर नए सिरे से मुस्तफा खामेनेई के पक्ष में खड़ी हो गई है.
जवाब: बिल्कुल सही कह रहे हैं आप. जो मैंने कहा ना लोगों को उम्मीद थी. अमेरिका को उम्मीद थी यानी कि मृत्यु के बाद में जो है एकदम से लोग खड़े हो जाएंगे. हम शासन बदल देंगे. शासन व्यवस्था बदल देंगे. वो नहीं हुआ. भाग्य की बात है, चांस की बात है कि राष्ट्रवाद की लहर आ गई वहां पे. और आपका क्वेश्चन बिल्कुल सही है कि वह जो कॉमेनी के खिलाफ थे लोग या सत्ता परिवर्तन चाह रहे थे या महिला अत्याचार की बातें करते थे या इतने स्टूडेंट्स का जबरदस्त वो हुआ था प्रदर्शन जिसमें कहा गया था कि 40- 45,000 लोगों को मार दिया ईरान ने. ये ट्रंप कहते थे वो सारा यूटर्न हो गया एकदम से जिसे कहते हैं. तो ये सरकमस्ट्ससेस हैं दैट वे. पर बात आपकी बिल्कुल सही है कि जो लोग उनके खिलाफ थे वो भी राष्ट्रवाद की लहर में आज कोनी के साथ खड़े हैं.
सवाल: आखिर क्या वजह है? क्या कारण है कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व के मारे जाने के बाद भी जो ईरान का डिफेंस सिस्टम है वो पूरी तरह से नष्ट नहीं हुआ.
जवाब: उनका करेज कन्विक्शन है. उनका अपना अरेंजमेंट है. सबसे बड़ी अतिथि आत्मविश्वास. हिम्मत नहीं हारना जिसे कहते हैं. हिम्मत नहीं हारी उन्होंने. तब उनका क्या है कि ना तो उनका ड्रोन सिस्टम नष्ट हुआ ना मिसाइल सिस्टम नष्ट हुआ. आप देखिए पहाड़ है बड़े-बड़े पहाड़ों के नीचे सुरंगे बनी हुई है. जहां पहाड़ जमीन के नीचे सुरंगे बनी हुई है. वहां एक पैरेलल मिसाइल सिस्टम काम कर रहा है. ड्रोन सिस्टम काम कर रहा है. तो ये उनकी सफलता है. उनकी आर्मी की सफलता उनके मोराल की सक्सेस है.
सवाल: सिंस ईरान नोज़ देंस ऑफ़ हॉर्मोस नाउ एंड द वर्ल्ड नोस आपको लगता है कि एक नया पैरेलल सिस्टम शुरू हो गया है ब्लैकमेल करने का.
जवाब: ईरान के पास ये पावर आ गई है हॉर्मोस के थ्रू झुकाने की. चाहे वो अमेरिका हो, चाहे दूसरे देश हो. यह एक नया आविष्कार है. कभी-कभी क्या डिस्कवरीज होती है लाइफ में. तो डिस्कवरी है ईरान के. ईरान को समझ में आ गया कि ये जो बेकार से इतना कड़ा रूट था, मालबाग जहाज निकलते थे. वो अचानक इतना प्रभावशाली हो गया. तो उसकी बारगेन पावर आ गई ईरान के हाथ में. उसने झुका दिया सारे संसार को एक तरह से और अमेरिका प्रेशर क्रिएट कर दिया कि इसको ठीक करो. तो यह बात फैक्ट है कि यह एक पॉलिटिकल माइल्ड ब्लैकमेल या बारगेन है. जो है एक सॉफ्ट पॉलिटिकल ब्लैकमेल या बारगेन है जिसको ईरान ने डिस्कवर किया है और आगे भी भविष्य में जो बातें होंगी उसमें ईरान अपने स्टंप कार्ड को यूज़ करता रहेगा.
सवाल: फिलहाल जो ईरान है वो हॉर्मोस टोल टैक्स वसूल रहा है चीन की करेंसी युआन में. क्या ट्रंप के पेट्रो डॉलर की ताकत इससे घटेगी?
जवाब: ऑफकोर्स प्रभावित तो होगी इससे पेट्रोल डोलर वैसे भी क्राइसिस में कभी ब्रिक्स वाले कुछ कहते हैं दूसरे लोग कुछ कहते हैं हम अपना लाएंगे कुछ करेंगे यहां पे जो है लेकिन वो क्या है होता नहीं है दैट वे तो अब ये पेट्रोल डॉलर की बात तो है कि लोकल करेंसी में चलेगा तो पैसा बढ़ा है अमाउंट बढ़ा है और से जो टोल टैक्स का कलेक्शन होगा इट अ ह्यूज अमाउंट तो टू दैट एक्सटेंट डॉलर विल लूज इट्स रेलेवेंस इन दैट एरिया इट इज अबब्सोलुटली करेक्ट व्हिच यू से
सवाल: खाड़ी देशों के बाद अब जापान और दक्षिण कोरिया के मन में भी संदेह पैदा हो गया है कि अमेरिका के संरक्षण में खाड़ी देशों की तरह वो भी सुरक्षित नहीं है. तो क्या अब ये जो देश हैं ये अपने लिए ऑप्शन को ढूंढेंगे?
जवाब: अबब्सोलुटली खाड़ी देशों के इतने विकल्प ढूंढेंगे. ये सुरक्षा में क्यों गए थे अमेरिका के? क्या चाइना अटैक कर दे, उत्तर कोरिया अटैक कर दे हमारी रक्षा में आएगा. और उन्होंने देखा इजराइल की रक्षा ही नहीं कर पाए. खाड़ी देशों की रक्षा नहीं कर पाए. हमारी क्या रक्षा करेंगे? तो भरोसा टूटता है, ट्रस्ट टूटता है. तो कोई बड़ी बात नहीं है कि आने वाले दिनों में अगर खाड़ी देश अपनी लॉयल्टी शिफ्ट करते हैं अमेरिका से तो दिस जापान एंड साउथ कोरिया दे मे आल्सो फॉलो द रूट.
सवाल: अपने तुगलकी अंदाज के चलते अब ट्रंप ने अपने घर के बगल में जो एयरपोर्ट है उसका नाम रख दिया है ट्रंप एयरपोर्ट. इसे लेकर आप क्या कहना चाहेंगे?
जवाब: राजा है. राजा का मूड है और मुयर अपन कहते हैं पहले जो है तो एयरपोर्ट का नाम ही रख दिया थोड़ी सी दूर है एयरपोर्ट 50 लाख डॉलर लगा दिए उस पे ठीक करने पे जो है और वो ट्रंप एयरपोर्ट कहलाएगा तो ठीक है जीवन की कुछ अंतिम इच्छाएं होती है हर व्यक्ति की ट्रंप की भी इच्छाएं हैं जो उनकी पूरी कर रहे हैं बट फॉर गॉड सेक डोंट प्ले विद द वर्ल्ड विद द वर्ल्ड पीस.
सवाल: इसी प्रकार अमेरिका में $ के नोट पर भी ट्रंप के सिग्नेचर होंगे आखिर कहां जाकर रुकेगा ट्रंप का सेल्फ ग्लोरिफिकेशन
जवाब: होता है वि द ग्रोइंग एज कहते हैं सेल्फ ग्लोरिफिकेशन बढ़ता है तो ट्रंप इस नो एक्सेप्शन दैट वे तो डेवलप में कुछ भी चाहेंगे हो जाएगा नाम लिख दिया जाएगा उनके डेवलप साइन हो जाएंगे उनके जो है एक आदमी सोचता है मैं कुछ ऐसा कर जाऊं इतिहास मुझे याद रखे तो एक काम ये सोचते हैं कि ठीक है एक इतिहास में रहेगा करेंसी में मेरे सिग्नेचर हुआ करते थे फाइन स्मॉल थिंग्स
सवाल: एक बात बताएं इस 42 दिन के युद्ध में अमेरिका ने क्या हासिल शुरू किया हमले से?
जवाब: बेसिकली कि लॉस ऑफ डिप्लोमेटिक प्रेस्टीज वन परसेप्शन लॉस ऑफ परसेप्शन ईरान से हार गए जबरदस्त आर्थिक नुकसान ठीक है और ध्यान डाइवर्ट हो गया प्रायोरिटीज चेंज हो गई डेवलपमेंट से हटा के आप आ गए वॉर के ऊपर ट्रैप में आ गए और आगे पता नहीं है कि ट्रैप कितना लंबा चलेगा क्या यह वियतनाम बनेगा क्या बनेगा कुछ नहीं कह तभी तो अमेरिका ऑन ए लूजिंग साइड और सबसे बड़ी बात यह है कि हमला करने का कोई पर्याप्त कारण नहीं था. वह परमाणु बम बना के ले नहीं आया था. अगली सुबह उसको फोड़ना नहीं था न्यूयॉर्क में जाकर के. वो चल रहा है. उसका काम बरसों से चल रहा था. डिप्लोमेटिकली हैंडल करते या फोकस करते. आपने वेग अटैक कर दिया. आपका जो वॉर का जो गोल था वो वेग था. और अखबार ने लिखा किसी ने कि क्योंकि वेग गोल था दैट मेक्स ट्रंप मोर अनरिलायबल इन द वर्ल्ड पॉलिटिक्स तो है. तो एट द एंड ऑफ़ द डे इन टोटिटी अमेरिका स्टैंड्स ए लूज़र. ट्रंप स्टैंड्स ए लूजर.
सवाल: आज पूरी दुनिया यह बात जानती भी है, मानती भी है कि ट्रंप आज की तारीख में घायल शेर है और सबसे ज्यादा निराश व्यक्ति हैं. तो कहां पर लेकर जाएगा उनको?
जवाब: उनका यह प्रतिशोध भाव. प्रतिशोध मृत्यु का कारण है. कहते हैं लेकिन ट्रंप के मामले में क्या खुद तो मरेंगे. सबको साथ लेकर मरेंगे. और खतरा एक ही है परमाणु बटन का. क्यों? बड़ा विरोधाभास खड़ा हो गया इस समय कि ट्रंप एक्चुअल में क्या चाहते हैं? क्या वास्तव में न्यूक्लियर वॉर चाहते हैं? न्यूक्लियर अटैक चाहते हैं क्या? उनकी भाषा तो यही कह रही है. अब मन में उनके क्या है? तो उसका पता नहीं. पहले उन्होंने उस दिन कहा कि संसार की एक सभ्यता खत्म हो जाएगी. लौट के नहीं आएगी. आज फिर कह दिया कि ईरान के लोगों को यह ख्याल नहीं है, एहसास नहीं है कि आज वह इस वार्ता में भाग लेने के लिए ही जिंदा है. कितने एक निराशावादी व्यक्ति के जीवन के अंतिम वाक्य होते हैं. जैसे ऐसे वाक्य दिख रहे हैं. डरावने वाक्य तो आप कहते हैं घायल शेर है वो. तो क्या करेगा? इट इज टू बी सीन.
सवाल: अब एक ही आवश्यकता है कि चाइना जैसे लोग, रशिया जैसे लोग या भारत जैसे लोग, नरेंद्र मोदी जैसे कंस्ट्रक्टिव लोग जो हैं ट्रंप को इस आत्महत्या के रूट पे जाने से रोके. आत्महत्या संसार के लिए जो है ये तो आपने कहा कि ट्रंप के मन में क्या है और यह घायल शेर क्या करेगा?
जवाब: इट्स अ वेरी सीरियस क्वेश्चन. बहुत डरावना सवाल है. ईश्वर से दुआ कर सकते हैं कि ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे. शांति की ओर आगे बढ़े. युद्ध का रास्ता छोड़ें. एक बार नरेंद्र मोदी के साथ बैठ जाए और समझ ले बात को आकर के स्यूशन लाइ ओनली ऑन टेबल नॉट ऑन द ग्राउंड हम और अनप्रिडिक्टेबल होना भी साथ-साथ छोड़ दें क्योंकि ट्रंप बीइंग अनप्रिडिक्टेबल बिहेविंग लाइक एन अनप्रिडिक्टेबल मैन और ये कहा जा सकता है कि सब कुछ भविष्य के गर्त में है. सीज फायर को स्थाई करने की कोशिश की जा रही है. लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे कुछ बदल पाएगा? क्योंकि एक तरफ जहां पर इतिहास यह कहता है कि युद्ध खत्म नहीं होते हैं. सिर्फ युद्ध पर विराम लगता है और शायद यही वजह है कि हर सीजफायर के बाद तनाव खत्म नहीं होता है. तनाव सिर्फ टलता है. इसी बीच में जहां पर ट्रंप यह कहते हैं डील लेकिन इतिहास कहता है हर डील के पीछे एक अधूरा संघर्ष छिपा होता है. नजर सिर्फ एक जगह पर है आज इस्लामाबाद पर. क्या यह बातचीत कोई समाधान लेकर आएगी या फिर एक और डिप्लोमेटिक लाइन बनकर रह जाएगी. भारत ने अपना रुख बहुत साफ कर दिया है संतुलन, रणनीति और मजबूती के साथ. लेकिन आज की बातचीत बैठक यह तय करेगी कि यह विराम शांति की तरफ बढ़ेगा या फिर अगले संघर्ष की भूमिका को तय करेगा.
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