भारत बना रहा ऐसा हथियार, जो ड्रोन अटैक को आसमान में ही कर देगा नाकाम, जानें इसकी ताकत और खासियत

छोटे स्वार्म से लेकर बड़े निरंतर संचालन करने वाले ड्रोन एक ही बार में कई तरह की खतरे पैदा कर सकते हैं- लक्ष्य पर मारकर, खुफिया जानकारी जुटाकर या किसी अवसंरचना को निशाना बनाकर.

India is making such a weapon which will foil drone attacks
प्रतिकात्मक तस्वीर/ FreePik

ड्रोन (UAV) अब आधुनिक युद्ध के सबसे चुनौतीपूर्ण हथियारों में शुमार हो गए हैं. वे धीरे‑धीरे बड़ी ताकत बन रहे हैं क्योंकि कम लागत, कम जोखिम और उच्च क्षति क्षमता के कारण इन्हें रणनीतिक तौर पर बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकता है. छोटे स्वार्म से लेकर बड़े निरंतर संचालन करने वाले ड्रोन एक ही बार में कई तरह की खतरे पैदा कर सकते हैं- लक्ष्य पर मारकर, खुफिया जानकारी जुटाकर या किसी अवसंरचना को निशाना बनाकर. ऐसे परिदृश्य में इन हमलों को बेअसर करने के लिये प्रभावी काउंटर‑ड्रोन (C‑UAS) समाधान विकसित करना अनिवार्य हो गया है. 

इसी चुनौती का सामना करने के लिये भारत का रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) तेजी से एक उन्नत इलेक्ट्रॉनिक हथियार प्रणाली पर काम कर रहा है, जिसका उद्देश्य हवा में ही दुश्मन के ड्रोन के इलेक्ट्रॉनिक्स और नेविगेशन सिस्टमों को लक्षित कर निष्क्रिय कर देना है,, यानी ड्रोन को फिजिकली नष्ट किये बिना बेकार कर देना.

समस्या की गंभीरता और जरुरत

ड्रोन हमले पारंपरिक तरीकों से कम संकेत छोड़े बिना बहुत बड़ा नुकसान पहुंचा सकते हैं. ऑपरेशन सिंदूर जैसे घटनाक्रमों में पाकिस्तान की ओर से अनेक ड्रोन हमलों की जानकारी सामने आई, जिनमें कुछ को सफलतापूर्वक बेअसर किया गया और कुछ ने चिंताजनक जोखिम पैदा किये. यही वजह है कि सीमाओं, रणनीतिक ठिकानों और हाई‑वैल्यू संपत्तियों की रक्षा के लिए ऐसे साधन आवश्यक हो गए हैं जो कम collateral damage और उच्च लक्ष्य‑विशिष्टता के साथ काम कर सकें.

HPEM‑आधारित एयर‑डिप्लॉयड पेलोड

DRDO इन खतरों के जवाब में हाई‑पावर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक (HPEM) पेलोड के विकास पर काम कर रहा है. इसका मकसद यह है कि हवाई प्लेटफ़ॉर्म पर तैनात यह पैकेज दुश्मन के ड्रोन के संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक घटकों जैसे GPS रिसीवर, कम्युनिकेशन चैनल, कंट्रोल‑लिंक और सेंसर/इमेजिंग सिस्टम (कैमरा, LIDAR आदि) पर लक्षित इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स और शॉर्ट‑बर्स्ट ऊर्जा फेंककर उन्हें अस्थायी या स्थायी रूप से निष्क्रिय कर दे.

रिपोर्टों के मुताबिक DRDO इस पेलोड को लगभग 15 किलो से कम वजन के भीतर विकसित करने का लक्ष्य रख रहा है, ताकि उसे छोटे और मध्यम श्रेणी के ड्रोन प्लेटफ़ॉर्म पर या अन्य हवाई वाहनों पर आसानी से इंटीग्रेट किया जा सके. हल्का होना इसलिए भी ज़रूरी है ताकि गतिशीलता बनी रहे और ऑपरेशन की समयावधि, ऊँचाई और पेलोड‑मैपिंग के हिसाब से फ्लेक्सिबिलिटी मिल सके.

कार्यप्रणाली और अपेक्षित प्रभाव

HPEM पेलोड विशिष्ट इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों के शॉर्ट‑बर्स्ट जारी करके लक्ष्य ड्रोन के इलेक्ट्रॉनिक घटकों पर प्रभाव डालेगा. इसके चलते GPS सिग्नल रिसेप्शन बाधित हो सकता है, कंट्रोल‑लिंक में लॉग्ज़ या जामिंग पैदा हो सकती है, और इमेजिंग/नैविगेशन सेंसर अस्थायी या परमानेंट तरीके से खराब हो सकते हैं. परिणामस्वरूप दुश्मन का ड्रोन अपना पथ खो देगा, फंक्शनालिटी खो देगा या कंट्रोल से बाहर हो जाएगा और उसे नीचे गिराए बिना ही वह ‘बर्बाद’ माना जा सकेगा.

इसका बड़ा लाभ यह है कि लक्ष्य को नष्ट करने के दौरान होने वाले अनपेक्षित विनाश (collateral damage) या नागरिक हानि की संभावना बहुत कम हो जाती है, खासकर जब हम आधारभूत सुविधाओं या नागरिक क्षेत्रों के पास ड्रोन हमलों को रोकना हो.

C‑UAS अवसंरचना में योगदान

DRDO का यह HPEM प्रयास मौजूदा C‑UAS तकनीकों जैसे लेज़र‑आधारित डायरेक्टेड एनर्जी वेपन, रेडियो‑फ्रीक्वेंसी (RF) जैमर्स, और काइनेटिक इंटरसेप्टर्स को पूरक और सशक्त करेगा. हर तकनीक की अपनी ताकत और सीमाएँ होती हैं: लेज़र मूविंग लक्ष्यों को क्षति पहुंचा सकते हैं पर उनको उपयोगी दूरी और पावर पर सीमाएँ हैं; RF जैमर्स कम लागत पर लिंक को बाधित करते हैं पर वे व्यापक स्पेक्ट्रम में नॉन‑टार्गेटेड इंटर्फेरेंस पैदा कर सकते हैं; काइनेटिक इंटरसेप्टर्स भौतिक नष्टि करते हैं पर वे महंगे और रिस्की होते हैं. HPEM समाधान इन सब के बीच एक मध्यस्थ विकल्प देता है- तेज, लक्षित और बिना ज्यादा विनाश के प्रभावी.

हवा में तैनात HPEM पेलोड सीमा पर गश्त करने वाले प्लैटफ़ॉर्म, अपतटीय/नौसैनिक परिसरों की रक्षा करने वाले एरियल यूनिट्स और सेना‑अधारित मोबाइल प्लेटफ़ॉर्म पर उपयोगी साबित हो सकते हैं. इसका प्रयोग विशेष रूप से निम्नलिखित परिदृश्यों में उपयोगी होगा:

  • सीमा पार स्वार्म ड्रोन हमला रोकना
  • नौसैनिक अड्डों, पोर्ट्स और जहाजों के आस‑पास उभरते ड्रोन को बेअसर बनाना
  • उच्च‑मूल्य ठिकानों (आयल इंस्टालेशन, एयरबेस, कमांड‑कंट्रोल) की सुरक्षा
  • भीड़भाड़ वाले शहरी इलाकों में ड्रोन खतरे को बिना जानमाल की हानि के नियंत्रित करना

तकनीकी चुनौतियाँ और परीक्षण

इस तरह की प्रणाली विकसित करना आसान नहीं है, इसके समक्ष कई तकनीकी चुनौतियाँ हैं:

  • प्रभावी रेंज और दिशा‑विशेषता तय करना: लक्ष्य‑विशेष तरंगें भेजने के लिये सटीक नियंत्रण की आवश्यकता.
  • घटक‑स्तर पर हस्तक्षेप सीमित रखना: HPEM का प्रभाव सिर्फ लक्षित ड्रोन पर पड़े, अन्य मित्र या नागरिक उपकरणों पर न पड़े, यह सुनिश्चित करना.
  • तापीय और शक्ति‑प्रबंधन: छोटे पेरोल पर पर्याप्त इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शक्ति पैदा करना.
  • प्लेटफ़ॉर्म इंटीग्रेशन और वजन‑सीमाएँ: विमान/ड्रोन पर सीमित वजन और पॉवर के साथ सिस्टम को कार्यान्वित करना.
  • नियम‑कानून और अनुकूलता: किसी भी इलेक्ट्रोनिक युद्ध प्रणाली के उपयोग के लिये अंतरराष्ट्रीय नियमों और स्थानीय कानूनों का पालन आवश्यक है.

DRDO ने इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए कई चरणों में परीक्षण करने की योजना बनाई है: पहले लैब और ग्राउंड‑टेस्ट, फिर नियंत्रित वातावरण में फील्ड‑टेस्ट और अंततः वास्तविक दुनिया‑संबंधी ड्रोन‑इंटरसेप्शन परीक्षण. इन ट्रायल्स में लक्ष्य‑विशेषता, रेंज, पर्यावरणीय स्थिरता और साइड‑इफेक्ट्स पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.

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