नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पालतू और आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों पर सुनवाई की. बेंच ने स्पष्ट किया कि अगर कोई पालतू कुत्ता अनजाने में किसी पड़ोसी पर हमला करता है, तो यह कानून के तहत अपराध की श्रेणी में आता है. मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रही, जिसमें कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अपनी दलीलें पेश कीं.
सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट्स सी. यू. सिंह, कृष्णन वेणुगोपाल, ध्रुव मेहता, गोपाल संकरनारायणन, श्याम दिखान, सिद्धचेतन लूथरा और करुणा नंदी ने अपने पक्ष में बहस की. कोर्ट ने विशेष रूप से पालतू कुत्तों की देखभाल और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया.
चार राज्यों ने प्रस्तुत किए हलफनामे
सुनवाई की शुरुआत में एमिकस क्यूरी सीनियर एडवोकेट गौरव अग्रवाल ने बताया कि चार राज्यों ने इस मामले में अपने अनुपालन हलफनामे दाखिल किए हैं. उन्होंने बताया कि दिल्ली और अन्य बड़े शहरों में चूहों की संख्या बढ़ रही है, वहीं राष्ट्रीय राजधानी में बंदरों की समस्या भी गंभीर है. उन्होंने चेतावनी दी कि कुत्तों को अचानक हटाने से चूहों की आबादी और बढ़ सकती है, जिससे स्वास्थ्य और सुरक्षा के कई खतरे उत्पन्न होंगे.
जस्टिस मेहता की टिप्पणी
जस्टिस मेहता ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की कि “कुत्ते और बिल्लियां हमेशा से दुश्मन रही हैं. बिल्लियां चूहों को नियंत्रित करती हैं. क्या इसका मतलब यह है कि हमें बिल्लियों की संख्या बढ़ानी चाहिए?” इस सवाल के माध्यम से न्यायाधीश ने शहर में पशु नियंत्रण के जटिल संतुलन की ओर ध्यान आकर्षित किया.
स्टरलाइजेशन और वैक्सीनेशन पर जोर
सी. यू. सिंह ने कहा कि वे कोर्ट के आदेशों पर आपत्ति नहीं उठा रहे हैं, बल्कि यह सुझाव दे रहे हैं कि कुछ आदेशों की समीक्षा की जाए और आवश्यक संशोधन किए जाएं. उन्होंने यह प्रस्ताव रखा कि कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए स्टरलाइजेशन और वैक्सीनेशन के बाद उन्हें उसी इलाके में छोड़ने का तरीका अपनाया जाए. बेंच ने प्रतिक्रिया दी और पूछा कि “क्या हमें यह तय करना होगा कि हर अस्पताल में कितने कुत्तों को गलियारों, वार्डों और मरीजों के बेड के पास घूमने की अनुमति होगी?”
एबीसी सेंटरों का अनुपालन
कोर्ट को यह भी बताया गया कि कर्नाटक में 96 एबीसी (एनिमल बर्थ कंट्रोल) सेंटर होने के बावजूद आदेशों का पालन पर्याप्त रूप से नहीं हो रहा है. जस्टिस नाथ ने नाराजगी जताते हुए कहा कि नगर निगमों ने इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए. बेंच ने स्पष्ट किया कि आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने में ग्राम पंचायत, नगर परिषद और नगर निगम की भूमिका अहम है और उनके प्रयास निर्णायक होंगे.
आईआईटी दिल्ली मॉडल का उदाहरण
सुनवाई में आईआईटी दिल्ली में लागू एबीसी मॉडल का उदाहरण पेश किया गया. वहां युद्धस्तरीय स्टरलाइजेशन और वैक्सीनेशन के बाद पिछले तीन वर्षों में रेबीज के कोई मामले सामने नहीं आए. कोर्ट को यह भी बताया गया कि माइक्रो-चिपिंग और जियो-टैगिंग की मदद से कुत्तों की निगरानी और प्रबंधन अब काफी आसान हो गया है.
ये भी पढ़ें- Oscars 2026: कांतारा से दशावतार तक... ऑस्कर की रेस में 5 भारतीय फिल्मों की एंट्री, बनेगा रिकॉर्ड?