Baby do die do Review: न कहानी में धार, न क्लाइमैक्स में जान... हुमा कुरैशी की फिल्म क्यों करती है निराश?

Baby do die do Review: 'बेबी डू डाई डू' उन फिल्मों में शामिल हो जाती है, जो ट्रेलर देखकर जितनी दिलचस्प लगती हैं, फिल्म शुरू होने के कुछ मिनट बाद ही उतनी निराश करने लगती हैं.

Huma Qureshi new movie Baby Do Die Do review in hindi
Image Source: Social Media

  • एक्टर: हुमा कुरैशी, रचित सिंह, चंकी पांडे, सिकंदर खेर, सीमा पाहवा
  • श्रेणी: Hindi, Crime, Thriller
  • डायरेक्टर : नचिकेत सामंत
  • अवधि: 2 Hrs 5 Min
  • रेटिंग:  2.5⭐

Baby do die do Review: 'बेबी डू डाई डू' उन फिल्मों में शामिल हो जाती है, जो ट्रेलर देखकर जितनी दिलचस्प लगती हैं, फिल्म शुरू होने के कुछ मिनट बाद ही उतनी निराश करने लगती हैं. एक मूक-बधिर महिला कॉन्ट्रैक्ट किलर का आइडिया निश्चित रूप से अलग और आकर्षक है, लेकिन निर्देशक नचिकेत सामंत इस शानदार कॉन्सेप्ट को एक मजबूत फिल्म में बदलने में पूरी तरह असफल नजर आते हैं.करीब दो घंटे की यह फिल्म बार-बार यह साबित करती है कि सिर्फ स्टाइलिश कैमरा एंगल, नीयॉन लाइट्स, स्लो मोशन और डार्क बैकग्राउंड म्यूजिक किसी थ्रिलर को बेहतरीन नहीं बना सकते. अगर कहानी में दम नहीं है और स्क्रीनप्ले लगातार लड़खड़ाता रहे, तो पूरी फिल्म एक खूबसूरत लेकिन खाली पैकेज बनकर रह जाती है.

कहानी: नया चेहरा, लेकिन अंदर से वही पुरानी फिल्म

फिल्म की कहानी एक मूक-बधिर लड़की 'बेबी' की है, जो बचपन के दर्दनाक हादसे के बाद सुपारी किलर बन जाती है. उसका मेंटर 'पापा' (चंकी पांडे) उसे अपराध की दुनिया में तैयार करता है. फिर उसकी जिंदगी में प्यार आता है और वह इस खूनी दुनिया से बाहर निकलना चाहती है.समस्या यह नहीं कि कहानी साधारण है. समस्या यह है कि फिल्म इस साधारण कहानी को भी दिलचस्प बनाने में नाकाम रहती है.बचपन का ट्रॉमा, बदले की आग, रहस्यमयी गैंग, भ्रष्ट सिस्टम, प्यार और अंतिम मुकाबला—इन सभी तत्वों को हम हिंदी और हॉलीवुड सिनेमा में अनगिनत बार देख चुके हैं. फिल्म कोई नया मोड़, कोई चौंकाने वाला खुलासा या ऐसा भावनात्मक पल नहीं देती, जो दर्शकों के साथ लंबे समय तक रहे.

स्क्रीनप्ले है फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी

अगर इस फिल्म का सबसे बड़ा विलेन कोई है, तो वह इसका स्क्रीनप्ले है.पहले 20–25 मिनट तक कहानी उत्सुकता पैदा करती है, लेकिन इसके बाद पटकथा लगातार बिखरती चली जाती है.हर दस मिनट बाद एक नया किरदार कहानी में प्रवेश करता है. कोई गैंगस्टर है, कोई भ्रष्ट पुलिस अधिकारी, कोई बिल्डर, कोई वकील, कोई पुराना दुश्मन, कोई नया साथी. इतने सारे किरदार जोड़ दिए गए हैं कि दर्शक किसी से जुड़ ही नहीं पाता.कई घटनाएं सिर्फ इसलिए घटती हैं क्योंकि कहानी को आगे बढ़ाना है. तर्क और विश्वसनीयता बार-बार गायब हो जाती है.सबसे बड़ी कमी यह है कि फिल्म का हर बड़ा ट्विस्ट पहले से अनुमान लगाया जा सकता है. क्लाइमैक्स तक पहुंचते-पहुंचते दर्शकों के लिए कुछ भी नया नहीं बचता.

निर्देशन: स्टाइल पर जरूरत से ज्यादा भरोसा

निर्देशक नचिकेत सामंत साफ तौर पर एक स्टाइलिश नियो-नोयर थ्रिलर बनाना चाहते थे. उन्होंने बारिश में भीगी मुंबई, नीयॉन लाइट्स, स्लो मोशन, ब्लैक-एंड-व्हाइट फ्लैशबैक, स्प्लिट स्क्रीन, सीसीटीवी फुटेज और रंगों के प्रतीकात्मक इस्तेमाल पर खूब मेहनत की है. लेकिन अफसोस, उन्होंने कहानी पर उतनी मेहनत नहीं की. कई दृश्य ऐसे लगते हैं जैसे उन्हें सिर्फ ट्रेलर के लिए शूट किया गया हो. विजुअल्स प्रभावशाली हैं, लेकिन उनमें भावनात्मक गहराई नहीं है. फिल्म बार-बार स्टाइल दिखाती है, लेकिन कंटेंट देना भूल जाती है.

हुमा कुरैशी: मेहनत पूरी, लेकिन किरदार अधूरा

हुमा कुरैशी ने अपने किरदार के लिए काफी मेहनत की है. बिना संवादों के केवल चेहरे के हावभाव और बॉडी लैंग्वेज के सहारे अभिनय करना आसान नहीं होता.लेकिन स्क्रीनप्ले उन्हें चमकने का मौका ही नहीं देती.उनका किरदार पूरे समय लगभग एक ही भाव में रहता है. उसके अंदर का दर्द, गुस्सा, डर और संघर्ष दर्शकों तक पूरी ताकत से नहीं पहुंचता. यह हुमा की नहीं, बल्कि कमजोर लेखन की हार है.

चंकी पांडे: अच्छा प्रयास, लेकिन सीमित असर

चंकी पांडे 'पापा' के किरदार में अलग जरूर दिखाई देते हैं.उनकी स्क्रीन प्रेजेंस प्रभावशाली है, लेकिन लेखक ने उनके किरदार को गहराई नहीं दी. उनका रहस्य बहुत जल्दी खत्म हो जाता है और बाद में उनका प्रभाव कम हो जाता है.

सिकंदर खेर: वही पुराना विलेन

सिकंदर खेर एक बार फिर उसी तरह के सनकी, रहस्यमयी और खतरनाक विलेन बने हैं, जैसा दर्शक उन्हें कई फिल्मों और वेब सीरीज में देख चुके हैं.उनका अभिनय अच्छा है, लेकिन किरदार पूरी तरह दोहराव का शिकार है. फिल्म उनके लिए कुछ नया नहीं लिख पाती.

रचित सिंह और बाकी कलाकार

रचित सिंह का 'नॉन-टॉक्सिक' बॉयफ्रेंड वाला किरदार कागज पर दिलचस्प लगता है, लेकिन स्क्रीन पर बेहद सतही साबित होता है.सीमा पाहवा, हिमांशु मलिक, विद्या मालवड़े और बाकी कलाकार आते हैं, अपना काम करते हैं और बिना कोई खास प्रभाव छोड़े चले जाते हैं.इतने बड़े कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद कोई भी किरदार याद नहीं रह जाता.

एक्शन: स्टाइल ज्यादा, रोमांच कम

फिल्म के एक्शन सीक्वेंस देखने में स्टाइलिश जरूर हैं, लेकिन उनमें वास्तविक तनाव महसूस नहीं होता.बेबी जिस आसानी से किसी भी जगह पहुंचती है, हत्या करती है और आराम से निकल जाती है, वह कई बार हास्यास्पद लगता है.क्लाइमैक्स भी बड़े मुकाबले का वादा करता है, लेकिन उसका निष्कर्ष बेहद फीका और जल्दबाजी में खत्म होता है.

सिनेमैटोग्राफी: फिल्म की इकलौती ताकत

अगर फिल्म किसी विभाग में सबसे ज्यादा अंक हासिल करती है, तो वह है इसकी सिनेमैटोग्राफी.बारिश में डूबी मुंबई, अंधेरी गलियां, चमकती नीयॉन लाइट्स और नियो-नोयर विजुअल्स स्क्रीन पर शानदार दिखते हैं.लेकिन खूबसूरत तस्वीरें कमजोर कहानी को यादगार नहीं बना सकतीं.

म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर

बैकग्राउंड स्कोर कई जगह जरूरत से ज्यादा तेज और बनावटी महसूस होता है. कुछ गाने कहानी को आगे बढ़ाने की बजाय उसकी गति रोक देते हैं.

सबसे ज्यादा खटकती हैं ये कमियां

इस फिल्म में शानदार कॉन्सेप्ट का कमजोर इस्तेमाल किया गया है. इसकी कहानी अनुमानित और घिसी-पिटी है. इसका स्क्रीनप्ले भी बिखरा हुआ है. फिल्म में स्टाइल जरूरत से ज्यादा और कंटेंट कम है. इसमें भावनात्मक जुड़ाव की कमी साफ दिखाई देती है. फिल्म का क्लाइमैक्स कमजोर है. इसके अलावा फिल्म में कई किरदार सिर्फ भीड़ बढ़ाने के लिए मौजूद हैं. फिल्म थ्रिलर होने के बावजूद सस्पेंस का अभाव है.

फाइनल वर्डिक्ट

'बेबी डू डाई डू' यह साबित करती है कि सिर्फ अलग दिखने की कोशिश करना काफी नहीं होता. एक अनोखा कॉन्सेप्ट, मजबूत अभिनेत्री और आकर्षक विजुअल्स होने के बावजूद फिल्म अपनी सबसे जरूरी चीज—कहानी—में ही हार जाती है.

यह फिल्म देखने के बाद सबसे ज्यादा अफसोस इस बात का होता है कि इतने अच्छे विचार को इतनी कमजोर पटकथा में बर्बाद कर दिया गया.अगर आप दमदार थ्रिलर, अप्रत्याशित ट्विस्ट और भावनात्मक गहराई की तलाश में हैं, तो 'बेबी डू डाई डू' आपको निराश कर सकती है. यह फिल्म देखने के बाद सिर्फ एक सवाल मन में रह जाता है—इतना अच्छा कॉन्सेप्ट आखिर इतनी साधारण फिल्म कैसे बन गया?