लाशों और मलबों के ढेर, अर्थव्यवस्था तबाह... हिल गया यूक्रेन का रक्षा बजट, जंग में कितनी हुई बर्बादी?

युद्ध का सबसे बड़ा असर सिर्फ मोर्चों पर नहीं होता, इसका असर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था, समाज और नागरिक जीवन पर गहरी चोट करता है.

How much Ukraines budget was wasted on war
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युद्ध का सबसे बड़ा असर सिर्फ मोर्चों पर नहीं होता, इसका असर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था, समाज और नागरिक जीवन पर गहरी चोट करता है. इसका ताजा उदाहरण है यूक्रेन, जो पिछले करीब चार साल से रूस के साथ व्यापक युद्ध में उलझा हुआ है. इस टकराव ने न केवल यूक्रेनी सरहदों को बल्कि उसके बजट और विकास योजनाओं को भी बुरी तरह झकझोर दिया है.

2022 में रूस के हमले के बाद से यूक्रेन का हर साल का बजट युद्ध केंद्रित होता जा रहा है, और 2025 में जो तस्वीर सामने आई है, वह सिर्फ सैन्य मोर्चे की नहीं, बल्कि एक आर्थिक युद्ध की भी कहानी कहती है.

हर डॉलर में से 76 सेंट सिर्फ जंग पर

यूक्रेन की संसद ने हाल ही में 2025 के वार्षिक बजट में संशोधन को मंजूरी दी है. इस संशोधित बजट का सबसे चौंकाने वाला पहलू है कि कुल बजट का लगभग 76% हिस्सा केवल रक्षा और युद्ध संबंधित खर्चों के लिए निर्धारित किया गया है.

  • कुल वार्षिक बजट (2025): लगभग 3.9 ट्रिलियन ह्रिव्निया (93 अरब डॉलर)
  • रक्षा बजट: 2.96 ट्रिलियन ह्रिव्निया

यूक्रेन के वित्त मंत्री सेरही मार्चेंको के अनुसार, यह खर्च कोई विकल्प नहीं बल्कि एक आवश्यकता बन चुका है. उनके अनुसार, "स्थिति में हर दिन बदलाव हो रहा है, और ऐसे में आक्रामकता से निपटने के लिए हमें अपनी सुरक्षा क्षमताओं को मजबूती देनी ही होगी."

दूसरी बार रक्षा बजट में वृद्धि

साल 2025 में यह दूसरी बार है जब रक्षा खर्च में इजाफा किया गया है. इससे पहले जुलाई में भी संसद ने 412 अरब ह्रिव्निया (लगभग 9.8 अरब डॉलर) की अतिरिक्त राशि को मंजूरी दी थी. उस समय कुल रक्षा बजट लगभग 2.2 ट्रिलियन ह्रिव्निया था, लेकिन अब यह 3 ट्रिलियन के करीब पहुंच चुका है.

युद्ध अब लगभग 1,200 किलोमीटर लंबी फ्रंटलाइन पर फैला हुआ है, जहां ड्रोन हमलों से लेकर मिसाइल हमलों तक लगातार लड़ाई चल रही है. ऐसे में गोला-बारूद, हथियार, सैनिकों की आपूर्ति, मेडिकल और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है.

युद्ध का खर्च कौन उठा रहा है?

इस भारी-भरकम खर्च का बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय सहायता और ऋण से पूरा किया जा रहा है. खास बात यह है कि इस बजट का एक हिस्सा अब रूसी संपत्तियों से मिलने वाले ब्याज से भी पूरा होगा, जिन्हें पश्चिमी देशों ने रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के तहत फ्रीज किया है.

प्रधानमंत्री यूलिया स्विरीदेंको ने इस नीति को उचित ठहराते हुए कहा, "रूसी संपत्तियों के ब्याज को हमारे रक्षा प्रयासों में लगाना एक न्यायसंगत कदम है." यह कदम अब एक नया उदाहरण बन रहा है कि किस तरह प्रतिबंधित विदेशी संपत्तियों को युद्ध में सहायता के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

152 अरब डॉलर की विदेशी मदद

रूस के हमले के बाद से अब तक यूक्रेन को जी-7 देशों सहित अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों से 152 अरब डॉलर से अधिक की वित्तीय सहायता मिल चुकी है. वर्ष 2025 में भी अब तक 28 अरब डॉलर का सहयोग आ चुका है, जिससे युद्ध से संबंधित खर्चों को चलाने में सहायता मिल रही है.

यूक्रेन का युद्ध अब न केवल सैन्य मोर्चे पर बल्कि वित्तीय संसाधनों के स्तर पर भी लड़ा जा रहा है. और इसमें एक बड़ी भूमिका निभा रही है विदेशी मदद, लोन और उन रूसी संपत्तियों का ब्याज, जो पश्चिम में फ्रीज की गई हैं.

हर 100 में 63 डॉलर सिर्फ रक्षा पर खर्च

यूक्रेन के वित्त मंत्रालय के अनुसार, 2025 के पहले नौ महीनों में सरकार ने अपनी कुल आय का 63% हिस्सा सिर्फ सेना और रक्षा से जुड़ी गतिविधियों पर खर्च किया है.

इसका अर्थ यह हुआ कि:

  • शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचा, और कल्याणकारी योजनाएं या तो सीमित स्तर पर चलाई जा रही हैं या पूरी तरह विदेशी मदद पर निर्भर हैं.
  • देश की घरेलू कर आय का बड़ा हिस्सा सीधे युद्ध में झोंक दिया गया है.

बर्बाद होते शहर और विस्थापित जनता

युद्ध का प्रभाव केवल बजट या सैनिकों तक सीमित नहीं है. पूरे यूक्रेन में शहरों, पुलों, बिजलीघरों, अस्पतालों और आवासीय इलाकों को निशाना बनाया गया है.

  • लाखों लोग देश छोड़ चुके हैं
  • हजारों नागरिक मारे गए
  • लाखों लोग अब भी शरणार्थी शिविरों में या विस्थापित अवस्था में जीवन गुजार रहे हैं

राजधानी कीव, औद्योगिक केंद्र डोनबास, और प्रमुख शहर खारकीव जैसे इलाके लगातार बमबारी की चपेट में हैं.

भारत-पाकिस्तान के लिए क्या है सीख?

यूक्रेन का अनुभव भारत और पाकिस्तान जैसे देशों के लिए एक गंभीर चेतावनी बनकर सामने आता है.

हाल ही में पाकिस्तान की ओर से सीजफायर और शांति वार्ता के संकेत दिए गए, जिस पर भारत की सतर्क प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी. लेकिन यूक्रेन का अनुभव बताता है कि सिर्फ शांति समझौतों के भरोसे रह जाना कितना महंगा साबित हो सकता है.

2014 के बाद यूक्रेन और रूस ने कई बार शांति समझौते किए, लेकिन उनमें से अधिकतर का नतीजा नए हमलों के रूप में ही सामने आया.

आज वही यूक्रेन अपनी आधी से ज्यादा आमदनी युद्ध में खर्च कर रहा है. युद्ध ने न केवल उसकी विकास योजनाओं को रोक दिया है, बल्कि पूरी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दिया है.

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