इजरायल का वजूद बचाने के लिए हत्याएं, होलोकॉस्ट का डर... जानें कैसे काम करती है खुफिया एजेंसी मोसाद?

7 अक्टूबर 2023 को जब हमास ने इजरायल पर एक बड़ा हमला किया, तब से लेकर अब तक गाजा पट्टी में भयानक तबाही मच चुकी है.

How does the Israeli intelligence agency Mossad work
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7 अक्टूबर 2023 को जब हमास ने इजरायल पर एक बड़ा हमला किया, तब से लेकर अब तक गाजा पट्टी में भयानक तबाही मच चुकी है. इजरायल ने सिर्फ हमास को जवाब देने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि उसने ईरान, सीरिया, लेबनान और कतर जैसे देशों को भी अपने निशाने पर ले लिया. इन जवाबी हमलों में कई जगहों पर “पेजर ब्लास्ट” जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया, जिसमें दुश्मनों को बेहद सटीक और अप्रत्याशित ढंग से निशाना बनाया गया.

इन कार्रवाइयों के पीछे इजरायली खुफिया एजेंसी "मोसाद" का नाम सामने आया है, एक ऐसी एजेंसी जिसकी पहचान है चुपचाप घातक हमला करना, दुश्मन की धरती पर जाकर लक्ष्य को खत्म कर देना और किसी भी मिशन में नैतिकता से ज्यादा "राष्ट्रीय अस्तित्व" को प्राथमिकता देना.

मोसाद: नाम ही काफी है

"मोसाद" (Mossad), जिसे हिब्रू में "HaMossad leModiʿin uleTafkidim Meyuḥadim" कहा जाता है, मतलब "इंटेलिजेंस और स्पेशल ऑपरेशंस के लिए संस्थान" — ये नाम जितना लंबा है, उसका प्रभाव उससे कहीं ज्यादा गहरा है.

मोसाद की सबसे खास बात है कि इसके ऑपरेशन गोपनीयता, सटीकता और नैतिक सीमाओं को पार करने की हद तक जोखिम भरे होते हैं. मोसाद की रणनीति, उसके एजेंटों की ट्रेनिंग, उसके हिट स्क्वॉड्स और “टारगेटेड किलिंग्स” की नीति ने उसे दुनिया की सबसे घातक खुफिया एजेंसियों में शामिल कर दिया है.

Rise and Kill First किताब

रोनेन बर्गमैन (Ronen Bergman), एक जाने-माने इजरायली पत्रकार और खुफिया मामलों के विशेषज्ञ, ने अपनी चर्चित किताब "Rise and Kill First" में मोसाद के अंदर की दुनिया का पर्दाफाश किया है. किताब को तैयार करने के लिए उन्होंने हजारों इंटरव्यू किए, जिनमें इजरायली सेना, सरकार और पूर्व खुफिया अधिकारियों से बातचीत शामिल थी.

किताब का नाम ही इशारा करता है कि मोसाद की फिलॉसफी क्या है, "जो पहले उठे और दुश्मन को मारे, वही जिंदा रहेगा."

रोनेन लिखते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से इजरायल ने पश्चिमी देशों की तुलना में सबसे ज्यादा "टारगेटेड किलिंग्स" की हैं. इसका सीधा मतलब है कि इजरायल अपने अस्तित्व के लिए किसी भी हद तक जा सकता है.

क्या नैतिकता पीछे छूट गई?

इजरायल का गठन 1948 में उन यहूदियों के लिए हुआ था जिन्होंने नाजी जर्मनी के अत्याचारों को झेला. एक ऐसा राष्ट्र, जो नरसंहार से बचे लोगों के लिए आश्रय बना, क्या उस राष्ट्र के लिए "हत्या" को नीति बनाना उचित है?

रोनेन की किताब में यही सबसे बड़ा नैतिक सवाल उठाया गया है कि क्या राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर हत्या को सामान्य किया जा सकता है?

मोसाद के कई ऑपरेटिव्स इस सवाल का जवाब हां में देते हैं. उनके लिए अस्तित्व ही प्राथमिकता है, नैतिकता नहीं.

इतिहास से शुरू हुई हत्या की संस्कृति

किताब में एक पूर्व एजेंट का जिक्र है, जिसने बताया कि उसने 1944 में यरुशलम में एक ब्रिटिश अफसर को मार डाला था, और उसे इसका कोई पछतावा नहीं था. उसका मानना था कि जितने ज़्यादा अंग्रेज मारे जाएंगे, इजरायल की आज़ादी उतनी नज़दीक आएगी.

ध्यान देने वाली बात यह है कि इजरायल उस समय एक राष्ट्र नहीं था, फिर भी यहूदी संगठन हथियार उठा चुके थे. उन्होंने ब्रिटिश शासन को भी दुश्मन माना, और हत्या को एक औजार के रूप में अपनाया.

सत्ता तक पहुंचे पूर्व अंडरग्राउंड लड़ाके

इजरायल के कई प्रधानमंत्री और राजनेता, जैसे यित्जाक शमीर, कभी भूमिगत संगठनों का हिस्सा थे. इन लोगों ने अपने संघर्ष के दिनों में हत्याएं कीं, साजिशें रचीं और ब्रिटिश अफसरों को निशाना बनाया.

इन नेताओं का मानना था कि दुनिया यहूदियों को कभी भी मिटा सकती है. हिटलर के होलोकॉस्ट की भयावहता ने यहूदी समाज के मन में यह डर बिठा दिया कि अगर वे सतर्क नहीं रहे, तो एक बार फिर इतिहास खुद को दोहरा सकता है.

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