USSR, अमेरिका या पाकिस्तान... मिलिट्री सुपर पावर न होने के बाद भी सबको कैसे हराता है अफगानिस्तान?

अफगानिस्तान को अक्सर "साम्राज्यों का कब्रिस्तान" कहा जाता है, क्योंकि इसकी भू-राजनीतिक स्थिति और जटिल भौगोलिक परिदृश्य ने सदियों से इसे विदेशी आक्रमणों और साम्राज्यों के उत्थान-पतन का मुख्य केंद्र बना दिया है.

How Afghanistan defeats everyone without a military super power
Image Source: Social Media

अफगानिस्तान को अक्सर "साम्राज्यों का कब्रिस्तान" कहा जाता है, क्योंकि इसकी भू-राजनीतिक स्थिति और जटिल भौगोलिक परिदृश्य ने सदियों से इसे विदेशी आक्रमणों और साम्राज्यों के उत्थान-पतन का मुख्य केंद्र बना दिया है. इस देश का इतिहास हजारों साल पुराना है और इसकी संस्कृति, संघर्ष, और रणनीति ने इसे दुनिया के सबसे जटिल और प्रभावशाली युद्धक्षेत्रों में से एक बना दिया है. आज के दौर में भी अफगानिस्तान, भले ही उसके पास परमाणु शक्ति नहीं है, परन्तु वह अपने दुश्मनों विशेषकर अमेरिका और पाकिस्तान को किस तरह चुनौती देता आया है, यह एक महत्वपूर्ण विषय है जिसे समझना आवश्यक है. आइए इस लेख में अफगानिस्तान के ऐतिहासिक, राजनीतिक और सैन्य पहलुओं पर विस्तार से नजर डालते हैं.

अफगानिस्तान का भू-राजनीतिक महत्व

अफगानिस्तान की मानव सभ्यता की शुरुआत पाषाण युग से मानी जाती है. इस क्षेत्र ने फारसी साम्राज्य, मौर्य साम्राज्य और सिकंदर महान के विजय अभियान जैसे कई बड़े ऐतिहासिक बदलाव देखे हैं. सातवीं शताब्दी में इस्लाम का प्रसार यहां तेजी से हुआ और नौवीं शताब्दी तक यह क्षेत्र इस्लामी संस्कृति और धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया.

मध्यकालीन काल में अफगानिस्तान मुगल और सफवी फारसी साम्राज्यों के बीच संघर्ष का मैदान बना. 18वीं शताब्दी में अहमद शाह दुर्रानी ने दुर्रानी साम्राज्य की स्थापना की, जो आधुनिक अफगानिस्तान के लिए नींव साबित हुई. 19वीं शताब्दी में अफगानिस्तान, ब्रिटिश और रूसी साम्राज्यों के बीच "ग्रेट गेम" का हिस्सा बना, जो एक गुप्त राजनीतिक और सैन्य टकराव था. 1919 में यह देश ब्रिटिश हुकूमत से पूरी तरह स्वतंत्र हुआ और अपनी संप्रभुता स्थापित की.

सोवियत आक्रमण से अमेरिकी हस्तक्षेप तक

1979 में सोवियत यूनियन ने अफगानिस्तान पर आक्रमण किया, जिससे देश में लंबे और विनाशकारी युद्ध की शुरुआत हुई. सोवियत सेना को भारी विरोध का सामना करना पड़ा, जिसमें स्थानीय लड़ाकों का गुरिल्ला युद्ध की रणनीति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. सोवियत सेना अंततः 1989 में वापस लौट गई, लेकिन देश गृह युद्ध की आग में झुलस रहा था. इस युद्ध की परिणति में 1990 के दशक में तालिबान का उदय हुआ, जिसने तेजी से पूरे देश में अपना नियंत्रण स्थापित किया.

2001 के 9/11 हमलों के बाद अमेरिका ने तालिबान शासन को उखाड़ फेंकने के लिए अफगानिस्तान में सैन्य अभियान चलाया. लगभग 20 वर्षों तक अमेरिकी और नाटो सेना की उपस्थिति रही, लेकिन इस अवधि में भी तालिबान के खिलाफ स्थायी नियंत्रण स्थापित करना मुश्किल रहा. 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के बाद तालिबान ने पुनः सत्ता अपने हाथ में ले ली.

बिना परमाणु हथियारों के अफगानिस्तान की ताकत

अफगानिस्तान के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, फिर भी उसने कई बड़े और शक्तिशाली देशों को चुनौती दी है. इसका सबसे बड़ा कारण है स्थानीय लड़ाकों की गुरिल्ला युद्ध कला और रणनीति. अफगान लड़ाके आमतौर पर घात लगाकर हमला करते हैं, "हिट एंड रन" रणनीति अपनाते हैं और कठोर पहाड़ी इलाकों तथा गुफाओं में छिप जाते हैं, जो कि उनकी सबसे बड़ी ताकत है.

यह क्षेत्रीय ज्ञान, स्थानीय जनजातीय गठजोड़ और मजबूत पारंपरिक युद्धकौशल, विदेशी सेनाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होते हैं. अफगानिस्तान का भौगोलिक स्वरूप, खासतौर पर हिंदू कुश पर्वत श्रृंखला, विदेशी सेनाओं के लिए नियंत्रण और संचालन को बेहद कठिन बना देता है.

हथियारों का बड़ा भंडार और बाहरी समर्थन

अफगानिस्तान के पास हथियारों की भारी मात्रा में उपलब्धता का एक प्रमुख स्रोत अमेरिका रहा है. 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के दौरान उन्होंने वहां बड़े पैमाने पर सैन्य उपकरण और हथियार छोड़े. इसके अलावा, सोवियत काल में भी अफगान लड़ाकों के पास सोवियत निर्मित हथियार और गोला-बारूद थे, जो युद्ध की अवधि में इस्तेमाल हुए. तालिबान ने भी कई लड़ाइयों में अन्य समूहों से हथियार जब्त किए, जिससे उनकी सेना मजबूत हुई.

इसके अलावा अफगानिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कुछ देशों से सहयोग मिलने के आरोप लगते रहे हैं. चीन, ईरान, कतर और रूस पर तालिबान को समर्थन देने के संकेत मिलते रहे हैं, जबकि पाकिस्तान की भूमिका को लेकर भी विवाद और आरोप सामने आते रहे हैं. पाकिस्तान पर यह आरोप लगाए जाते हैं कि वह तालिबान को शरण और समर्थन देता है, जो अफगानिस्तान के लिए बड़ा राजनीतिक और सैन्य खतरा बनता है.

ये भी पढ़ें- हर 4 में से 3 लोग जहरीली हवा के शिकार, जा चुकी है 79 लाख लोगों की जान, रिपोर्ट में बड़ा खुलासा