पाकिस्तान की हैंगोर (Hangor) पनडुब्बी परियोजना को लेकर आधिकारिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर दिखाई देने लगा है. कुछ तारीखों पर नजर डालने से यह समझा जा सकता है कि इस परियोजना का घरेलू निर्माण हिस्सा वास्तव में किस स्थिति में है. ये तारीखें किसी सरकारी बयान से कहीं ज्यादा स्पष्ट तस्वीर पेश करती हैं.
KSEW (कराची शिपयार्ड एंड इंजीनियरिंग वर्क्स) में बनने वाली पहली पनडुब्बी के लिए स्टील कटिंग समारोह अक्टूबर 2020 में होना था, लेकिन यह 9 दिसंबर 2021 को आयोजित किया गया. सेवा में शामिल होने के बाद इस पनडुब्बी का नाम PNS तसनीम रखा जाएगा. इसके बाद 24 दिसंबर 2022 को एक समारोह आयोजित किया गया, जिसमें एक साथ पांचवीं पनडुब्बी (Hull No. 5) की कील बिछाने और छठी पनडुब्बी (Hull No. 6) की स्टील कटिंग को चिह्नित किया गया. हालांकि छठी पनडुब्बी की कील वास्तव में 15 फरवरी 2025 को KSEW में रखी गई.
इन घटनाओं को एक साथ देखने पर साफ पता चलता है कि पांचवीं पनडुब्बी की स्टील कटिंग ही अपने मूल कार्यक्रम से लगभग एक साल पीछे हुई थी. इसके बाद उसकी कील एक साल से भी ज्यादा देर से रखी गई और छठी पनडुब्बी की कील फरवरी 2025 तक नहीं रखी जा सकी. मौजूदा स्थिति को देखते हुए पांचवीं और छठी KSEW-निर्मित पनडुब्बियों के दशक के अंत या 2030 के शुरुआती वर्षों में तैयार होने की संभावना है, जबकि सातवीं और आठवीं पनडुब्बियां उसके बाद आएंगी.
ToT से क्या हासिल करना चाहता था पाकिस्तान?
हैंगोर कार्यक्रम का घरेलू निर्माण हिस्सा केवल चार अतिरिक्त पनडुब्बियां बनाने तक सीमित नहीं था. इसका उद्देश्य इससे कहीं बड़ा था. पाकिस्तान यह दिखाना चाहता था कि वह सिर्फ पनडुब्बियों का संचालन करने वाला देश नहीं, बल्कि उन्हें बनाने वाला देश भी बन सकता है. 2020 में तत्कालीन नौसेना प्रमुख एडमिरल जफर महमूद अब्बासी ने भी कहा था कि पाकिस्तान नौसेना को "पनडुब्बी संचालित करने वाली नौसेना" से "पनडुब्बी बनाने वाली नौसेना" में बदलना इस परियोजना का प्रमुख लक्ष्य है.
इस महत्वाकांक्षा के पीछे कुछ मजबूत आधार भी मौजूद हैं. KSEW पाकिस्तान का एकमात्र संस्थान है जो गहरे समुद्र में संचालन करने वाली पनडुब्बियों का निर्माण कर सकता है. यह क्षमता 1990 के दशक में फ्रांस से मिली तकनीकी सहायता और वर्तमान कार्यक्रम के तहत चीन से प्राप्त तकनीक के कारण विकसित हुई है. पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्रालय की 2022-2024 वर्षपुस्तिका के अनुसार, शिपयार्ड में एक आधुनिक शिप लिफ्ट और ट्रांसफर सिस्टम स्थापित किया गया है, जिसमें पनडुब्बी निर्माण के लिए दो विशेष पार्किंग स्टेशन भी बनाए गए हैं. यह वास्तविक निवेश हैं और केवल दिखावे के लिए नहीं किए गए.
क्या पाकिस्तान को मिल रही है असली तकनीक?
हालांकि केवल आधुनिक ढांचा तैयार कर लेना पर्याप्त नहीं माना जाता. किसी पनडुब्बी को चीनी तकनीकी मानकों के अनुसार बनाना और उसकी तकनीक को पूरी तरह समझना दो अलग-अलग बातें हैं. लंबे समय तक किसी सैन्य प्लेटफॉर्म को चलाने और उसे अपग्रेड करने के लिए यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है.
यही वह सवाल है जिसका जवाब KSEW कार्यक्रम अभी तक नहीं दे पाया है. क्या तकनीक हस्तांतरण के जरिए पाकिस्तान को वास्तविक इंजीनियरिंग ज्ञान मिल रहा है, जिससे वह भविष्य में खुद डिजाइन, संशोधन और रखरखाव कर सके? या फिर यह केवल एक ऐसी असेंबली क्षमता है, जिसमें चीन के तकनीकी विशेषज्ञों की भागीदारी लगातार जरूरी बनी रहेगी? फिलहाल इस बारे में सार्वजनिक रूप से स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है.
समय-सीमा की हकीकत और बढ़ती देरी
पाकिस्तान नौसेना प्रमुख एडमिरल नवीन अशरफ ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि पहली हैंगोर श्रेणी की पनडुब्बी 2026 में नौसेना में शामिल होगी और सभी आठ पनडुब्बियां 2028 तक सेवा में आ जाएंगी. चीन में बनने वाली पनडुब्बियों का हिस्सा कुछ देरी के बावजूद मोटे तौर पर इसी दिशा में आगे बढ़ता दिखाई देता है, हालांकि मूल लक्ष्य 2022-23 था. लेकिन KSEW में बनने वाली पनडुब्बियों के मामले में स्थिति अलग नजर आती है.
अब तक निर्माण की गति को देखते हुए कई खुले स्रोतों पर आधारित विश्लेषण यह संकेत देते हैं कि घरेलू स्तर पर बनने वाली पनडुब्बियां संभवतः 2030 के शुरुआती वर्षों तक ही पूरी हो पाएंगी. यह निष्कर्ष किसी निराशावादी सोच पर आधारित नहीं है, बल्कि कील बिछाने की तारीखों, इतनी जटिल पनडुब्बियों के सामान्य निर्माण समय और उस सीखने की प्रक्रिया पर आधारित है, जिससे कोई शिपयार्ड पहली बार अपने पुराने अनुभव से कहीं अधिक जटिल प्लेटफॉर्म बनाते समय गुजरता है.
देरी का असर केवल रणनीतिक स्तर तक सीमित नहीं रहता. हर अतिरिक्त वर्ष के साथ चालक दल के प्रशिक्षण, रखरखाव सुविधाओं और आंशिक रूप से संचालित पनडुब्बी बेड़े के खर्च बढ़ते जाते हैं, जबकि पूरे आठ पनडुब्बियों वाले बेड़े का परिचालन लाभ नहीं मिल पाता.
वह सवाल जिसका जवाब अभी बाकी
KSEW परियोजना की प्रगति को लेकर पाकिस्तान की आधिकारिक जानकारी मुख्य रूप से स्टील कटिंग, कील बिछाने के समारोहों और मंत्रियों या अधिकारियों की यात्राओं तक सीमित रही है. लेकिन निर्माण की वास्तविक प्रगति, पनडुब्बियों की संभावित पूर्णता तिथि और परियोजना में चीनी तकनीकी भागीदारी की वास्तविक सीमा के बारे में विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है. अब तक पाकिस्तान ने अपनी घोषित समय-सीमा में किसी औपचारिक बदलाव की घोषणा नहीं की है. न ही परियोजना में हुई देरी को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया गया है और न ही इसके पीछे के कारणों को विस्तार से बताया गया है.
ये भी पढ़ें: Steel Cut in 2021, Keel Laid in 2025: The KSEW Submarines and the Question of Real Capability