रेटिंग: 2/5 ⭐
Hain Jawaani To Ishq Hona Hai Review: रोमांटिक फिल्मों की भीड़ में "हैं जवानी तो इश्क होना है" कुछ नया परोसने का दावा करती है, लेकिन पर्दे पर आते-आते यह दावा खोखला साबित होता है. फिल्म न तो प्रेम कहानी के स्तर पर प्रभावित करती है और न ही मनोरंजन के स्तर पर कोई खास छाप छोड़ पाती है.
कहानी पूरी तरह भटकी हुई, न रोमांस का ठिकाना न कॉमेडी का
फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी भटकी हुई कहानी है. शुरुआत में यह एक हल्की-फुल्की रोमांटिक कॉमेडी लगती है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, फिल्म खुद तय नहीं कर पाती कि उसे रोमांस दिखाना है, फैमिली ड्रामा पर फोकस करना है या कॉमेडी पर. नतीजा यह होता है कि दर्शक कहानी से जुड़ने के बजाय उसकी दिशा खोजते रह जाते हैं.स्क्रिप्ट में कई ऐसे ट्रैक हैं जो शुरू तो होते हैं, लेकिन उनका कोई मजबूत निष्कर्ष नहीं निकलता. एक सीन रोमांस की तरफ जाता है, दूसरा कॉमेडी की तरफ और तीसरा इमोशनल ड्रामा की ओर. इन सबके बीच फिल्म का मूल कथानक कहीं खो जाता है.
कहानी में नयापन भी लगभग नदारद है. कई घटनाएं और ट्विस्ट इतने अनुमानित हैं कि उनके आने से पहले ही दर्शक समझ जाते हैं कि आगे क्या होने वाला है. सबसे बड़ी कमी यह है कि फिल्म अपने किरदारों को मजबूत आधार नहीं दे पाती, जिसके कारण उनके फैसले और भावनाएं भी असर नहीं छोड़ते.फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी कहानी है. स्क्रिप्ट इतनी प्रेडिक्टेबल है कि अगले सीन का अंदाजा पहले ही लग जाता है. इमोशनल मोमेंट्स जबरदस्ती ठूंसे हुए लगते हैं और रोमांस में वह गहराई नहीं है जो दर्शकों को किरदारों से जोड़ सके. कई जगह कहानी बिना किसी दिशा के भटकती नजर आती है.
डेविड धवन का निर्देशन इस बार फीका
कभी कॉमेडी और एंटरटेनमेंट की गारंटी माने जाने वाले निर्देशक David Dhawan इस बार दर्शकों को हंसाने और बांधे रखने में पूरी तरह असफल नजर आते हैं. "हैं जवानी तो इश्क होना है" देखकर ऐसा महसूस होता है जैसे फिल्म 90 के दशक के फॉर्मूले को आज के दौर में बिना किसी नएपन के दोहराने की कोशिश कर रही हो.डेविड धवन फिल्म को एक मजबूत विजन देने में नाकाम रहे हैं. कई दृश्य ऐसे लगते हैं मानो सिर्फ स्क्रीन टाइम बढ़ाने के लिए जोड़े गए हों. रोमांटिक और कॉमिक सीक्वेंस के बीच संतुलन नहीं बन पाता, जिससे फिल्म की रफ्तार बार-बार टूटती है.
डेविड धवन की फिल्मों की पहचान उनकी तेज रफ्तार कॉमेडी, दमदार टाइमिंग और मनोरंजन हुआ करती थी. लेकिन इस फिल्म में उनका वही पुराना टच कहीं दिखाई नहीं देता. कई कॉमिक सीन जबरदस्ती डाले गए लगते हैं और जिन जगहों पर दर्शकों को हंसना चाहिए, वहां सन्नाटा ज्यादा महसूस होता है.
फिल्म का स्क्रीनप्ले इतना बिखरा हुआ है कि कहानी बार-बार अपनी दिशा खो देती है. कई दृश्य ऐसे लगते हैं जैसे सिर्फ स्टार कास्ट को स्क्रीन पर दिखाने के लिए जोड़े गए हों. निर्देशन में वह ऊर्जा और ताजगी नहीं दिखती जिसके लिए डेविड धवन जाने जाते हैं.
"हैं जवानी तो इश्क होना है"
बॉलीवुड में एक फॉर्मूला काफी पुराना है, बड़े सितारे ले आइए, विदेशी लोकेशन्स दिखा दीजिए, कुछ गाने डाल दीजिए और इसे रोमांटिक एंटरटेनर कह दीजिए. "हैं जवानी तो इश्क होना है" भी उसी फॉर्मूले की नई पैकेजिंग लगती है, जिसमें चमक-दमक तो बहुत है, लेकिन कंटेंट ढूंढने पर भी नहीं मिलता.
वरुण धवन: एनर्जी बहुत, इम्पैक्ट गायब
वरुण धवन एक बार फिर अपने पुराने कम्फर्ट ज़ोन में नजर आते हैं. वही ओवर-द-टॉप एक्सप्रेशन्स, वही जबरदस्ती की कॉमिक टाइमिंग और वही घिसा-पिटा चार्म. ऐसा लगता है जैसे उन्होंने किरदार नहीं निभाया, बल्कि अपनी पिछली कई फिल्मों के सीन जोड़कर एक नया रोल बना लिया हो. फिल्म खत्म होने के बाद भी उनका किरदार याद नहीं रहता.
पूजा हेगड़े: स्क्रीन पर मौजूद, कहानी से गायब
पूजा हेगड़े का किरदार फिल्म में सिर्फ ग्लैमर कोटा पूरा करता नजर आता है. अभिनय के नाम पर उनके हिस्से में सीमित भावनाएं और दोहराए हुए एक्सप्रेशन्स आते हैं. कई दृश्यों में ऐसा लगता है कि किरदार की जगह सिर्फ खूबसूरत फ्रेम को प्राथमिकता दी गई है.
मृणाल ठाकुर: टैलेंट की सबसे बड़ी बर्बादी
मृणाल ठाकुर जैसी सक्षम अभिनेत्री को इतनी कमजोर तरह से इस्तेमाल करना फिल्म की सबसे बड़ी निराशाओं में से एक है. उनके पास अभिनय की क्षमता है, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें कुछ करने का मौका ही नहीं देती. उनका किरदार कहानी में उतना ही प्रभाव छोड़ता है जितना ट्रेलर में एक सेकंड का शॉट.
स्टार कास्ट ने अपनी तरफ से मेहनत जरूर की है, लेकिन कमजोर लेखन के कारण उनके प्रदर्शन का असर कम हो जाता है. लीड एक्टर्स की केमिस्ट्री कई जगह बनावटी लगती है और भावनात्मक दृश्यों में अपेक्षित प्रभाव पैदा नहीं कर पाती. सहायक कलाकार भी यादगार छाप छोड़ने में असफल रहते हैं.
पुराना फॉर्मूला, नया नाम
फिल्म को देखते हुए बार-बार ऐसा महसूस होता है कि यह कई पुरानी बॉलीवुड रोमांटिक-कॉमेडी फिल्मों का मिला-जुला संस्करण है. न कहानी में ताजगी है, न किरदारों में गहराई और न ही संवादों में कोई यादगार बात
सिनेमैटोग्राफी: खूबसूरत लोकेशन्स भी नहीं बचा पाईं फिल्म
"हैं जवानी तो इश्क होना है" की सिनेमैटोग्राफी उन पहलुओं में से है जहां फिल्म कुछ बेहतर कर सकती थी, लेकिन यहां भी नतीजा निराशाजनक ही निकलता है. बड़े पर्दे पर दिखने वाले फ्रेम्स भले ही चमकदार लगते हों, लेकिन उनमें कोई आत्मा या विजुअल कहानी कहने की कला नजर नहीं आती.फिल्म में खूबसूरत लोकेशन्स का इस्तेमाल तो किया गया है, लेकिन कैमरा उन्हें सिर्फ पोस्टकार्ड की तरह दिखाता है. हर फ्रेम ऐसा लगता है जैसे किसी ट्रैवल ब्रोशर या म्यूजिक वीडियो से उठाकर रख दिया गया हो. कहानी और भावनाओं को मजबूत करने के बजाय सिनेमैटोग्राफी सिर्फ दिखावे तक सीमित रह जाती है.
रोमांटिक दृश्यों में कैमरा वर्क बार-बार एक जैसा महसूस होता है. स्लो-मोशन शॉट्स, ड्रोन एंगल्स और ग्लैमरस फ्रेम्स की भरमार है, लेकिन उनमें कोई नई सोच दिखाई नहीं देती. कई जगह ऐसा लगता है कि फिल्म की कमजोर कहानी को खूबसूरत विजुअल्स के पीछे छिपाने की कोशिश की गई है.सबसे बड़ी समस्या यह है कि कैमरा किरदारों की भावनाओं को कैद करने में नाकाम रहता है. जहां दर्शकों को पात्रों से जुड़ाव महसूस होना चाहिए, वहां सिर्फ सजावटी फ्रेम नजर आते हैं.
फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट औसत है. कुछ लोकेशन्स खूबसूरत दिखती हैं, लेकिन कैमरा वर्क में कोई ऐसा आकर्षण नहीं है जो फिल्म को अलग पहचान दे सके. कई फ्रेम टीवी सीरियल जैसी फील देते हैं, जिससे बड़े पर्दे वाला अनुभव कमजोर पड़ जाता है.
गाने आए, बजकर चले गए... याद कुछ नहीं रहा
रोमांटिक फिल्म होने के बावजूद इसका संगीत सबसे बड़ा मिस्ड ऑपर्च्युनिटी साबित होता है. गाने सुनने के बाद याद नहीं रहते और बैकग्राउंड स्कोर भी कई जगह भावनाओं को उभारने के बजाय उन्हें कमजोर करता है.किसी भी रोमांटिक फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसका संगीत होता है, लेकिन "हैं जवानी तो इश्क होना है" इस मोर्चे पर पूरी तरह लड़खड़ाती नजर आती है. फिल्म के गाने सुनते वक्त ऐसा लगता है कि उन्हें सिर्फ एल्बम पूरा करने के लिए बनाया गया है, दिलों में जगह बनाने के लिए नहीं.एक समय था जब रोमांटिक फिल्मों के गाने थिएटर से निकलने के बाद भी लोगों की जुबान पर रहते थे, लेकिन यहां स्थिति बिल्कुल उलट है. गाने फिल्म में आते हैं, बैकग्राउंड में बजते हैं और अगले ही पल भूल भी जाते हैं. न कोई दमदार धुन, न यादगार बोल और न ही ऐसा म्यूजिक जो कहानी को भावनात्मक गहराई दे सके.सबसे बड़ी समस्या यह है कि फिल्म का संगीत उसकी पहचान बनने के बजाय उसकी कमजोरी बन जाता है. आज के दौर में जब एक अच्छा गाना पूरी फिल्म को चर्चा में ला सकता है, वहां यह फिल्म एक भी ऐसा ट्रैक नहीं दे पाती जिसे दर्शक थिएटर से निकलने के बाद गुनगुनाना चाहें.
पंचलाइन कम, मजबूरी ज्यादा
फिल्म के कई डायलॉग्स ऐसे लगते हैं मानो पुराने बॉलीवुड चुटकुलों को नए किरदारों के मुंह में डाल दिया गया हो. जहां हॉल में ठहाके गूंजने चाहिए थे, वहां कई बार सिर्फ खामोशी सुनाई देती है. कॉमेडी के नाम पर लिखी गई पंचलाइनें सोशल मीडिया के पुराने फॉरवर्ड मैसेज जैसी महसूस होती हैं.फिल्म खत्म होने के बाद दर्शकों के साथ कोई ऐसा डायलॉग नहीं जाता जिसे वे दोहराना चाहें. आज के दौर में जब एक मजबूत संवाद पूरी फिल्म की पहचान बन सकता है, वहां यह फिल्म एक भी प्रभावशाली लाइन देने में नाकाम रहती है.फरहाद सामजी के डायलॉग्स सुनकर लगता है कि कॉमेडी और रोमांस दोनों ने स्क्रिप्ट मीटिंग में शामिल होने से मना कर दिया था.
रोमांस में भी नहीं दिखा जादू
रोमांटिक दृश्यों में संवाद कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय उसे और कमजोर करते हैं. कई लाइनें इतनी बनावटी लगती हैं कि किरदारों की भावनाएं भी नकली महसूस होने लगती हैं. इश्क की गहराई दिखाने की कोशिश में डायलॉग्स अक्सर क्लिशे और घिसे-पिटे लगते हैं.
देखें या नहीं
"हैं जवानी तो इश्क होना है" एक ऐसी फिल्म बनकर रह जाती है जो अपने टाइटल जितना जोश और ताजगी पर्दे पर नहीं ला पाती. कमजोर कहानी, बिखरा हुआ निर्देशन, फीका संगीत और औसत अभिनय इसे एक साधारण रोमांटिक ड्रामा बना देते हैं. अगर आप कुछ नया या यादगार देखने की उम्मीद लेकर थिएटर जा रहे हैं, तो यह फिल्म शायद आपकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरेगी. "हैं जवानी तो इश्क होना है" उन फिल्मों में शामिल हो जाती है जो यह साबित करती हैं कि स्टार पावर और पीआर कैंपेन हमेशा अच्छी फिल्म की गारंटी नहीं होते. वरुण धवन, पूजा हेगड़े और मृणाल ठाकुर जैसे कलाकार होने के बावजूद फिल्म दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने में पूरी तरह विफल रहती है.स्टारकास्ट के हार्ड कोर फैन हैं तो चले जाइए. सिर्फ रिलैक्स करने और दिमाग साइड में रखकर फिल्म देखना चाहते हैं तो भी एक बार जा सकते हैं. बच्चों को लेकर ना जाएं तो बेहतर होगा.
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