Ghaffaruddin Mewati: राजस्थानी लोक संगीत और सांस्कृतिक विरासत को देश-विदेश तक पहुंचाने वाले प्रसिद्ध लोक कलाकार गफरूदीन मेवाती को केंद्र सरकार द्वारा प्रतिष्ठित पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित करने की घोषणा की गई है. यह सम्मान केवल गफरूदीन मेवाती की व्यक्तिगत साधना का परिणाम नहीं है, बल्कि यह लोक परंपराओं, सांस्कृतिक धरोहर और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए उनके अनमोल योगदान की राष्ट्रीय स्वीकृति भी है. गफरूदीन मेवाती का जीवन और कला, इस सम्मान के योग्य एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिसमें समाज की एकता और संस्कृति के संरक्षण की मिसाल दी गई है.
लोक संगीत और भपंग की विरासत
गफरूदीन मेवाती जोगी राजस्थान के उन चुनिंदा लोक कलाकारों में शामिल हैं, जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से न केवल गांव-ढाणियों बल्कि बड़े मंचों तक राजस्थानी संस्कृति को जीवित रखा है. वे विशेष रूप से भपंग वाद्ययंत्र बजाने के लिए प्रसिद्ध हैं. भपंग, जो अब विलुप्त होने की कगार पर है, गफरूदीन ने इसे अपनी पहचान और साधना का प्रमुख माध्यम बनाया. इसके अलावा, वे लोकगीतों के माध्यम से कथा-वाचन करते हैं, जो समाज को न केवल मनोरंजन बल्कि जीवन के गहरे संदेश भी देते हैं.
भपंग का संगीत और लोकगीतों में छिपे सामाजिक और सांस्कृतिक संदेशों ने न केवल राजस्थान बल्कि देशभर में उन्हें एक अनमोल कलाकार के रूप में प्रतिष्ठित किया. उनका संगीत और कला, राजस्थानी परंपराओं और समाज के उत्थान के लिए निरंतर कार्यरत रहने की प्रेरणा है.
लोकगीतों में सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश
गफरूदीन मेवाती की गायकी का विशेष पहलू यह है कि उनके गीतों में हिंदू और मुस्लिम लोक कथाएं एक साथ प्रस्तुत होती हैं. वे महादेव जी के ब्यावला गीत, श्रीकृष्ण से जुड़े छंद, पद्य और राजाओं की वंशावलियों को लोकगीतों के रूप में गाते हैं. इन गीतों में न केवल सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण किया गया है, बल्कि उन्होंने अपनी गायकी के माध्यम से भाईचारे और साम्प्रदायिक सौहार्द का भी सशक्त संदेश दिया है.
मेवाती का मानना था कि समाज को जोड़ने की सबसे सशक्त विधि लोकगीत और संगीत है, क्योंकि यह हर दिल तक पहुंचता है और लोगों के मन में प्यार और सद्भावना का संचार करता है. यही कारण है कि उनका काम केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समरसता और एकता का प्रेरणास्त्रोत भी बन गया है.
गफरूदीन मेवाती की उपलब्धि पर मेवात क्षेत्र में खुशी
जैसे ही केंद्र सरकार ने गफरूदीन मेवाती को पद्मश्री सम्मान देने की घोषणा की, पूरे मेवात क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई. अलवर जिले सहित आसपास के क्षेत्र में उनके परिवार, शुभचिंतकों और साथी कलाकारों ने इस उपलब्धि को पूरे क्षेत्र का सम्मान बताया. गफरूदीन के घर पर बधाइयों का तांता लग गया, और लोक कलाकारों के बीच इस सम्मान को लेकर गर्व और उत्साह का माहौल था.
इस सम्मान से केवल गफरूदीन मेवाती के कार्य की सराहना नहीं हो रही, बल्कि यह राजस्थानी लोक संस्कृति की ताकत और उसके संरक्षण की आवश्यकता को भी उजागर कर रहा है.
संघर्ष और साधना: गफरूदीन मेवाती का जीवन
गफरूदीन मेवाती का जीवन संघर्ष और समर्पण का प्रतीक है. उन्होंने हमेशा अपनी कला को अपनी प्राथमिकता दी, भले ही जीवन में उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. एक समय ऐसा भी था जब वे अपनी कला के जरिए अपने परिवार का गुजारा करते थे. उन्होंने अपनी कला के प्रति अपने समर्पण को साबित करने के लिए सरकारी नौकरी छोड़ दी.
गफरूदीन मेवाती सिंचाई विभाग में सरकारी नौकरी करते थे, लेकिन उनका मानना था कि यदि वे नौकरी के साथ समझौता करेंगे, तो उनकी लोक कला धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी. इसलिए, उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और लोक संगीत को जीवित रखने के अपने मिशन पर ध्यान केंद्रित किया. यही समर्पण और दृढ़ नायकता उन्हें आज इस सम्मान तक ले आई है.
गफरूदीन का आभार और सम्मान
पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त करने पर गफरूदीन मेवाती ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त किया. उन्होंने इस सम्मान को केवल अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन सभी लोक कलाकारों का सम्मान माना है जो वर्षों से अपनी पारंपरिक कला को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
गफरूदीन मेवाती ने कहा कि यह सम्मान उनके लिए गर्व का क्षण है, लेकिन इससे अधिक गर्व की बात यह है कि उनकी कला को राष्ट्रीय मंच पर इतनी उच्च सराहना मिली है. उनका जीवन एक प्रेरणा है कि सच्चे समर्पण और संघर्ष के साथ किसी भी कला को संजीवित किया जा सकता है, और यह सम्मान उसी कला और संस्कृति की जीत है.
लोक कला और संस्कृति की प्रतिष्ठा
गफरूदीन मेवाती के लिए यह पद्मश्री पुरस्कार न केवल उनके व्यक्तिगत संघर्ष और उपलब्धि का प्रतीक है, बल्कि यह राजस्थानी लोक संस्कृति की भी विजय है. उनकी कला ने न केवल राजस्थान, बल्कि पूरे देश में लोक संगीत और संस्कृति को नया जीवन दिया है. उनके काम और उनके योगदान ने यह सिद्ध किया है कि सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित रखने का काम एक व्यक्ति की साधना से शुरू होकर समाज और राष्ट्र तक प्रभाव डाल सकता है.
यह सम्मान आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश देता है कि यदि कला और संस्कृति को जीवन में प्राथमिकता दी जाए, तो वह न केवल व्यक्ति को सम्मान दिलाती है, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए भी एक अनमोल धरोहर बन जाती है.
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