काठमांडू: नेपाल में हाल ही में हुए राजनीतिक तख्तापलट के 13 दिन बीत चुके हैं, लेकिन हालात अब भी सामान्य नहीं हो पाए हैं. जिस Gen-Z आंदोलन ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को देश की प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया था, अब वही युवा आंदोलनकारी सरकार के सामने नई और कठोर मांगें रखने लगे हैं. इनकी सबसे प्रमुख मांग है- देश के सभी पुराने नेताओं और भ्रष्ट अफसरों को तत्काल गिरफ्तार कर जेल भेजा जाए.
हालांकि प्रधानमंत्री सुशीला कार्की पहले ही कह चुकी हैं कि वह कानून का शासन स्थापित करने और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन प्रदर्शनकारी इससे संतुष्ट नहीं हैं. उनका कहना है कि केवल आश्वासन नहीं, बल्कि त्वरित कार्रवाई चाहिए.
Gen-Z की मांग- नेताओं को जेल में ठूंसो
Gen-Z आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सुदन गुरुंग ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में सरकार से दो टूक शब्दों में कहा, "हमारी पहली और सबसे ज़रूरी मांग है- केपी शर्मा ओली सरकार के सभी मंत्रियों को गिरफ्तार किया जाए. जब तक ये लोग सलाखों के पीछे नहीं पहुंचते, तब तक भ्रष्टाचार मिटाना संभव नहीं है."
सुदन गुरुंग, 'हामी नेपाल' नाम की एक सामाजिक संस्था के संस्थापक हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि 2024 में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी करप्शन इंडेक्स में नेपाल 180 देशों में 107वें स्थान पर आ गया है और इसका मुख्य कारण राजनीतिक नेतृत्व की विफलता और व्यापक भ्रष्टाचार है.
अगर मांगे नहीं मानी तो सरकार फिर गिरा देंगे
जब गुरुंग से यह पूछा गया कि क्या इस बार भी आंदोलन विफल हो सकता है, तो उन्होंने दृढ़ता से इनकार करते हुए कहा, "हमने सरकार को छह महीने का समय दिया है. यह पर्याप्त है. अगर मांगे नहीं मानी गईं, तो हम इस सरकार को भी गिरा देंगे."
हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने कुछ कदम उठाए हैं. उदाहरणस्वरूप, एंटी-करप्शन कमेटी का गठन और तख्तापलट के दौरान हुए हिंसक हमलों की जांच के लिए एक स्वतंत्र पैनल की शुरुआत की गई है.
पूर्व सैन्य जनरल ने दी चेतावनी
नेपाल के पूर्व आर्मी जनरल बिनोज बस्नेत ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि यदि सुशीला सरकार ने ओली जैसे ताकतवर नेताओं के खिलाफ कठोर कार्रवाई की, तो हालात और बिगड़ सकते हैं.
उन्होंने कहा, "केपी शर्मा ओली अब भी नेपाल की सबसे बड़ी पार्टी यूनिफाइड मार्क्सवादी-लेनिनवादी (UML) के अध्यक्ष हैं. उनके पास देशभर में मजबूत जनसमर्थन है. यदि उन पर कार्रवाई हुई, तो पार्टी उग्र विरोध कर सकती है."
राजनीतिक विश्लेषकों की चेतावनी
नेपाल के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि देश फिर से एक संवेदनशील संक्रमणकाल से गुजर रहा है. स्थिति काफी हद तक 2008 जैसी है- जब माओवादी आंदोलन के जरिए राजशाही खत्म कर दी गई थी, और उसके बाद नेपाल को एक स्थिर लोकतंत्र में ढालने की कोशिशें जारी रहीं. लेकिन तब से अब तक नेपाल में 14 बार सरकारें बदली हैं, और राजनीतिक अस्थिरता तथा आर्थिक गिरावट ने देश को कमजोर कर दिया है.
नेपाल और बांग्लादेश की तुलना क्यों हो रही है?
नेपाल में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद, कुछ विशेषज्ञ इसे बांग्लादेश की ताज़ा राजनीतिक स्थिति से भी जोड़कर देख रहे हैं.
जहाँ नेपाल में तख्तापलट के बाद अब तक संघर्ष अपेक्षाकृत कम रहा है, वहीं बांग्लादेश में अब भी विरोध प्रदर्शनों, गिरफ्तारियों और झड़पों का दौर जारी है.
नेपाल सरकार में सलाहकार रह चुके पुरंजन आचार्य का कहना है, "अगर सुशीला कार्की का नेतृत्व सफल नहीं रहा, तो भविष्य में ऐसी सरकार बनाना मुश्किल होगा जिस पर लोग भरोसा कर सकें. इससे देश लंबे समय तक अस्थिरता में फंसा रह सकता है."
प्रधानमंत्री कार्की के सामने चुनौती
नेपाल की 43 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था पहले ही संकट में है. राजनीतिक अस्थिरता और प्रदर्शन के कारण पर्यटन, विदेशी निवेश, और विकास परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं.
सरकार ने 5 मार्च 2026 को आम चुनाव कराने की घोषणा की है. हालांकि जानकारों का मानना है कि चुनाव की तारीख छह महीने और आगे बढ़ाई जा सकती है, ताकि युवाओं को अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए पर्याप्त समय मिल सके.
चूंकि यह पूरा आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ है, इसलिए ओली, शेर बहादुर देउबा और अन्य पुराने नेताओं को अगला चुनाव लड़ने की अनुमति न दिए जाने की चर्चा भी ज़ोर पकड़ रही है. इससे पारंपरिक पार्टियों को नए चेहरे खोजना पड़ेंगे.
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