France Protest: फ्रांस इस समय भारी सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा है. सरकार की बजट कटौती नीति के विरोध में गुरुवार को पूरा देश मानो ठहर गया. राजधानी पेरिस से लेकर छोटे-बड़े शहरों तक सड़कों पर विरोध की आग दिखाई दी. सार्वजनिक परिवहन बंद, स्कूलों और अस्पतालों में सन्नाटा और सड़कों पर प्रदर्शनकारी – यही तस्वीरें पूरे फ्रांस की रही.
सरकार का कहना है कि देश पर बढ़ते कर्ज और घाटे को नियंत्रित करने के लिए खर्चों में कटौती ज़रूरी है. इस योजना के तहत शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण जैसे क्षेत्रों के बजट में कटौती की जा रही है. लेकिन यूनियनों और आम लोगों का मानना है कि यह कदम मध्यम वर्ग और मजदूर तबके पर सीधा हमला है, जबकि बड़ी कंपनियों और धनी वर्ग को सरकार राहत देती रही है.
बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे
प्रदर्शन में लगभग 8 लाख से अधिक लोग शामिल हुए, जिनमें मजदूर, शिक्षक, स्वास्थ्यकर्मी, रेलवे कर्मचारी और छात्र भी शामिल थे. 12 से ज्यादा मज़दूर यूनियनों ने संयुक्त रूप से हड़ताल का आह्वान किया था. पेरिस मेट्रो की लगभग 91% सेवाएं ठप रहीं. रेलवे, बस, हवाई सेवाओं, यहां तक कि बिजली उत्पादन में भी व्यापक असर देखने को मिला. ऊर्जा कंपनी EDF ने परमाणु संयंत्रों से 1.1 गीगावॉट उत्पादन घटा दिया. लूव्र म्यूजियम समेत कई प्रमुख स्थल बंद कर दिए गए.
सड़कों पर विरोध, पुलिस से भिड़ंत
प्रदर्शनकारियों ने "अमीरों पर टैक्स लगाओ" जैसे नारों के साथ कई इलाकों में बैरिकेड्स लगाए, आगजनी की और हाईवे जाम कर दिए. पुलिस ने हालात पर काबू पाने के लिए आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया. मार्सिले में प्रदर्शनकारियों ने उस फैक्ट्री का घेराव किया, जिस पर आरोप है कि वह इजरायल को हथियार सप्लाई करती है. वहां फिलिस्तीनी झंडे लहराए गए और युद्धविरोधी नारों ने माहौल को और गर्मा दिया.
यूनियनों का सीधा आरोप “संसाधन गलत हाथों में”
सॉलिडेयर्स यूनियन की राष्ट्रीय सचिव मैरी वेरॉन ने सरकार की नीतियों को "असमानता और अन्याय" के खिलाफ लड़ाई बताया. वहीं ज्यां-पियरे मेर्सियर, एक अन्य यूनियन प्रतिनिधि ने सवाल उठाया अगर सेना को 400 अरब यूरो दिए जा सकते हैं, तो फिर स्कूल और अस्पताल क्यों खस्ताहाल हैं?"
सत्ता में भी उथल-पुथल
हाल ही में प्रधानमंत्री फ्रांस्वा बेयरू के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पास होने के बाद उनके इस्तीफे ने सरकार की स्थिति पहले ही कमजोर कर दी थी. उनकी जगह सेबेस्टियन लेकोर्नू की नियुक्ति ने जनता के गुस्से को और भड़का दिया.
सरकार ने दिखाया सख्त रुख
गृह मंत्री ब्रूनो रेटेलियो ने पहले ही चेतावनी दी थी कि अतिवादी तत्व हिंसा फैला सकते हैं. इस आशंका के चलते पूरे देश में 80,000 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी, बख्तरबंद वाहन, ड्रोन और वाटर कैनन तैनात किए गए. बावजूद इसके, कई शहरों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी झड़पें हुईं.
आगे क्या? संकट की आशंका गहराई
फ्रांस की अर्थव्यवस्था पहले ही महंगाई और सार्वजनिक कर्ज की चुनौतियों से जूझ रही है. सरकार जहां अपने कदम को आवश्यक आर्थिक सुधार बता रही है, वहीं आम जनता इसे एकतरफा और अन्यायपूर्ण फैसला मान रही है. नीतियों में बदलाव नहीं हुआ, तो विशेषज्ञों का मानना है कि फ्रांस जल्द ही एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक संकट की ओर बढ़ सकता है.
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