CJP Jantar Mantar Protest: दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित कॉकरोच पार्टी का पहला बड़ा जन प्रदर्शन अपेक्षित समर्थन हासिल नहीं कर सका. नीट और अन्य परीक्षा अनियमितताओं के मुद्दे पर आयोजित इस कार्यक्रम को लेकर सोशल मीडिया पर काफी चर्चा देखने को मिली थी, लेकिन जमीनी स्तर पर वैसी भागीदारी नजर नहीं आई.
पार्टी के युवा संस्थापक अभिजीत दीपके विशेष रूप से अमेरिका से भारत लौटकर इस प्रदर्शन में शामिल हुए. हालांकि सोशल मीडिया पर सक्रिय दिखाई देने वाला बड़ा समर्थक वर्ग कार्यक्रम स्थल पर बड़ी संख्या में मौजूद नहीं दिखा.
सीमित संख्या में पहुंचे प्रदर्शनकारी
सूत्रों के अनुसार, प्रदर्शन में लगभग 500 से 1000 लोगों की मौजूदगी रही. कार्यक्रम स्थल पर सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी थी. दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान बड़ी संख्या में तैनात रहे, जिसके बीच प्रदर्शनकारियों का समूह जंतर-मंतर के निर्धारित क्षेत्र तक ही सीमित रहा.
प्रतीकात्मक अभियान भी नहीं पकड़ सका रफ्तार
प्रदर्शन से पहले अभिजीत दीपके ने समर्थकों से तिरंगा, किताबें और पुलिसकर्मियों को भेंट करने के लिए फूल लेकर आने की अपील की थी. इस पहल को आंदोलन की पहचान बनाने की कोशिश की गई थी, लेकिन अपेक्षा के अनुरूप भीड़ नहीं जुटने के कारण यह अभियान व्यापक चर्चा हासिल नहीं कर पाया.
नारेबाजी से कुछ देर बना तनाव
कार्यक्रम के दौरान कुछ युवकों द्वारा कॉकरोच पार्टी के विरोध में नारेबाजी किए जाने की भी सूचना मिली. इससे कुछ समय के लिए हलचल की स्थिति बनी, लेकिन पुलिस ने तत्काल हस्तक्षेप कर हालात को नियंत्रित कर लिया. इसके बाद कार्यक्रम शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ा.
राजनीतिक समर्थन के बावजूद नहीं बनी बड़ी लहर
आंदोलन को कुछ विपक्षी नेताओं और आम आदमी पार्टी समर्थक समूहों की ओर से अप्रत्यक्ष समर्थन मिलने की चर्चाएं भी रहीं. सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के बयानों का भी उल्लेख किया गया, लेकिन इसके बावजूद राजधानी में यह प्रदर्शन कोई बड़ा जन आंदोलन खड़ा करने में सफल नहीं हो सका.
सोशल मीडिया बनाम जमीनी राजनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लोकप्रियता और वास्तविक जनसंगठन दो अलग-अलग चीजें हैं. सोशल मीडिया पर ट्रेंड बनाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन उसे बड़े जन आंदोलन में बदलने के लिए मजबूत संगठनात्मक ढांचे और व्यापक जमीनी नेटवर्क की जरूरत होती है.
जंतर-मंतर का यह प्रदर्शन एक बार फिर इस बहस को सामने लेकर आया है कि इंटरनेट पर दिखने वाला समर्थन हमेशा सड़कों पर दिखाई देने वाली जनभागीदारी में तब्दील नहीं होता. डिजिटल दुनिया का हर ट्रेंड वास्तविक दुनिया में बड़े आंदोलन का रूप ले सके, यह जरूरी नहीं है.
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