कोई मिलने आ रहा, तो कोई फोन पर कर रहा बात... यूक्रेन में शांति के लिए यूरोप को अब पीएम मोदी से उम्मीद

दुनिया जब युद्ध की आंच में झुलस रही है, जब रूस और यूक्रेन के बीच खत्म होती जिंदगियों की गूंज पूरी मानवता को बेचैन कर रही है तब एक नाम है, जिसने शांति की उम्मीद को जिंदा रखा है. वो नाम है भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का.

Europe now hopes from PM Modi for peace in Ukraine
प्रतिकात्मक तस्वीर/ ANI

दुनिया जब युद्ध की आंच में झुलस रही है, जब रूस और यूक्रेन के बीच खत्म होती जिंदगियों की गूंज पूरी मानवता को बेचैन कर रही है तब एक नाम है, जिसने शांति की उम्मीद को जिंदा रखा है. वो नाम है भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का.

यूरोप से लेकर अमेरिका तक, तमाम बड़ी ताकतें इस संकट को सुलझाने में नाकाम रही हैं. अब जब हर दरवाज़ा बंद होता दिख रहा है, तब भारत वह अकेला देश है जिसकी बात रूस भी सुनता है, और यूक्रेन भी भरोसा करता है. यही कारण है कि यूरोप की उम्मीदें अब किसी वॉशिंगटन या पेरिस से नहीं, बल्कि दिल्ली से जुड़ गई हैं.

फ्रांस ने बढ़ाया हाथ, मैक्रों ने किया फोन

फ्रांस और भारत के रिश्ते हमेशा से मजबूत रहे हैं, लेकिन इस बार मामला सिर्फ दोस्ती का नहीं है. जब रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच सब कुछ ठहर गया, तब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पीएम मोदी को फोन किया. बातचीत सिर्फ युद्ध पर नहीं, बल्कि भविष्य की साझेदारियों पर भी केंद्रित रही.

दोनों नेताओं ने रक्षा, विज्ञान, तकनीक और इंडो-पैसिफिक रणनीति पर सहयोग को और गहरा करने की बात की. मोदी ने मैक्रों को भारत में अगले साल होने वाले AI Impact Summit में शामिल होने का न्योता भी दिया. फ्रांस को यह संदेश साफ मिल गया- भारत सिर्फ आग बुझाने नहीं आया, वो मिलकर नया भविष्य गढ़ना चाहता है.

यूरोपीय संघ को मोदी में दिखा भरोसेमंद नेता

कुछ ही दिन पहले पीएम मोदी ने यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयन से एक संयुक्त कॉल पर बातचीत की. यह बातचीत दिखाती है कि अब यूरोप भारत को किसी विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि मुख्य रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रहा है.

इस चर्चा में सिर्फ युद्ध नहीं, बल्कि India-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को जल्द पूरा करने की बात हुई. मोदी ने दो टूक कहा कि भारत शांति का पक्षधर है, लेकिन साथ ही व्यापार, तकनीक और सहयोग को प्राथमिकता देना भी जरूरी है. यूरोप को यही संतुलन चाहिए और वो संतुलन भारत के पास है.

जर्मनी भी भारत की ओर, रिश्ते हो रहे गहरे

जर्मनी, जो हमेशा से यूरोप की आर्थिक और राजनीतिक धुरी रहा है, अब भारत की ओर खुलकर झुकाव दिखा रहा है. हाल ही में जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वेडेपुल भारत आए और पीएम मोदी से मुलाकात की.

बातचीत में यह साफ हुआ कि जर्मनी भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी के 25 साल पूरे होने पर इन रिश्तों को और मजबूत करना चाहता है. व्यापार, टेक्नोलॉजी, स्थिरता और रक्षा जैसे हर क्षेत्र में भारत अब जर्मनी के लिए एक निर्णायक सहयोगी बन गया है. यहां तक कि जल्द ही जर्मनी की चांसलर की भारत यात्रा की भी योजना है.

रूस और यूक्रेन, दोनों से सीधी बातचीत का भरोसा

प्रधानमंत्री मोदी की डिप्लोमेसी की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उन्होंने कभी किसी एक पक्ष का अंधा समर्थन नहीं किया. रूस से भी वे बातचीत करते हैं और यूक्रेन से भी सीधे संपर्क में रहते हैं. यही कारण है कि दोनों देशों में भारत को लेकर सम्मान और विश्वास बना हुआ है.

SCO शिखर सम्मेलन में मोदी और व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात में मोदी ने स्पष्ट संदेश दिया कि युद्ध बंद होना चाहिए और समाधान की ओर बढ़ना जरूरी है. दूसरी ओर, मोदी ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से भी फोन पर बात की और शांति प्रयासों में समर्थन देने का भरोसा दिलाया. यह संतुलन दुनिया में शायद ही किसी और नेता के पास हो.

ट्रंप से मोहभंग: यूरोप ने बदली दिशा

एक समय था जब यूरोप अमेरिका के हर रुख पर भरोसा करता था. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. डोनाल्ड ट्रंप की बयानबाज़ी और भारत के खिलाफ लगातार धमकियों ने यूरोप को असहज कर दिया है.

चाहे टैरिफ का मुद्दा हो या तेल खरीद को लेकर चेतावनी, ट्रंप ने कभी संतुलन नहीं दिखाया. उन्होंने तो यहां तक कहा कि "भारत अब रूस और चीन के करीब जा रहा है." जबकि सच्चाई यह है कि भारत हर पक्ष से रिश्ते निभा रहा है, संतुलन बनाए हुए है. अब यही संतुलन यूरोप को आकर्षित कर रहा है और यही वजह है कि ट्रंप के सुर भी बदलने लगे हैं.

क्यों अब उम्मीद है सिर्फ भारत से?

यूरोप की यह उम्मीद अचानक नहीं बनी. इसके पीछे मोदी की वर्षों की डिप्लोमेसी, विश्वास निर्माण और संतुलित नीति है. भारत ने कभी किसी पक्ष के प्रति अंध समर्थन नहीं किया. उसने हमेशा कहा कि शांति सर्वोपरि है, लेकिन अपने हितों और साझेदारियों से समझौता भी नहीं होगा.

भारत आज G20, SCO, BRICS और Quad जैसे मंचों पर निर्णायक भूमिका निभा रहा है. यही उसकी बढ़ती ताकत का सबूत है. और जब अमेरिका के रवैये में अस्थिरता नजर आई, तब यूरोप ने तय कर लिया- अब भरोसे की डोर दिल्ली के हाथों में सौंपनी है.

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