El Nino: गर्मी, सूखा, कम बारिश... दुनियाभर में बदलेगा मौसम का मिजाज, भारत पर क्या होगा अल नीनो का असर?

दुनिया के मौसम पर असर डालने वाली महत्वपूर्ण जलवायु घटनाओं में अल नीनो का नाम सबसे प्रमुख माना जाता है.

El Nino Weather patterns will change around the world Effect on India
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

El Nino 2026: दुनिया के मौसम पर असर डालने वाली महत्वपूर्ण जलवायु घटनाओं में अल नीनो का नाम सबसे प्रमुख माना जाता है. मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि इस साल अल नीनो के प्रभाव के कारण दुनिया के कई हिस्सों में तूफानों की गतिविधियों, बारिश के पैटर्न और तापमान में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं. इसका असर भारत सहित कई देशों पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है.

अटलांटिक महासागर में हर साल जून से नवंबर के बीच तूफानों का मौसम रहता है, जिसमें सितंबर के आसपास गतिविधियां सबसे ज्यादा होती हैं. मौसम विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बार अटलांटिक क्षेत्र में सामान्य से कम तूफानी गतिविधियां देखने को मिल सकती हैं. इसके पीछे अल नीनो को प्रमुख कारण माना जा रहा है, क्योंकि यह महासागरीय और वायुमंडलीय परिस्थितियों को प्रभावित करता है.

क्या है अल नीनो?

अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है, जिसमें मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के समुद्री जल का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है. समुद्र के तापमान में यह बदलाव दुनिया भर के मौसम तंत्र को प्रभावित करता है और कई क्षेत्रों में बाढ़, सूखा, लू तथा असामान्य वर्षा जैसी परिस्थितियां पैदा कर सकता है.

इस दौरान वैश्विक औसत तापमान में भी वृद्धि दर्ज की जाती है, जिससे गर्मी का प्रभाव और अधिक महसूस होता है.

कितनी बार आता है अल नीनो?

अल नीनो आमतौर पर हर दो से सात वर्ष के अंतराल पर विकसित होता है और इसका प्रभाव कई महीनों तक बना रह सकता है. इसका विपरीत चरण 'ला नीना' कहलाता है, जिसमें प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से कम हो जाता है. दोनों घटनाएं ENSO (एल नीनो-दक्षिणी दोलन) नामक वैश्विक जलवायु प्रणाली का हिस्सा हैं.

तूफानों की दिशा और संख्या में बदलाव

अल नीनो के दौरान समुद्री हवाओं के पैटर्न में बदलाव आता है. इसके कारण अटलांटिक क्षेत्र में तूफानों की संख्या और तीव्रता कम हो सकती है, जबकि प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में चक्रवाती गतिविधियां बढ़ सकती हैं.

विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तर-पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में बनने वाले टाइफून की कुल संख्या में बहुत बड़ा बदलाव नहीं होता, लेकिन उनके बनने के स्थान बदल सकते हैं. कई तूफान एशियाई तटों से दूर पूर्वी क्षेत्रों में विकसित हो सकते हैं.

दुनिया में बढ़ सकती हैं मौसम संबंधी चुनौतियां

अल नीनो के प्रभाव से ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी और मध्य अफ्रीका, अमेजन क्षेत्र तथा एशिया के कुछ हिस्सों में गर्म और शुष्क परिस्थितियां बन सकती हैं. इससे जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ने का खतरा रहता है.

दूसरी ओर अमेरिका के कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश और बाढ़ जैसी परिस्थितियां बनने की संभावना भी बढ़ जाती है. कई देशों में मौसम सामान्य पैटर्न से अलग व्यवहार कर सकता है.

भारत पर क्या होगा असर?

भारत के लिए अल नीनो का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि देश की कृषि और जल संसाधन काफी हद तक मानसून पर निर्भर करते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अल नीनो की स्थिति में मानसून कमजोर पड़ सकता है और कई इलाकों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज हो सकती है.

इसके अलावा गर्मी का मौसम लंबा खिंच सकता है और तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है. कम बारिश की स्थिति में कृषि उत्पादन प्रभावित होने की आशंका रहती है, जिससे खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है.

जलवायु परिवर्तन से बढ़ सकती है चुनौती

विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण पहले से ही तापमान में बढ़ोतरी देखी जा रही है. ऐसे में यदि अल नीनो का प्रभाव भी सक्रिय रहता है तो कई क्षेत्रों में गर्मी, सूखे और जल संकट जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं.

आने वाले महीनों में मौसम वैज्ञानिक लगातार प्रशांत महासागर की स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि इसका प्रभाव दुनिया के मौसम और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ सकता है.

ये भी पढ़ें- Weather Update: कुछ घटों में बरसेंगे बादल, कई राज्यों में बारिश-आंधी का अलर्ट, गर्मी से मिलेगी राहत!