Weather: देशभर में मई की शुरुआत से ही गर्मी ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है. उत्तर भारत से लेकर मध्य और पश्चिम भारत तक तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है. लेकिन मौसम वैज्ञानिकों की मानें तो अभी जो तपिश महसूस हो रही है, वह सिर्फ एक झलक है. असली खतरा आने वाले महीनों में सामने आ सकता है. वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि इस साल साधारण नहीं बल्कि ‘सुपर एल नीन्यो’ बनने की आशंका बढ़ रही है, जो दुनिया भर में मौसम को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है.
अगर यह आशंका सच साबित होती है, तो भारत समेत कई देशों में भीषण गर्मी, कमजोर मानसून, सूखा और लंबे समय तक चलने वाली हीटवेव जैसी गंभीर परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग पहले ही धरती का तापमान बढ़ा चुकी है और अगर सुपर एल नीन्यो सक्रिय हुआ, तो यह असर और खतरनाक हो जाएगा.
क्या है एल नीन्यो?
एल नीन्यो एक मौसमी घटना है, जिसका संबंध प्रशांत महासागर के तापमान और वहां की हवाओं से होता है. यह शब्द स्पेनिश भाषा से आया है, जिसका अर्थ ‘छोटा बच्चा’ होता है. दक्षिण अमेरिका के मछुआरों ने यह नाम उस समय दिया था, जब क्रिसमस के आसपास समुद्र का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता था.
हालांकि नाम दक्षिण अमेरिका से जुड़ा है, लेकिन इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है. भारत में भी मानसून, गर्मी और बारिश पर एल नीन्यो का सीधा प्रभाव देखने को मिलता है.
सामान्य दिनों में कैसे काम करता है मौसम तंत्र?
आमतौर पर प्रशांत महासागर में ‘ट्रेड विंड्स’ यानी पूर्व से पश्चिम की ओर हवाएं चलती हैं. ये हवाएं गर्म पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की दिशा में धकेलती रहती हैं. इस वजह से इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के पास समुद्र का पानी ज्यादा गर्म रहता है, जबकि दक्षिण अमेरिका के पेरू और इक्वाडोर के तट के पास पानी अपेक्षाकृत ठंडा रहता है.
यह संतुलन पूरी दुनिया के मौसम को सामान्य बनाए रखने में मदद करता है. इसी प्रक्रिया से भारत तक मानसून की नमी पहुंचती है और बारिश होती है.
एल नीन्यो आने पर क्या बदलता है?
जब एल नीन्यो सक्रिय होता है, तो ट्रेड विंड्स कमजोर पड़ने लगती हैं. इससे पश्चिम में जमा गर्म पानी वापस पूर्व की ओर दक्षिण अमेरिका की तरफ बहने लगता है. परिणामस्वरूप प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से ज्यादा बढ़ जाता है.
समुद्र का यह गर्म पानी ऊपर की हवा को भी गर्म कर देता है. इससे दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में भारी बारिश होती है, जबकि एशिया की ओर बादल कम पहुंचते हैं. यही वजह है कि भारत में मानसून कमजोर पड़ने लगता है और गर्मी बढ़ जाती है.
इस बार क्यों ज्यादा है खतरा?
वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार प्रशांत महासागर का तापमान बेहद तेजी से बढ़ रहा है. मध्य प्रशांत क्षेत्र में तापमान पहले ही सामान्य से करीब 0.9 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच चुका है. इसके अलावा समुद्र की सतह के नीचे गर्म पानी का विशाल भंडार लगातार बढ़ रहा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तापमान 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बढ़ गया, तो इसे ‘सुपर एल नीन्यो’ कहा जाएगा. पिछले 70 सालों में ऐसा सिर्फ तीन बार — 1982, 1997 और 2015 में हुआ था. हर बार इसका असर दुनिया भर में गंभीर रूप से देखा गया था.
इस बार डर इसलिए ज्यादा है क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग पहले ही समुद्र और धरती दोनों का तापमान बढ़ा चुकी है. ऐसे में सुपर एल नीन्यो का असर पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकता है.
भारत पर क्या होगा असर?
अगर सुपर एल नीन्यो सक्रिय होता है, तो भारत में सबसे पहला असर मानसून पर पड़ेगा. बारिश सामान्य से कम हो सकती है और कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति पैदा हो सकती है.
दूसरा बड़ा असर तापमान पर देखने को मिलेगा. मौसम विशेषज्ञों का अनुमान है कि उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत के कई इलाकों में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस या उससे ऊपर जा सकता है.
दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भीषण लू चल सकती है. हीटवेव कुछ दिनों की बजाय कई हफ्तों तक जारी रह सकती है. इससे पानी और बिजली संकट भी गहरा सकता है.
क्यों बढ़ जाती है भारत में गर्मी?
भारत का मानसून अरब सागर और हिंद महासागर से आने वाली नमी भरी हवाओं पर निर्भर करता है. लेकिन एल नीन्यो के दौरान प्रशांत महासागर में बदलाव के कारण हवाओं का पैटर्न बदल जाता है.
जो हवाएं भारत की ओर नमी लेकर आती हैं, वे कमजोर पड़ जाती हैं या रास्ता बदल लेती हैं. इसके कारण आसमान साफ रहता है और बादल नहीं बनते. गर्मियों में सूरज की सीधी किरणें जमीन को तेजी से गर्म कर देती हैं, जिससे तापमान बढ़ जाता है और लू की स्थिति बनती है.
सुपर एल नीन्यो कितना खतरनाक होता है?
सुपर एल नीन्यो को साधारण एल नीन्यो का बेहद खतरनाक रूप माना जाता है. इसमें समुद्र का तापमान सामान्य से 2 डिग्री या उससे ज्यादा बढ़ जाता है. इसका असर केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ता है.
इससे कहीं भीषण सूखा पड़ सकता है, कहीं बाढ़ आ सकती है, जंगलों में आग लग सकती है और लंबे समय तक हीटवेव चल सकती है. 1997 का सुपर एल नीन्यो दुनिया के सबसे खतरनाक मौसमी घटनाक्रमों में से एक माना जाता है.
पिछले सुपर एल नीन्यो का असर
2015 में आए सुपर एल नीन्यो के दौरान भारत में मानसून करीब 14 फीसदी कमजोर रहा था. कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति पैदा हो गई थी.
1997 में पेरू में भारी बाढ़ आई थी, जबकि इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया में भयंकर सूखा और जंगल की आग की घटनाएं बढ़ गई थीं. 1982 में भी इस मौसमी बदलाव ने दुनिया भर में मौसम तंत्र को बुरी तरह प्रभावित किया था.
अब वैज्ञानिकों को डर है कि इस बार समुद्र का तापमान पहले से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है. अगर यह सिलसिला जारी रहा, तो आने वाले महीनों में मौसम बेहद खतरनाक रूप ले सकता है.
ग्लोबल वार्मिंग ने बढ़ाया खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग ने सुपर एल नीन्यो के खतरे को और गंभीर बना दिया है. प्रदूषण और लगातार बढ़ते कार्बन उत्सर्जन के कारण पृथ्वी का औसत तापमान पहले ही बढ़ चुका है.
जब एल नीन्यो जैसी प्राकृतिक घटना इस बढ़े हुए तापमान के साथ जुड़ती है, तो असर कई गुना बढ़ जाता है. यानी ग्लोबल वार्मिंग धरती को पहले से गर्म कर चुकी है और सुपर एल नीन्यो उस गर्मी को और बढ़ा सकता है.
यही वजह है कि मौसम वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि आने वाले महीने दुनिया के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं. अगर हालात नहीं बदले, तो इस बार गर्मी और सूखे के कई पुराने रिकॉर्ड टूट सकते हैं.
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