नई दिल्ली: 21वीं सदी के युद्ध अब सिर्फ ताकत और हथियारों पर निर्भर नहीं रह गए हैं, बल्कि अब यह तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के इर्द-गिर्द घूमने लगे हैं. भारत की रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) भी इस तकनीकी दौड़ में पीछे नहीं है. डीआरडीओ लगातार ऐसी तकनीकों पर काम कर रहा है जो भविष्य में युद्ध की रूपरेखा ही बदल सकती हैं. रोबोटिक सिस्टम, ऑटोमेशन और AI की मदद से अब सैनिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ दुश्मन को चौंकाने की तैयारी हो रही है.
ह्यूमनोइड रोबोट्स: युद्ध के मैदान में मशीन-सैनिक
डीआरडीओ के पुणे स्थित 'रिसर्च एंड डेवलपमेंट इस्टेब्लिशमेंट (इंजीनियर्स)' द्वारा ह्यूमनोइड रोबोट का विकास किया जा रहा है, जो खतरनाक मिशनों में मानव सैनिकों की जगह ले सकता है. इस रोबोट के ऊपरी और निचले हिस्सों के प्रोटोटाइप तैयार किए जा चुके हैं. इसका उद्देश्य है – बम निष्क्रिय करना, बाधाएं हटाना, दरवाजे खोलना-बंद करना और खतरनाक वस्तुओं को संभालना. यह रोबोट दिन और रात दोनों परिस्थितियों में काम करने में सक्षम होगा.
AI-आधारित हथियार: स्मार्ट हथियारों का युग
गन ऑन ड्रोन: एक ऐसी प्रणाली जिसमें ड्रोन पर लगी बंदूक, लक्ष्य की पहचान कर सकती है और आदेश मिलने पर हमला कर सकती है.
एक्सोस्केलेटन सूट: सैनिकों की ताकत बढ़ाने और थकावट कम करने के लिए विशेष पोशाक, जिससे उनकी ऑपरेशन क्षमता बढ़ेगी.
AI और रोबोटिक्स प्रोजेक्ट्स: सेंटर फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एंड रोबोटिक्स (CAIR) द्वारा इंटेलिजेंट अनमैन्ड सिस्टम्स, कंप्यूटर विजन, पाथ प्लानिंग, स्लैम (Simultaneous Localization and Mapping), टैक्टिकल सेंसर नेटवर्क, और स्वार्म रोबोटिक सिस्टम्स जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम जारी है.
‘दक्ष’ रोबोट: बम निष्क्रिय करने वाला स्वायत्त रोबोट जो खतरनाक वस्तुओं की पहचान कर सुरक्षित निष्क्रिय कर सकता है.
सेना में कब तक होगी तैनाती?
ह्यूमनोइड रोबोट के लिए 2027 तक महत्वपूर्ण परीक्षण और विकास कार्य पूरा करने का लक्ष्य है. हालांकि, तकनीकी, नैतिक और कानूनी चुनौतियों को देखते हुए इन्हें सेना में पूरी तरह शामिल करने में कुछ और समय लग सकता है. विश्वसनीयता, नियंत्रण और लॉजिस्टिक्स जैसे पहलुओं पर अभी गहन काम चल रहा है.
सेना और समाज को मिलेंगे कौन-कौन से लाभ?
सैनिकों की जान की सुरक्षा: खतरनाक मिशनों में रोबोट्स और AI हथियार सैनिकों के स्थान पर तैनात किए जा सकेंगे.
सतर्कता और निगरानी में बढ़त: स्वचालित प्रणाली सीमाओं की निगरानी, गश्त और आतंकी गतिविधियों पर नियंत्रण में बेहद कारगर साबित हो सकती हैं.
निर्णय लेने की गति: AI-सक्षम सिस्टम तेजी से डेटा का विश्लेषण कर तत्काल निर्णय लेने में सक्षम हैं, जिससे समय की बचत और सटीकता दोनों बढ़ेंगी.
क्या हैं चुनौतियां और चिंताएं?
डेटा और निर्णय में त्रुटियां: अगर AI गलत जानकारी दे दे या सेंसर डेटा में गड़बड़ी हो जाए, तो जान-माल का बड़ा नुकसान हो सकता है.
मानव नियंत्रण की सीमा: युद्ध में निर्णय लेने की जिम्मेदारी किसकी होगी—AI की या उसके ऑपरेटर की?
उच्च लागत और प्रशिक्षण: इन तकनीकों को विकसित, मेंटेन और ऑपरेट करने में भारी लागत और विशेषज्ञ प्रशिक्षण की जरूरत है.
नैतिक और कानूनी सवाल: क्या मशीनों को मारने का अधिकार देना उचित है? इसकी सीमा और जवाबदेही तय करना एक बड़ी चुनौती है.
ये भी पढ़ें: सुखोई, तेजस, राफेल... IAF के जंगी बेड़े में शामिल होंगे 1000 से ज्यादा फाइटर जेट, पाकिस्तान-चीन होंगे बेचैन