दिवाली के उत्सव के ठीक बाद, दिल्ली की हवा ने एक बार फिर खतरनाक मोड़ ले लिया है. इस बार का वायु प्रदूषण पिछले पाँच वर्षों के सभी रिकॉर्ड पीछे छोड़ते हुए भयावह स्थिति में पहुँच गया.
हालाँकि इस साल पराली जलाने की घटनाओं में भारी कमी देखी गई आंकड़ों के अनुसार 77.5% तक की गिरावट आई है. फिर भी दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) गंभीर श्रेणी में दर्ज किया गया. मंगलवार सुबह की बात करें तो शहर का औसत PM2.5 स्तर 488 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक जा पहुँचा, जो WHO की निर्धारित सुरक्षित सीमा से करीब 100 गुना ज्यादा है. दिवाली रात की बात करें तो प्रदूषण का स्तर और भी चिंताजनक रहा —PM2.5 का अधिकतम स्तर 675 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पर पहुँच गया, जो एक खतरनाक स्थिति को दर्शाता है.
'ग्रीन पटाखों' का असर नहीं दिखा, हवा में फिर फैला ज़हर
सरकारी आदेशों और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के बावजूद इस साल भी राजधानी की हवा जहरीले धुएँ और रसायनों से भर गई. दिल्ली सरकार द्वारा प्रचारित 'हरित' यानी ग्रीन पटाखों को जलाने की अनुमति दी गई थी, लेकिन उसका अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखाई दिया. राजधानी कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. एस.के. ढाका ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि, "ग्रीन पटाखों से भी स्थानीय स्तर पर कणीय प्रदूषण में बढ़ोतरी हुई है. यह दिखाता है कि इन पटाखों की गुणवत्ता पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की जरूरत है."
PM2.5 में तीन गुना उछाल, दिवाली से पहले और बाद की तुलना
Climate Trends की वरिष्ठ शोधकर्ता पलाक बाल्यन ने जानकारी दी कि दिवाली से पहले जहाँ PM2.5 स्तर 156.6 था, वहीं त्योहार के बाद यह औसतन 488 तक जा पहुँचा यानी लगभग तीन गुना वृद्धि. इसके पीछे मौसम की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही. तेज हवाओं की अनुपस्थिति और तापमान में गिरावट (27°C से घटकर 19°C) के कारण प्रदूषण हवा में नहीं उड़ सका और ज़मीन के निकट ही बना रहा, जिससे हवा और अधिक जहरीली हो गई.
पराली से ज़्यादा ज़िम्मेदार बने शहरी कारक
जहाँ अक्सर दिल्ली के प्रदूषण के लिए पराली जलाने को दोषी ठहराया जाता है, वहीं इस बार के आँकड़े कुछ और ही कहानी बयान करते हैं. पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में भारी गिरावट दर्ज की गई, जिससे दिल्ली में औसतन 15.5% तक PM2.5 की कमी आई. बावजूद इसके, वायु गुणवत्ता खतरनाक बनी रही. 50 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की सुरक्षित सीमा से काफी ऊपर. इससे साफ है कि शहरी प्रदूषण, जैसे – ट्रैफिक, निर्माण कार्यों से उड़ती धूल और औद्योगिक उत्सर्जन – अब दिल्ली की खराब हवा के मुख्य कारक बनते जा रहे हैं.
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