नई दिल्ली: ताइवान के मुद्दे को लेकर पहले से ही जापान और चीन के बीच रिश्तों में खटास बनी हुई थी, और अब हालिया घटनाओं ने इस तनाव को और बढ़ा दिया है. जापान ने अमेरिका को घातक पैट्रियट मिसाइल इंटरसेप्टर भेजकर चीन को और अधिक उकसाया है. चीन ने इस कदम को बेहद खतरनाक बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि यह कदम क्षेत्रीय सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है. इस लेख में हम इस घटनाक्रम के पीछे के कारणों, चीन की प्रतिक्रिया और जापान की बदली रक्षा नीति पर विस्तार से चर्चा करेंगे.
चीन का सीधा हमला
चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने जापान के इस कदम पर तीखा हमला करते हुए कहा कि टोक्यो अब अपने हथियारों के निर्यात पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा रहा है. चीनी सैन्य विशेषज्ञ झांग शुएफेंग ने इसे अत्यधिक खतरनाक कदम करार दिया है, जो क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए समस्याएँ पैदा कर सकता है. उनका कहना है कि जापान का इस तरह की घातक मिसाइलों को भेजने का कदम, भविष्य में और भी खतरनाक हथियारों के निर्यात का मार्ग खोल सकता है.
चीन की चिंता का कारण यह है कि जापान अब अपने शांतिपूर्ण संविधान की सीमाएं तोड़ते हुए सैन्य शक्ति बढ़ा रहा है. यह चिंताएं इसलिए भी बढ़ रही हैं क्योंकि जापान, ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अधिक आक्रामक रुख अपना रहा है, जिससे चीन की स्थिति और भी कठिन हो गई है.
जापान की बदली नीति: अब हथियारों का निर्यात संभव
वर्षों तक जापान के पास हथियारों के निर्यात को लेकर सख्त नियम थे. थ्री प्रिंसिपल्स ऑन डिफेंस ट्रांसफर के तहत जापान घातक हथियारों का निर्यात या भेजने की अनुमति नहीं देता था. लेकिन 2023 में टोक्यो ने अपनी रक्षा नीति में बड़ा बदलाव किया और अमेरिका को पैट्रियट मिसाइल भेजने की अनुमति दी. यह कदम जापान की बढ़ती सैन्य ताकत को दर्शाता है. अब जापान अपनी डिफेंस इंडस्ट्री को और मजबूत करने और हथियार उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रहा है. इससे अमेरिका को भी फायदा हो रहा है, क्योंकि अमेरिका का हथियार भंडार यूक्रेन युद्ध के कारण लगातार घट रहा है.
ताइवान विवाद: जापान-चीन तनाव की जड़
चीन और जापान के रिश्तों में तनाव की असली वजह ताइवान है. जापान की नई प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने संसद में यह स्पष्ट किया था कि अगर चीन ताइवान पर हमला करता है, तो यह जापान की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा होगा. ऐसे में जापान अपनी सेना को तैनात करने का अधिकार सुरक्षित रखेगा. चीन को यह बयान बेहद आपत्तिजनक लगा और बीजिंग ने इसे जापान की पुरानी युद्ध मानसिकता के रूप में देखा. इसके परिणामस्वरूप चीन ने कई सांस्कृतिक और आर्थिक कार्यक्रमों को रोक दिया, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में और भी तल्खी आई.
जापान का बढ़ता रक्षा प्रभाव
चीन के रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि जापान अब अमेरिका के हथियारों का निर्माण करके और उन्हें निर्यात करके अपनी डिफेंस इंडस्ट्री को मजबूत करना चाहता है. साथ ही, वह फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को हथियार देकर अपने राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. जापान के प्रधानमंत्री साने ताकाइची पहले ही यह घोषणा कर चुके हैं कि जापान अपना रक्षा बजट बढ़ाकर GDP का 2% तक करेगा, जो एक अहम कदम हो सकता है.
जापान और अमेरिका के रिश्तों का असर
जापान के इस कदम से यह साफ है कि टोक्यो अपनी रक्षा नीति में बदलाव करके अमेरिका के साथ अपने सैन्य संबंधों को और मजबूत करने का प्रयास कर रहा है. इससे सिर्फ जापान के सुरक्षा के लिहाज से ही नहीं, बल्कि वैश्विक सैन्य संतुलन पर भी असर पड़ेगा. जापान का यह कदम चीन के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है, और इसका असर पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र पर पड़ सकता है.
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