30 लाख का एक बंदर! चीन में अचानक क्यों बढ़ी बंदरों की डिमांड? वजह जानकर रह जाएंगे हैरान

अगर आप सोचते हैं कि बंदरों की कीमत सिर्फ वन्यजीव संरक्षण तक सीमित है, तो चीन की मौजूदा तस्वीर आपको हैरान कर सकती है. वहां आज एक खास प्रजाति का बंदर लाखों रुपये की 'जैविक संपत्ति' बन चुका है.

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अगर आप सोचते हैं कि बंदरों की कीमत सिर्फ वन्यजीव संरक्षण तक सीमित है, तो चीन की मौजूदा तस्वीर आपको हैरान कर सकती है. वहां आज एक खास प्रजाति का बंदर लाखों रुपये की 'जैविक संपत्ति' बन चुका है. रिसर्च के लिए इस्तेमाल होने वाले मकाक बंदरों की मांग इतनी तेज़ी से बढ़ी है कि उनकी कीमत कोविड-19 महामारी के दौरान बने रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गई है. कुछ मामलों में एक स्वस्थ और लैब ट्रायल के लिए तैयार मकाक बंदर की कीमत 2 लाख युआन, यानी करीब 24 से 30 लाख रुपये तक पहुंच गई है. इसकी वजह किसी चिड़ियाघर या पालतू जानवरों का बाजार नहीं, बल्कि चीन का तेजी से बढ़ता बायोटेक और फार्मा सेक्टर है, जो नई दवाओं की खोज में दुनिया की अगली बड़ी ताकत बनने की कोशिश कर रहा है.

आखिर इन बंदरों में ऐसा क्या खास है?

नई दवाओं को बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया बेहद लंबी और जटिल होती है. किसी भी दवा को पहले प्रयोगशाला में विकसित किया जाता है, उसके बाद जानवरों पर प्रीक्लीनिकल परीक्षण किए जाते हैं और फिर इंसानों पर क्लीनिकल ट्रायल शुरू होता है.

इसी चरण में रीसस मकाक और सिनोमोल्गस मकाक जैसी बंदरों की प्रजातियां सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाती हैं. इनका डीएनए और शरीर की जैविक प्रतिक्रियाएं इंसानों से काफी हद तक मेल खाती हैं. यही कारण है कि कैंसर, मधुमेह, मोटापा, न्यूरोलॉजिकल बीमारियों और इम्यून सिस्टम से जुड़ी नई दवाओं की सुरक्षा और प्रभावशीलता जांचने के लिए इन्हें सबसे भरोसेमंद मॉडल माना जाता है. हालांकि हर दवा के लिए बंदरों का इस्तेमाल जरूरी नहीं होता. कई दवाओं का परीक्षण चूहों और अन्य पशु मॉडल पर भी किया जाता है, लेकिन जटिल बायोलॉजिकल और एंटीबॉडी आधारित दवाओं के विकास में अभी भी प्राइमेट्स की भूमिका बेहद अहम बनी हुई है.

बायोटेक सेक्टर में चीन की तेज़ रफ्तार ने बढ़ाई मांग

पिछले कुछ वर्षों में चीन ने बायोटेक्नोलॉजी और फार्मास्युटिकल रिसर्च पर बड़े पैमाने पर निवेश किया है. इसका असर अब साफ दिखाई देने लगा है. साल 2025 में चीन में 5,215 क्लीनिकल ड्रग ट्रायल दर्ज किए गए, जिनमें करीब 57.5 प्रतिशत नई दवाओं से जुड़े थे. यह संख्या 2020 की तुलना में लगभग दोगुनी मानी जा रही है. इससे स्पष्ट है कि चीन अब केवल दवाओं का उत्पादन नहीं कर रहा, बल्कि नई दवाओं के विकास में भी वैश्विक स्तर पर तेजी से आगे बढ़ रहा है. कैंसर, मोटापा, ऑटोइम्यून बीमारियों और आधुनिक बायोलॉजिकल दवाओं के क्षेत्र में चीन की कंपनियां लगातार अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां कर रही हैं. यही वजह है कि रिसर्च के लिए जरूरी लैब बंदरों की मांग भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है.

मांग बढ़ी, लेकिन सप्लाई उतनी तेज़ नहीं 

बंदरों की कीमतों में तेजी आने की सबसे बड़ी वजह उनकी सीमित उपलब्धता है. एक लैब में इस्तेमाल योग्य मकाक बंदर तैयार करने में लगभग चार साल का समय लगता है. इस दौरान उसका जन्म, पालन-पोषण, स्वास्थ्य परीक्षण, संक्रमण मुक्त प्रमाणन और वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप प्रशिक्षण जैसी लंबी प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है. ऐसे में अचानक बढ़ी मांग के मुकाबले सप्लाई बढ़ाना आसान नहीं होता. कोविड महामारी के दौरान चीन ने लैब बंदरों के निर्यात पर कई प्रतिबंध लगाए थे. इससे घरेलू बाजार में भी उपलब्धता प्रभावित हुई. अब जब बायोटेक उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है तो मांग, उपलब्ध बंदरों की संख्या से कहीं ज्यादा हो गई है.

अब लैब बंदर बन चुके हैं करोड़ों के उद्योग की अहम कड़ी

उद्योग से जुड़े अनुमानों के अनुसार चीन में 2025 से 2027 के बीच हर वर्ष करीब 49 हजार से 52 हजार लैब बंदर उपलब्ध रहेंगे. लेकिन मौजूदा रिसर्च गतिविधियों को देखते हुए यह संख्या भी पर्याप्त नहीं मानी जा रही. कई रिसर्च संस्थानों और फार्मा कंपनियों को महीनों तक इंतजार करना पड़ रहा है ताकि उन्हें परीक्षण के लिए उपयुक्त प्राइमेट्स मिल सकें. यही वजह है कि आज एक लैब बंदर सिर्फ वैज्ञानिक शोध का हिस्सा नहीं, बल्कि अरबों डॉलर के बायोटेक उद्योग की बेहद मूल्यवान जैविक संपत्ति बन चुका है.

क्या भविष्य में खत्म हो जाएगी इनकी जरूरत?

दुनियाभर में वैज्ञानिक पशु परीक्षण कम करने की दिशा में लगातार काम कर रहे हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ऑर्गन-ऑन-चिप तकनीक, थ्री-डी सेल कल्चर और कंप्यूटर आधारित मॉडलिंग जैसी नई तकनीकों पर तेजी से शोध हो रहा है. इन तकनीकों का उद्देश्य दवा परीक्षण में जानवरों पर निर्भरता कम करना है. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल जटिल बायोलॉजिकल, इम्यूनोलॉजी और एंटीबॉडी आधारित दवाओं के लिए प्राइमेट्स का पूरी तरह प्रभावी विकल्प उपलब्ध नहीं है. इसलिए आने वाले वर्षों में भी लैब बंदरों की मांग बनी रहने की संभावना है.

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