Naxali Papa Rao Surrender: छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई में एक बड़ी सफलता सामने आई है. लंबे समय से सक्रिय और खतरनाक माने जाने वाले नक्सली नेता पापा राव ने अपने 17 साथियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया है. उन्होंने कहा है कि अब वह हिंसा का रास्ता छोड़कर संविधान के दायरे में रहकर लोकतांत्रिक तरीके से काम करना चाहते हैं. इस कदम को राज्य में नक्सल समस्या के अंत की दिशा में एक अहम मोड़ माना जा रहा है.
सरकार ने नक्सल आंदोलन को खत्म करने के लिए 31 मार्च 2026 तक का लक्ष्य रखा है. लेकिन जिस तरह से बड़े नक्सली अब आत्मसमर्पण कर रहे हैं, उससे उम्मीद बढ़ गई है कि यह लक्ष्य तय समय से पहले ही हासिल हो सकता है. खासतौर पर नेशनल पार्क इलाके में सक्रिय पापा राव की टीम को नक्सलियों की मजबूत टुकड़ी माना जाता था. उनके मुख्यधारा में लौटने से नक्सल नेटवर्क को बड़ा झटका लगा है और सुरक्षा एजेंसियों का काम काफी आसान हो सकता है.
नक्सल नेटवर्क को बड़ा झटका
पापा राव के आत्मसमर्पण को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि वह लंबे समय से संगठन में सक्रिय थे और कई बड़े ऑपरेशन से जुड़े रहे थे. उनके साथियों का भी सरेंडर करना यह दिखाता है कि अब नक्सलियों का मनोबल कमजोर हो रहा है और वे धीरे-धीरे हिंसा का रास्ता छोड़ रहे हैं.
सरकार और सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई, साथ ही पुनर्वास नीति का असर भी अब साफ नजर आने लगा है. नक्सलियों को मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रोत्साहन दिया जा रहा है, जिससे कई लोग हथियार छोड़ रहे हैं.
अब कौन-कौन बचे बड़े नेता
पापा राव के सरेंडर के बाद अब छत्तीसगढ़ में कुछ ही बड़े नक्सल नेता सक्रिय बताए जा रहे हैं. इनमें हेमला बिच्चा, सोढ़ी केशा और महिला नक्सल लीडर रूपी के नाम शामिल हैं. हेमला बिच्चा और सोढ़ी केशा बीजापुर और तेलंगाना की सीमा से लगे जंगलों में सक्रिय हैं, जबकि रूपी कांकेर और आसपास के इलाकों में अपनी टीम के साथ मौजूद है. सुरक्षा एजेंसियां अब इन पर फोकस कर रही हैं.
आगे क्या होगा
पापा राव और उनके साथियों के सरेंडर से यह साफ हो गया है कि नक्सल समस्या अब अपने आखिरी चरण में पहुंच रही है. अगर इसी तरह बड़े नेता मुख्यधारा में लौटते रहे, तो जल्द ही राज्य पूरी तरह नक्सल मुक्त हो सकता है.
सरकार की रणनीति साफ है, एक तरफ सख्त कार्रवाई और दूसरी तरफ पुनर्वास की सुविधा. इसी संतुलन की वजह से अब जमीन पर बदलाव दिखने लगा है. कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर है और आने वाले समय में इसके पूरी तरह खत्म होने की उम्मीद काफी मजबूत हो गई है.
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