Bakrid 2026: आज देशभर में धूमधाम से मनाया जा रहा बकरीद का त्योहार, जानें क्यों दी जाती है कुर्बानी?

आज पूरे देश में ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का त्योहार बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है. इस्लाम धर्म के सबसे अहम त्योहारों में शामिल बकरीद हर साल इस्लामिक कैलेंडर के जुल-हिज्जा महीने की 10वीं तारीख को मनाई जाती है.

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प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

Eid al-Adha 2026: आज पूरे देश में ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का त्योहार बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है. इस्लाम धर्म के सबसे अहम त्योहारों में शामिल बकरीद हर साल इस्लामिक कैलेंडर के जुल-हिज्जा महीने की 10वीं तारीख को मनाई जाती है. इस खास मौके पर मुस्लिम समुदाय के लोग मस्जिदों और ईदगाहों में नमाज अदा करते हैं, एक-दूसरे को मुबारकबाद देते हैं और जरूरतमंदों की मदद करते हैं.

बकरीद को त्याग, समर्पण और इंसानियत का त्योहार माना जाता है. इस दिन कुर्बानी देने की परंपरा निभाई जाती है, जिसे इस्लाम में बेहद खास माना गया है. मुसलमान बकरे, बकरी, भेड़, दुम्बा, भैंस, बैल या ऊंट की कुर्बानी देते हैं. माना जाता है कि कुर्बानी का उद्देश्य केवल जानवर की बलि देना नहीं, बल्कि अल्लाह के प्रति अपनी आस्था और समर्पण को दिखाना है.

हजरत इब्राहिम की सुन्नत से जुड़ी है परंपरा

इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, बकरीद की कुर्बानी का संबंध हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि अल्लाह ने हजरत इब्राहिम को लगातार तीन दिनों तक सपने में अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने का आदेश दिया था. हजरत इब्राहिम समझ गए कि अल्लाह उनसे उनके सबसे प्रिय बेटे हजरत इस्माइल की कुर्बानी मांग रहे हैं.

जब उन्होंने अपने बेटे हजरत इस्माइल को इस बारे में बताया, तो उन्होंने भी अल्लाह के हुक्म को खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया और कुर्बानी के लिए तैयार हो गए. यह हजरत इब्राहिम के लिए बहुत बड़ा इम्तिहान था, लेकिन उन्होंने अल्लाह पर पूरा भरोसा रखा.

अल्लाह ने बेटे की जगह भेजा दुम्बा

इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक, जब हजरत इब्राहिम अपने बेटे की कुर्बानी देने लगे, तभी अल्लाह ने हजरत इस्माइल की जगह एक दुम्बा भेज दिया. इस तरह हजरत इस्माइल सुरक्षित रहे और दुम्बे की कुर्बानी दी गई. तभी से ईद-उल-अजहा पर कुर्बानी देने की परंपरा शुरू हुई, जिसे आज भी दुनिया भर के मुसलमान निभाते हैं.

कहा जाता है कि उस समय हजरत इस्माइल की उम्र करीब 13 से 14 साल थी. यह घटना त्याग, विश्वास और अल्लाह के प्रति अटूट आस्था का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है.

तीन दिनों तक क्यों दी जाती है कुर्बानी?

ईद-उल-अजहा का त्योहार केवल एक दिन का नहीं माना जाता, बल्कि इसका जश्न तीन दिनों तक चलता है. इसी वजह से कुर्बानी भी बकरीद के दिन समेत लगातार तीन दिनों तक दी जाती है. इस्लाम में माना जाता है कि इससे सभी मुसलमान और हाजी बिना किसी जल्दबाजी के अपनी इबादत पूरी कर पाते हैं.

कुर्बानी के इन दिनों में लोग नमाज अदा करने के साथ-साथ गरीबों और जरूरतमंदों की मदद भी करते हैं. इस त्योहार का संदेश इंसानियत, बराबरी और आपसी भाईचारे को बढ़ावा देना है.

कुर्बानी के गोश्त को बांटने का नियम

इस्लाम में कुर्बानी के गोश्त को तीन बराबर हिस्सों में बांटने की परंपरा है. एक हिस्सा कुर्बानी देने वाला अपने परिवार के लिए रखता है. दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों में बांटा जाता है, जबकि तीसरा हिस्सा गरीब और जरूरतमंद लोगों को दिया जाता है.

इस परंपरा का मकसद समाज में समानता और जरूरतमंदों की मदद को बढ़ावा देना है, ताकि त्योहार की खुशी हर व्यक्ति तक पहुंच सके.

जानवरों की उम्र को लेकर भी हैं नियम

बकरीद पर कुर्बानी देने के लिए जानवरों की उम्र को लेकर भी कुछ नियम बताए गए हैं. इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, बकरे या बकरी की उम्र कम से कम एक साल होनी चाहिए. भेड़ या दुम्बा कम से कम छह महीने का होना जरूरी माना जाता है. वहीं भैंस या बैल की उम्र दो साल और ऊंट की उम्र कम से कम पांच साल होनी चाहिए.

बकरीद का त्योहार लोगों को त्याग, इंसानियत और दूसरों की मदद करने का संदेश देता है. यही वजह है कि यह पर्व मुस्लिम समुदाय के लिए बेहद खास और आस्था से जुड़ा हुआ माना जाता है.

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