Pakistan Turkiye Conflict: मुस्लिम देशों के एक बड़े सैन्य गठबंधन की परिकल्पना कर रहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को बड़ा झटका लगा है. सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए हालिया रक्षा समझौते को लेकर यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि तुर्किए भी इस पहल का हिस्सा बन सकता है. हालांकि अब सऊदी अरब की ओर से इन अटकलों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया गया है.
सऊदी सेना से जुड़े एक वरिष्ठ सूत्र ने शनिवार को समाचार एजेंसी AFP को बताया कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ रक्षा समझौता पूरी तरह द्विपक्षीय है और इसमें तुर्किए को शामिल करने की कोई योजना नहीं है.
‘इस्लामिक नाटो’ की सोच को झटका
पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व को उम्मीद थी कि सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते के बाद तुर्किए भी इस पहल से जुड़ेगा. इससे मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया में मुस्लिम देशों का एक ऐसा संगठन बन सकता था, जिसकी कार्यप्रणाली नाटो जैसी होती, यानी किसी एक सदस्य देश पर हमला सभी पर हमला माना जाता.
इसी महीने तुर्किए के एक अधिकारी की ओर से यह बयान आया था कि इस तरह के गठबंधन को लेकर बातचीत शुरू हुई है. इसके बाद यह चर्चा तेज हो गई थी कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए मिलकर एक शक्तिशाली सैन्य ढांचा तैयार कर सकते हैं. लेकिन सऊदी सूत्रों ने अब इन सभी कयासों पर विराम लगा दिया है.
सऊदी अधिकारी का स्पष्ट संदेश
AFP से बातचीत में सऊदी अरब के एक अधिकारी ने कहा, “यह पाकिस्तान के साथ हमारा एक द्विपक्षीय रक्षा समझौता है और यह उसी रूप में बना रहेगा.” एक अन्य खाड़ी अधिकारी ने भी इसी बात को दोहराते हुए कहा कि, “पाकिस्तान के साथ हमारे रक्षात्मक संबंध अलग हैं. तुर्किए के साथ हमारे अपने समझौते हैं, लेकिन पाकिस्तान के साथ किया गया समझौता किसी तीसरे देश के लिए नहीं है.” इन बयानों से साफ हो गया है कि सऊदी अरब किसी बहुपक्षीय सैन्य गठबंधन के बजाय अलग-अलग देशों के साथ स्वतंत्र रक्षा संबंध बनाए रखना चाहता है.
कतर हमलों के बाद बनी थी पृष्ठभूमि
इस रक्षा समझौते की पृष्ठभूमि मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव से जुड़ी है. पिछले साल गर्मियों में जब इजरायल की ओर से दागी गई कुछ मिसाइलें कतर तक पहुंच गई थीं, उसके बाद क्षेत्रीय हालात काफी तनावपूर्ण हो गए थे. इसके बाद ईरान ने कतर में मौजूद एक अमेरिकी एयरबेस पर भी हमला किया था.
इन्हीं घटनाओं के बाद सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग को औपचारिक रूप दिया गया. बढ़ते क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच इस समझौते को सुरक्षा संतुलन के तौर पर देखा गया, जिससे पाकिस्तान को रणनीतिक समर्थन मिलने की उम्मीद थी.
सऊदी-पाक डील पर उठते सवाल
पाकिस्तान द्वारा सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता करने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सवाल उठे थे. खासतौर पर इसलिए क्योंकि पाकिस्तान एक परमाणु संपन्न देश है. इससे पहले भारत के साथ हुए संघर्ष में पाकिस्तान को भारी सैन्य नुकसान उठाना पड़ा था.
रिपोर्ट्स के मुताबिक उस संघर्ष के दौरान पाकिस्तान के कई एयरबेस क्षतिग्रस्त हुए थे और JF-17 थंडर व F-16 जैसे लड़ाकू विमानों को भी नुकसान पहुंचा था. इसके बाद पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया. पाकिस्तान को यह उम्मीद थी कि भविष्य में भारत के साथ किसी भी तनाव की स्थिति में उसे रियाद का रणनीतिक समर्थन मिलेगा.
भारत-सऊदी रिश्ते बने बड़ी बाधा
हालांकि रक्षा मामलों के जानकार मानते हैं कि सऊदी अरब किसी भी संभावित भारत-पाक संघर्ष में खुलकर पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा होने से बचेगा. इसकी एक बड़ी वजह सऊदी अरब और भारत के बीच मजबूत कूटनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं.
विश्लेषकों के अनुसार, सऊदी अरब अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखना चाहता है और किसी एक क्षेत्रीय संघर्ष में खुली भागीदारी से बचता रहा है. यही कारण है कि सऊदी-पाक रक्षा समझौते को सीमित और व्यावहारिक सहयोग के रूप में देखा जा रहा है, न कि किसी व्यापक सैन्य गठबंधन के रूप में.
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