PM Modi Visit Ethiopia: दुनिया की राजनीति अब बदल रही है. महाद्वीपों की सीमाएँ सिकुड़ चुकी हैं और नए मौके अफ्रीका की धरती पर जन्म ले रहे हैं. यही वजह है कि दुनिया की महाशक्तियां, अमेरिका, चीन, रूस और यूरोपीय देश अफ्रीका में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हुए हैं. ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अगला इथोपिया दौरा भारत की विदेश नीति को बिल्कुल नए मोड़ पर ले जाता हुआ दिखाई देता है. यह सिर्फ एक दौरा नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों और भू-राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए भारत की रणनीतिक तैयारी भी माना जा रहा है.
मोदी ऐसे समय इथोपिया जा रहे हैं जब पिछले एक दशक में कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री वहां नहीं पहुंचा. इसके महत्व को बढ़ाने वाली बात यह है कि इथोपिया में इस समय 650 से ज्यादा भारतीय कंपनियां काम कर रही हैं और उन्होंने करीब 5 बिलियन डॉलर का भारी निवेश कर रखा है. यह बताता है कि भारत के लिए इथोपिया सिर्फ एक अफ्रीकी देश नहीं, बल्कि अफ्रीका का वह दरवाज़ा है जिससे पूरा महाद्वीप जोड़ा जा सकता है.
इथोपिया: अफ्रीका का दिल कहां धड़कता है?
इथोपिया को अक्सर अफ्रीका का दिल कहा जाता है, और यह बात सिर्फ भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी सही है. यह देश अफ्रीका के उस हिस्से में स्थित है जिसे ‘हॉर्न ऑफ अफ्रीका’ कहा जाता है. इसके पूर्व में जिबूती, पश्चिम में सूडान, उत्तर में इरित्रिया और दक्षिण में केन्या है. यह पूरा इलाका दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों के बेहद निकट पड़ता है, जिसकी वजह से इसकी रणनीतिक अहमियत कई गुना बढ़ जाती है.
इसका राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है. राजधानी अदीस अबाबा अफ्रीकी संघ का मुख्यालय है, यानी पूरे अफ्रीकी महाद्वीप की राजनीति का केंद्र यही शहर है. यही वह जगह है जहां से अफ्रीका की आवाज दुनिया तक पहुंचती है.
इथोपिया: जहां चलता है 13 महीनों का कैलेंडर
इथोपिया दुनिया के उन कुछ देशों में शामिल है जो अपना अलग कैलेंडर चलाते हैं. यहाँ 13 महीने होते हैं, 12 महीनों में 30 दिन और एक अतिरिक्त महीना जिसमें 5 से 6 दिन होते हैं. यही वजह है कि इथोपियाई कैलेंडर दुनिया से लगभग सात वर्ष पीछे चलता है और उनका नया साल 11 या 12 सितंबर से शुरू होता है.
इतिहास में भी इथोपिया की पहचान अनोखी रही है. यह दुनिया के उन बेहद कम देशों में शामिल है जिन्होंने यूरोपीय उपनिवेशवाद की जंजीरों को लगभग छुआ ही नहीं. और दिलचस्प बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र का चार्टर सबसे पहले जिस देश ने साइन किया था, वह इथोपिया ही था.
चीन और सऊदी से करीबी रिश्ते, और भारत की नई रणनीति
मौजूदा समय में इथोपिया को आर्थिक रूप से चीन का पुराना और मजबूत साथी माना जाता है. इथोपिया सबसे ज्यादा आयात चीन से करता है और अपना अधिकतर सामान सऊदी अरब को निर्यात करता है. ऐसे में भारत का प्रभाव बढ़ाना आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं.
भारत जिस तरीके से शिक्षा, टेक्नोलॉजी, खेती, फार्मा और आईटी में इथोपिया की मदद कर रहा है, वह चीन की आक्रामक निवेश शैली से बहुत अलग है. पीएम मोदी का दौरा इसी रणनीति का अगला कदम माना जा रहा है, जहाँ भारत आर्थिक साझेदारी से आगे बढ़कर भरोसे और परंपरा के रिश्तों को फिर से मजबूत करना चाहता है.
भारत-इथोपिया संबंध: परंपरा में बसा दो हजार वर्षों का रिश्ता
अक्सर कहा जाता है कि भारत और इथोपिया के संबंध सिर्फ पुराने नहीं, बल्कि हजारों साल पुराने हैं. व्यापारिक दस्तावेज बताते हैं कि दोनों देशों का संपर्क पहली शताब्दी ईस्वी में अक्सुमी साम्राज्य के समय से रहा है. यहां तक कि साल 1941 में जब इटली ने इथोपिया पर कब्जा किया था, तब उसे मुक्त करवाने में भारतीय सैनिकों ने अहम भूमिका निभाई थी.
भारत ने 1948 में अदीस अबाबा में अपना पहला दूतावास खोला और 1950 में दोनों देशों के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित हुए. तब से लेकर आज तक तकनीकी सहयोग, हवाई सेवाओं, कृषि, माइक्रो-डैम और वैज्ञानिक योजनाओं में भारत इथोपिया का महत्वपूर्ण साझेदार बना हुआ है.
पीएम मोदी का दौरा: अफ्रीका में भारत की सबसे मजबूत चाल
प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा कई मायनों में ऐतिहासिक है. दुनिया में चीन जिस तरह से अफ्रीका में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है, उसके बीच भारत का संतुलित और विश्वास आधारित दृष्टिकोण अफ्रीका के देशों को काफी आकर्षित कर रहा है. इथोपिया इसीलिए भारत की नई रणनीति का केंद्र बन गया है.
यह दौरा कई स्तरों पर प्रभाव डाल सकता है, चाहे वह व्यापारिक संबंध हों, रणनीतिक साझेदारी हो या फिर अफ्रीकी महाद्वीप में भारत की सॉफ्ट पावर बढ़ाने का मुद्दा. इथोपिया जैसे प्रभावशाली देश में भारत की सक्रिय भूमिका पूरे अफ्रीका में भारत की छवि को मजबूत करेगी.
यह भी पढे़ं- 'धुरंधर' को प्रोपेगेंडा बताने वालों को आर माधवन का तगड़ा जवाब, बॉक्स ऑफिस कलेक्शन देखने की दी सलाह