India-EU FTA: भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए बड़े व्यापार समझौते ने आर्थिक रिश्तों को एक नई दिशा दे दी है. दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई है कि समझौता लागू होने की तारीख से अगले पांच वर्षों तक एक-दूसरे को ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ (MFN) का दर्जा दिया जाएगा. यह फैसला हाल ही में सामने आए मसौदे में स्पष्ट किया गया है. इससे पहले 27 जनवरी को दोनों ने मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की बातचीत पूरी होने का ऐलान किया था. इस समझौते को इसकी व्यापकता के कारण ‘मदर ऑफ ऑल डील’ भी कहा जा रहा है.
93% भारतीय निर्यात को मिलेगा ड्यूटी-फ्री फायदा
इस समझौते का सबसे बड़ा असर भारत के निर्यात पर देखने को मिलेगा. तय शर्तों के मुताबिक, भारत के करीब 93 फीसदी उत्पादों को यूरोपीय संघ के 27 देशों में बिना किसी आयात शुल्क के प्रवेश मिलेगा. इससे भारतीय कंपनियों के लिए यूरोप का बाजार पहले से कहीं ज्यादा आसान हो जाएगा. दूसरी ओर, यूरोप से आने वाली लग्जरी कारें और वाइन भारत में सस्ती हो सकती हैं, जिससे उपभोक्ताओं को भी फायदा मिलेगा.
क्या होता है ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ दर्जा?
‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का मतलब यह नहीं होता कि किसी एक देश को खास फायदा दिया जा रहा है, बल्कि इसका उद्देश्य बराबरी सुनिश्चित करना होता है. इसका सीधा अर्थ है कि भारत और यूरोपीय संघ अगले पांच साल तक किसी तीसरे देश को ऐसी व्यापारिक छूट या रियायत नहीं देंगे, जो उन्होंने एक-दूसरे को नहीं दी हो. यानी अगर किसी अन्य देश को बेहतर शर्तें मिलती हैं, तो वही लाभ इस साझेदारी में भी लागू होगा. इससे दोनों पक्षों के बीच संतुलन बना रहेगा और कोई भी पक्ष नुकसान में नहीं रहेगा.
विवादों का तेज समाधान, व्यापार में स्थिरता
इस समझौते में विवादों को जल्दी सुलझाने के लिए भी खास प्रावधान किया गया है. इसके तहत एक मध्यस्थ नियुक्त किया जाएगा, जो आपसी सहमति से तय होगा और किसी भी व्यापारिक विवाद का त्वरित समाधान करेगा. इसके अलावा, दोनों पक्षों ने यह भी वादा किया है कि वे विश्व व्यापार संगठन के नियमों के दायरे से बाहर जाकर नए आयात या निर्यात प्रतिबंध नहीं लगाएंगे. इससे व्यापारिक माहौल स्थिर बना रहेगा.
डेटा साझा करने से बढ़ेगी पारदर्शिता
समझौते के लागू होने के एक साल बाद दोनों पक्ष अपने-अपने वार्षिक आयात आंकड़े साझा करना शुरू करेंगे. इसका उद्देश्य यह देखना होगा कि समझौते के तहत मिलने वाले लाभ सही तरीके से लागू हो रहे हैं या नहीं. अगर किसी कंपनी या देश को कस्टम फैसलों पर आपत्ति होती है, तो उसके लिए एक पारदर्शी अपील प्रक्रिया भी उपलब्ध कराई जाएगी.
डिजिटल व्यापार और नए सेक्टर में सहयोग
यह समझौता केवल पारंपरिक व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया है. दोनों पक्षों ने डेटा सुरक्षा और निजता को अहम मानते हुए डिजिटल व्यापार को मजबूत करने की बात कही है. हालांकि, व्यक्तिगत डेटा सुरक्षा और सीमा पार डेटा प्रवाह को लेकर दोनों अपनी-अपनी नीतियों पर नियंत्रण बनाए रखेंगे.
यूरोपीय कंपनियों को भी होगा बड़ा फायदा
इस समझौते से यूरोप की कंपनियों को भी बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है. खासतौर पर कार निर्माता और शराब उत्पादक भारतीय बाजार में कम शुल्क का फायदा उठा सकेंगे. अनुमान है कि साल 2032 तक भारत को होने वाला यूरोपीय निर्यात दोगुना हो सकता है. साथ ही यूरोपीय कंपनियों को हर साल करीब 4 बिलियन यूरो की बचत भी हो सकती है.
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