यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को लेकर पाकिस्तान का नाम चर्चा में है. हालांकि, पाकिस्तानी सरकार ने द न्यूयॉर्क टाइम्स की उस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है, जिसमें दावा किया गया था कि पाकिस्तान की सेना ने हूतियों के विरुद्ध सीधे सैन्य अभियान में हिस्सा लिया. यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब लाल सागर में जहाजों और सऊदी अरब के ऊर्जा ठिकानों पर हूती हमलों को लेकर क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताएं बढ़ रही हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सऊदी अरब के साथ रक्षा संबंधों के बावजूद पाकिस्तान इस संघर्ष में अपनी भूमिका को लेकर इतना सतर्क क्यों है.
यमन संघर्ष ने क्यों बढ़ाई क्षेत्रीय चिंता?
यमन का संघर्ष केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि सऊदी अरब और ईरान के बीच क्षेत्रीय प्रभाव की प्रतिस्पर्धा से भी जुड़ा रहा है. जैदी शिया समुदाय से जुड़े हूती आंदोलन ने 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था. इसके बाद मार्च 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन के गृह युद्ध में हस्तक्षेप किया. इस संघर्ष ने देश में गंभीर मानवीय संकट पैदा किया. लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य में जहाजों को निशाना बनाए जाने तथा ऊर्जा ठिकानों पर हमलों की खबरों ने समुद्री व्यापार और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं.
सऊदी अरब में पाकिस्तान की सैन्य मौजूदगी कितनी बड़ी?
पाकिस्तान भले ही हूतियों के खिलाफ सीधे सैन्य अभियान में शामिल होने से इनकार कर रहा हो, लेकिन सऊदी अरब के साथ उसके रक्षा संबंध काफी पुराने और व्यापक हैं. पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्टों में सऊदी अरब में करीब 8,000 पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती का दावा किया गया है. दोनों देशों के बीच सैन्य प्रशिक्षण, रक्षा सहयोग और सुरक्षा से जुड़े कई स्तरों पर साझेदारी है. हालांकि, सैनिकों की मौजूदा संख्या और विभिन्न हथियार प्रणालियों की तैनाती से जुड़े दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है.
फाइटर जेट से एयर डिफेंस तक, रक्षा सहयोग पर नजर
पाकिस्तान और सऊदी अरब के सैन्य सहयोग को लेकर लड़ाकू विमानों, ड्रोन और वायु रक्षा प्रणालियों की तैनाती के दावे भी सामने आए हैं. इनमें चीन और पाकिस्तान के संयुक्त सहयोग से विकसित JF-17 थंडर लड़ाकू विमान तथा चीन निर्मित HQ-9 एयर डिफेंस सिस्टम का उल्लेख किया जाता है. हालांकि, इन प्रणालियों की सऊदी अरब में मौजूदा तैनाती और उन्हें पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा संचालित किए जाने संबंधी सभी विवरणों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित करना जरूरी है. ऐसे सहयोग के बीच भी पाकिस्तान की सैन्य मौजूदगी को हूतियों के खिलाफ सीधे युद्ध में भागीदारी का प्रमाण नहीं माना जा सकता.
मक्का समझौते से कितनी मजबूत होगी सुरक्षा साझेदारी?
सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान के रक्षा संबंधों को मजबूत करने की कोशिशें क्षेत्रीय तनाव के बीच और महत्वपूर्ण हो गई हैं. पाकिस्तान और सऊदी अरब ने 2025 में रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौता किया था. इसके अलावा, सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच रक्षा सहयोग को लेकर भी बातचीत होती रही है. पाकिस्तानी रक्षा नेतृत्व की रियाद यात्रा और सैन्य अधिकारियों के बीच उच्चस्तरीय बैठकों को इसी व्यापक सुरक्षा साझेदारी के संदर्भ में देखा जा रहा है. हालांकि, किसी समझौते का होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संबंधित देश किसी खास सैन्य अभियान में सक्रिय रूप से हिस्सा ले रहे हैं.
आतंकवाद विरोधी और समुद्री सुरक्षा गठबंधनों में पाकिस्तान की भूमिका
सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सुरक्षा ढांचों में भी पाकिस्तान की अहम भूमिका रही है. इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन में पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. वहीं, समुद्री सुरक्षा से जुड़े बहुराष्ट्रीय प्रयासों का उद्देश्य लाल सागर और आसपास के जलमार्गों में नौवहन की सुरक्षा सुनिश्चित करना है. हालांकि, इन गठबंधनों की सदस्यता या नेतृत्व में भागीदारी को हूती विद्रोहियों के खिलाफ मौजूदा संघर्ष में प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई के बराबर नहीं माना जा सकता.
हूतियों के खिलाफ जंग से दूरी बनाए रखेगा पाकिस्तान?
पाकिस्तान के सामने क्षेत्रीय रक्षा प्रतिबद्धताओं और अपनी सुरक्षा चुनौतियों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है. सऊदी अरब के साथ मजबूत सैन्य रिश्तों के बावजूद किसी नए संघर्ष में सीधे उतरने से पाकिस्तान को कूटनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है. यही वजह है कि उसकी वास्तविक भूमिका को समझने के लिए आधिकारिक बयानों, रक्षा समझौतों और स्वतंत्र रूप से सत्यापित सैन्य गतिविधियों के बीच अंतर करना जरूरी है. फिलहाल, पाकिस्तानी सरकार ने हूतियों के खिलाफ प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई की रिपोर्ट को खारिज किया है, लेकिन क्षेत्र में बदलते हालात पर दोनों देशों की रणनीति पर नजर बनी रहेगी.
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