BRICS, एग्रीकल्चर, डेयरी... भारत-अमेरिका में 6 महीने बाद भी क्यों नहीं हुई ट्रेड डील? जानें सबकुछ

भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित ट्रेड डील को लेकर पिछले छह महीनों से बातचीत जारी है, लेकिन अभी तक किसी ठोस समझौते पर पहुंचना संभव नहीं हो पाया है.

Why India-US trade deal has not happened even after 6 months
प्रतिकात्मक तस्वीर/ ANI

नई दिल्ली/वॉशिंगटन: भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित ट्रेड डील को लेकर पिछले छह महीनों से बातचीत जारी है, लेकिन अभी तक किसी ठोस समझौते पर पहुंचना संभव नहीं हो पाया है. फरवरी 2025 में इस वार्ता की शुरुआत हुई थी, परंतु तमाम प्रयासों के बावजूद दोनों पक्षों के बीच कई अहम बिंदुओं पर मतभेद बने हुए हैं.

इन मतभेदों की जड़ में न केवल कृषि और डेयरी सेक्टर से जुड़ी जटिलताएं हैं, बल्कि अमेरिका की टैरिफ नीति, भारत की घरेलू राजनीति, आत्मनिर्भरता की रणनीति और वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों का भी गहरा प्रभाव है. इस पूरे मसले में एक और परत जुड़ गई है- BRICS समूह को लेकर अमेरिका की असहमति.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में घोषणा की कि 1 अगस्त 2025 से भारत पर 25% टैरिफ लगाया जाएगा, साथ ही रूस से हथियार और तेल खरीदने पर भारत को दंड भुगतना पड़ सकता है. इस निर्णय ने पहले से धीमी चल रही बातचीत को और उलझा दिया है.

आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर किन कारणों से भारत-अमेरिका ट्रेड डील की दिशा में प्रगति नहीं हो पा रही है:

1. एग्रीकल्चर और डेयरी सेक्टर में मतभेद

कृषि और डेयरी उत्पादों को लेकर अमेरिका चाहता है कि भारतीय बाजार में उसकी कंपनियों को खुला प्रवेश मिले. अमेरिका के डेयरी ब्रांड्स का दावा है कि उनके उत्पाद अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों पर खरे उतरते हैं, और भारत में मौजूद उत्पादों की तुलना में किफायती भी हैं.

परंतु भारत के लिए यह केवल एक आर्थिक मामला नहीं है – इसमें किसानों की आजीविका, धार्मिक भावनाएं, और स्वदेशी उत्पादन की रक्षा जैसे मुद्दे जुड़े हैं. भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है, और इसके डेयरी सेक्टर में करोड़ों छोटे और सीमांत किसान लगे हुए हैं. यदि अमेरिकी डेयरी उत्पाद कम कीमत पर बाजार में आ जाते हैं, तो यह स्थानीय उत्पादकों के लिए विनाशकारी हो सकता है.

इसके अलावा, धार्मिक आस्थाएं भी एक निर्णायक भूमिका निभाती हैं. भारत के उपभोक्ता शुद्ध शाकाहारी दूध और उससे बने उत्पादों की मांग करते हैं. जबकि अमेरिका में कई डेयरी उत्पादों में जानवरों की हड्डियों से बने एंजाइम (जैसे रैनेट) का प्रयोग होता है. भारत की स्पष्ट मांग है कि किसी भी उत्पाद को तभी प्रवेश दिया जाएगा, जब वह प्रमाणित रूप से शाकाहारी हो.

इसी तरह, अमेरिका गेहूं, सोयाबीन, मक्का, फल (जैसे सेब और अंगूर) को भारत में बिना टैरिफ के बेचने की मांग कर रहा है. लेकिन भारत अपनी खाद्य सुरक्षा और किसानों की रक्षा के लिए इन उत्पादों पर उच्च आयात शुल्क (टैरिफ) लगाए हुए है.

इसके अलावा, अमेरिका द्वारा GMO फसलों (Genetically Modified Organisms) को भारत में लाने की कोशिश भी विवाद का कारण बनी हुई है. भारत में किसान संगठन और वैज्ञानिक समुदाय इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं.

2. अमेरिका की आक्रामक टैरिफ नीति और ट्रम्प का दबाव

डोनाल्ड ट्रम्प की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के तहत अमेरिका ने अप्रैल 2025 में भारत सहित कई देशों पर 26% टैरिफ लगाने की घोषणा की थी, जिसे फिलहाल जुलाई तक स्थगित किया गया था. लेकिन अब ट्रम्प प्रशासन ने 1 अगस्त से भारत पर 25% टैरिफ लागू करने की पुष्टि कर दी है.

भारत ने अमेरिका की इस नीति का विरोध किया है, और अमेरिका से यह आग्रह किया है कि स्टील, एल्यूमिनियम और ऑटो पार्ट्स जैसे क्षेत्रों में उसे रियायत दी जाए. भारत चाहता है कि पहले से लागू 10% बेसलाइन टैरिफ में भी कटौती हो.

भारत ने अपने बजट में कई अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ में छूट दी थी ताकि बातचीत को सकारात्मक दिशा में ले जाया जा सके, लेकिन अमेरिका अभी भी कुछ प्रमुख क्षेत्रों में शून्य टैरिफ (Zero Tariff) की मांग कर रहा है.

3. अमेरिकी बाजार में उचित स्थान चाहिए

भारत का ध्यान केवल टैरिफ घटाने पर नहीं है. भारत चाहता है कि उसके कपड़ा, ज्वेलरी, चमड़ा, रसायन और प्लास्टिक उद्योगों को अमेरिकी बाजार में व्यापक पहुंच मिले. इन क्षेत्रों में भारत की उत्पादन क्षमता मजबूत है और वे देश के निर्यात में अहम योगदान देते हैं.

दूसरी ओर, अमेरिका चाहता है कि भारत अपनी नॉन-टैरिफ बाधाओं (जैसे गुणवत्ता मानकों, लाइसेंसिंग आवश्यकताओं और लेबलिंग नियमों) को हटाए. इन नियमों को अमेरिका व्यापार के लिए बाधक मानता है, जबकि भारत उन्हें उपभोक्ता संरक्षण और स्वदेशी उद्योग की रक्षा के लिए जरूरी मानता है.

इन मांगों के टकराव ने व्यापार समझौते को जटिल बना दिया है.

4. BRICS: भू-राजनीति का छिपा हुआ कार्ड

ट्रेड डील की बातचीत में भू-राजनीतिक मोड़ तब आया जब ट्रम्प ने BRICS समूह को लेकर भारत पर उंगली उठाई. उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि भारत BRICS का हिस्सा है, जो अमेरिका के डॉलर आधारित वैश्विक आर्थिक प्रभुत्व को चुनौती देने का प्रयास कर रहा है.

उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिका डॉलर पर हमला बर्दाश्त नहीं करेगा. यह बयान भारत के रणनीतिक विकल्पों पर सवाल उठाता है – क्या वह अमेरिका के साथ गहरे व्यापारिक रिश्ते बना सकता है, जबकि वह BRICS के जरिए एक मल्टीपोलर वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को समर्थन दे रहा है?

यह पहली बार नहीं है जब ट्रम्प ने BRICS पर नाराजगी जताई हो. उन्होंने पहले भी कहा था कि यदि BRICS समूह डॉलर का विकल्प खोजने की कोशिश करेगा, तो अमेरिका उसके सदस्य देशों पर 10-25% अतिरिक्त टैरिफ लगाएगा.

5. भारत की रणनीतिक सतर्कता और घरेलू दबाव

भारत इस पूरे परिदृश्य में अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दे रहा है. सरकार को न केवल अमेरिका की शर्तों से सावधान रहना पड़ रहा है, बल्कि घरेलू किसान संगठनों, ट्रेड यूनियनों और राजनीतिक विपक्ष के दबाव को भी संभालना पड़ रहा है.

कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में लापरवाही दिखाना राजनीतिक तौर पर भारी पड़ सकता है. सरकार ने संकेत दिया है कि वह किसी भी ऐसे समझौते को मंजूरी नहीं देगी, जिसमें केवल अमेरिका को फायदा मिले और भारत के दीर्घकालिक हितों को चोट पहुंचे.

ट्रेड डील पर आगे क्या?

ट्रेड डील की बातचीत अब 25 अगस्त 2025 से फिर शुरू होगी, जब अमेरिकी ट्रेड प्रतिनिधि भारत दौरे पर आएंगे. दोनों देशों के बीच इस बैठक में छठे राउंड की चर्चा होगी, और कोशिश की जाएगी कि सितंबर या अक्टूबर तक पहला चरण किसी प्रारंभिक समझौते के साथ पूरा किया जा सके.

सूत्रों के अनुसार, बातचीत इंटरिम ट्रेड एग्रीमेंट यानी एक अस्थायी और सीमित दायरे वाले समझौते की ओर बढ़ सकती है, जो बाद में एक व्यापक व्यापार संधि का आधार बन सकता है.

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