एक पिता के लिए सबसे असहनीय पीड़ा वही होती है, जब उसकी आंखों के सामने उसकी संतान की दुनिया अचानक खत्म हो जाए. जिस बेटे को कंधों पर बैठाकर सपने दिखाए, जिसे अपने अनुभवों से तराशा, वही बेटा अगर जीवन की राह बीच में ही छोड़ दे, तो उस खालीपन को कोई शब्द नहीं भर सकता. आज यही असहनीय शोक देश के मशहूर उद्योगपति अनिल अग्रवाल के जीवन में उतर आया है.
वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल के बेटे अग्निवेश अग्रवाल का बुधवार को 49 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. इस दुखद खबर की जानकारी खुद अनिल अग्रवाल ने दी. बेटे के जाने की खबर ने न सिर्फ उनके परिवार को, बल्कि पूरे देश को गहरे सदमे में डाल दिया है.
पिता के शब्दों में छलका दर्द
अनिल अग्रवाल ने सोशल मीडिया के जरिए अपने दिल का दर्द साझा किया है. उनके शब्दों में एक पिता की टूटी हुई आवाज़ साफ झलकती है. उन्होंने लिखा कि अग्निवेश एक साधारण मध्यमवर्गीय बिहारी परिवार में जन्मा था. बचपन में वह बेहद शरारती, चंचल और हमेशा मुस्कुराने वाला बच्चा था. दोस्तों के बीच उसकी अलग पहचान थी और अपनी बहन प्रिया के लिए वह बेहद संवेदनशील और जिम्मेदार था. अनिल अग्रवाल बताते हैं कि अग्निवेश में लोगों को अपनाने की अद्भुत कला थी. जो भी उससे मिलता, वह अपना हो जाता. वह सिर्फ उनका बेटा नहीं, बल्कि उनका सबसे अच्छा दोस्त, उनका गर्व और उनकी पूरी दुनिया था. उन्होंने लिखा कि अभी तो साथ मिलकर बहुत कुछ करना था, जिंदगी के कितने सपने अधूरे रह गए. बेटे के बिना आगे की जिंदगी कैसे कटेगी, यह सोचकर ही दिल बैठ जाता है.
अधूरा रह गया एक बड़ा सपना
अनिल अग्रवाल ने अपने बेटे के साथ देखे गए सपनों का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि उनका और अग्निवेश का एक ही सपना था—भारत को आत्मनिर्भर बनाना. अग्निवेश अक्सर कहा करता था कि जब हमारे देश में संसाधनों की कोई कमी नहीं है, तो हम पीछे क्यों रहें? उनका सपना था कि कोई बच्चा भूखा न सोए, हर बच्चे को शिक्षा मिले, महिलाएं आत्मनिर्भर बनें और युवाओं को सम्मानजनक रोजगार मिले.
बेटे की सोच को बनाएंगे अपनी राह
इस अपार दुख के बीच अनिल अग्रवाल ने एक बड़ा संकल्प भी दोहराया. उन्होंने कहा कि भले ही उनका बेटा इस दुनिया में नहीं रहा, लेकिन वेदांता से जुड़े हजारों कर्मचारी उनके लिए अग्निवेश जैसे ही हैं. उनके बेटे-बेटियां. अनिल अग्रवाल ने बताया कि उन्होंने अग्निवेश से वादा किया था कि जो भी संपत्ति अर्जित होगी, उसका 75 प्रतिशत से अधिक समाज के हित में लगाया जाएगा. उन्होंने लिखा कि आज, बेटे की याद में, वह इस वादे को फिर से दोहरा रहे हैं. अब वह और अधिक सादगी से जीवन जिएंगे और अपनी शेष जिंदगी समाज के कल्याण के लिए समर्पित करेंगे. एक पिता का यह दर्द शब्दों में समेटा नहीं जा सकता, लेकिन उसका संकल्प यह दिखाता है कि अग्निवेश भले ही शरीर से साथ न हों, उनकी सोच और सपने अब भी जिंदा रहेंगे.
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