गाजा की आड़ में 'खलीफा डिप्लोमेसी' चला रहा है तुर्की? मुस्लिम पीसकीपिंग फोर्स के प्रस्ताव ने उठे सवाल

Gaza Muslim Peacekeeping Force: तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन का “खलीफा” बनने का सपना अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है. पहले मुस्लिम देशों के मुद्दों में दखल, फिर इस्लामिक एकता की बात, और अब यूएन मिशन में दखल देने की कोशिश. 

Türkiye running Caliphate Diplomacy guise of Gaza Muslim peacekeeping force proposal questions
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Gaza Muslim Peacekeeping Force: तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन का “खलीफा” बनने का सपना अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है. पहले मुस्लिम देशों के मुद्दों में दखल, फिर इस्लामिक एकता की बात, और अब यूएन मिशन में दखल देने की कोशिश. 

तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में हाल ही में आयोजित एक अहम बैठक में सात इस्लामिक देशों को इकट्ठा किया गया, जहाँ “मुस्लिम पीसकीपिंग फोर्स” के गठन पर चर्चा की गई. कहा जा रहा है कि इसका मकसद गाज़ा में शांति बनाए रखना है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे तुर्की के भू-राजनीतिक एजेंडे से जोड़कर देखा जा रहा है.

इस्तांबुल में जुटे सात इस्लामिक देश

इस्तांबुल में हुई इस उच्च-स्तरीय बैठक में तुर्की, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, जॉर्डन, पाकिस्तान और इंडोनेशिया के विदेश मंत्री शामिल हुए. बैठक में यह प्रस्ताव रखा गया कि गाज़ा में एक अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक बल (Muslim Peace Keeping Force) बनाया जाए, जो युद्धविराम लागू करने में मदद करेगा.

हालांकि, गाज़ा में पहले से ही संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना (UN Peace Mission) मौजूद है, ऐसे में इस नई “इस्लामिक फोर्स” का उद्देश्य और भूमिका पर कई सवाल उठने लगे हैं.

‘मुस्लिम पीसकीपिंग फोर्स’ का असली एजेंडा क्या?

आधिकारिक तौर पर कहा गया है कि इस बल का मकसद गाज़ा में सीजफायर बनाए रखना और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के मुताबिक, यह एर्दोगन की उस पुरानी रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वे मुस्लिम दुनिया के नेता के रूप में अपनी पहचान स्थापित करना चाहते हैं.

तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने मीटिंग के बाद कहा कि “यह संगठन अभी गठन के चरण में है और इसकी जिम्मेदारियां तय नहीं की गई हैं.”

इजरायल की ‘विलय नीति’ से बढ़ी बेचैनी

इजरायल की तरफ से वेस्ट बैंक और गाज़ा के कुछ हिस्सों को अपने क्षेत्र में मिलाने की योजना इस्लामिक देशों की चिंता का बड़ा कारण है. इजरायली संसद में इस प्रस्ताव को लेकर चर्चा भी हो चुकी है.

कहा जा रहा है कि मुस्लिम देशों की यह “शांति पहल” दरअसल इजरायल की इस रणनीति को रोकने का एक सामूहिक प्रयास है. हालांकि, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने खुद भी किसी नई सैन्य तैनाती का विरोध किया है.

तुर्की की मंशा पर उठ रहे सवाल

तुर्की लंबे समय से खुद को मुस्लिम दुनिया के केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहता है. सीरिया, लीबिया और अब गाज़ा के मामलों में उसकी सक्रियता यही दिखाती है. विशेषज्ञों का मानना है कि “मुस्लिम पीसकीपिंग फोर्स” के बहाने तुर्की क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाना चाहता है और यूएन मिशन के समानांतर एक इस्लामिक ब्लॉक तैयार करने की कोशिश कर रहा है.

एर्दोगन की “खलीफा डिप्लोमेसी”

एर्दोगन की नीतियों को अब पश्चिमी जगत “खलीफा डिप्लोमेसी” के रूप में देख रहा है. ओटोमन साम्राज्य के इतिहास को पुनर्जीवित करने की उनकी राजनीतिक चाहत, गाज़ा और मुस्लिम देशों के मुद्दों पर उनकी बढ़ती सक्रियता, और अब इस्लामिक शांति सेना का विचार, सब उसी दिशा में इशारा करते हैं.

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