टैक्स हैवेन देशों पर कार्रवाई, महाशक्तियों को दो-टूक संदेश... पीएम मोदी की अगुवाई में G20 ने बदल दिए विश्व के ये नियम

    G20 2025 Summit: दुनिया की राजनीति में 22-23 नवंबर 2025 उन तारीख़ों में दर्ज होगी, जब वैश्विक शक्ति-संतुलन ने एक निर्णायक मोड़ लिया. दक्षिण अफ्रीका की मेजबानी में जोहान्सबर्ग में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन सिर्फ एक कूटनीतिक बैठक नहीं थी, यह वह क्षण था जिसने पश्चिम द्वारा गढ़ी गई पुरानी विश्व व्यवस्था को खुली चुनौती दी. 

    south africa G20 changed these rules of the world under the leadership of PM Modi
    Image Source: Social Media

    G20 2025 Summit: दुनिया की राजनीति में 22-23 नवंबर 2025 उन तारीख़ों में दर्ज होगी, जब वैश्विक शक्ति-संतुलन ने एक निर्णायक मोड़ लिया. दक्षिण अफ्रीका की मेजबानी में जोहान्सबर्ग में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन सिर्फ एक कूटनीतिक बैठक नहीं थी, यह वह क्षण था जिसने पश्चिम द्वारा गढ़ी गई पुरानी विश्व व्यवस्था को खुली चुनौती दी. 

    लंबे समय से अमेरिका और यूरोप की नीतियों से असहमत रहे विकासशील देशों ने पहली बार एकजुट होकर यह संकेत दिया कि अब फैसले कुछ अमीर देशों की मेजों पर नहीं होंगे, बल्कि उन राष्ट्रों की सामूहिक आवाज पर होंगे, जो आज भी आर्थिक, जलवायु और भू-राजनीतिक असमानताओं से जूझ रहे हैं.

    भारत द्वारा 2023 में अफ्रीकन यूनियन को स्थायी सदस्य बनाकर जिस बदलाव की शुरुआत की गई थी, वह इस शिखर सम्मेलन में स्पष्ट रूप से दिखाई दी. अफ्रीकन यूनियन अब सिर्फ एक दर्शक नहीं, बल्कि शक्तिशाली निर्णय निर्माता के रूप में जी-20 की मेज़ पर बैठा था और उसने यह साफ कर दिया कि अब कोई भी वैश्विक नीति उसके बिना नहीं लिखी जाएगी.

    महाशक्तियों को दो-टूक संदेश, शक्ति का दुरुपयोग अब नहीं चलेगा

    जोहान्सबर्ग में जुटे नेताओं ने विश्व में बढ़ते युद्ध, भूख और असमानता पर गहरी चिंता जताई और महाशक्तियों को चेतावनी दी कि वे संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करें. यह संदेश सिर्फ एक सामान्य बयान नहीं था, यह सीधे उन देशों के लिए था जो अपनी सैन्य क्षमता के बल पर सीमाएँ बदलने, छोटे देशों पर दबाव बनाने और परमाणु हथियारों की धमकी देने की नीति अपनाते रहे हैं.

    सूडान, गाज़ा और यूक्रेन में जारी संघर्षों का ज़िक्र करते हुए नेताओं ने कहा कि नागरिकों पर हमले किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं हैं. यह तीर स्पष्ट रूप से उन पश्चिमी देशों पर भी जाता है, जिनकी अर्थव्यवस्था हथियार व्यापार पर टिकी है.

    आईएमएफ-वर्ल्ड बैंक की पुरानी व्यवस्था पर सवाल

    पिछले कई दशकों से वैश्विक आर्थिक संस्थानों, खासकर IMF और विश्व बैंक पर यह आरोप लगता रहा है कि वे गरीब देशों को ऊंची शर्तों पर कर्ज देकर उन्हें ऋण जाल में फंसा देते हैं. इस बार विकासशील देशों ने इन संस्थाओं से सीधे पूछा, यह व्यवस्था आखिर किसके हित में है?

    एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट के अनुसार, कम आय वाले देशों का ब्याज भुगतान पिछले दशक में दोगुना हो गया है. इसे "आर्थिक दमन" के रूप में देखा गया. जी-20 देशों ने इस बार साफ कहा कि अब कर्ज देने और लेने के नियम पारदर्शी होंगे, और "कॉमन फ्रेमवर्क" को मजबूती से लागू किया जाएगा.
    चाड, जाम्बिया, घाना और इथियोपिया जैसे देशों को राहत देने की प्रक्रिया इसका पहला चरण है.

    महत्वपूर्ण बात यह है कि आईएमएफ में सब-सहारा अफ्रीका के लिए 25वीं कुर्सी का निर्माण कर दिया गया है, जो अफ्रीका को न सिर्फ आवाज बल्कि वीटो जैसी प्रभावी भूमिका भी देता है. यह ऐतिहासिक बदलाव निश्चित रूप से पश्चिमी देशों के लिए एक बड़ा झटका है.

    संसाधनों पर अब मालिक देशों का हक़

    अफ्रीका और एशिया के खनिज संसाधनों का दो सदियों तक शोषण होता रहा. लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ मिनरल्स आधुनिक उद्योगों की रीढ़ हैं, और पश्चिमी तथा एशियाई औद्योगिक महाशक्तियां इन्हें कच्चे माल के रूप में सस्ते दामों पर लेकर अरबों कमाती रही हैं.

    जोहान्सबर्ग घोषणा में "क्रिटिकल मिनरल्स फ्रेमवर्क" पेश किया गया, जो इस व्यवस्था को बदलने की दिशा में निर्णायक कदम है. अब खनिज निर्यात तभी होगा जब वैल्यू एडिशन और प्रोसेसिंग उसी देश में होगी, जहां से खनिज निकाले जाते हैं.

    इसका अर्थ यह है कि स्थानीय उद्योग विकसित होंगे, नौकरियां वहीं पैदा होंगी, वैश्विक कंपनियों को स्थानीय निवेश करना होगा, और कच्चे माल की लूट बंद होगी. यह नीति स्पष्ट तौर पर उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए चुनौती है जो दशकों से अफ्रीका से संसाधन निकालकर बाहर ले जाती रही हैं.

    अफ्रीका के 60 करोड़ लोग आज भी अंधेरे में

    जोहान्सबर्ग दस्तावेज़ ने एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने रखी, अफ्रीका में आज भी 60 करोड़ लोगों के पास बिजली नहीं है. हर साल 20 लाख लोग साफ ईंधन की अनुपलब्धता के कारण जान गंवा रहे हैं. इन चिंताजनक आंकड़ों के बीच नेताओं ने 'मिशन 300' का समर्थन करते हुए लक्ष्य रखा है कि 2030 तक अफ्रीका के 30 करोड़ लोगों तक बिजली पहुंचाई जाएगी.

    ऊर्जा को राष्ट्रीय संप्रभुता का विषय बताते हुए कहा गया कि हर देश खुद तय करेगा कि उसे कौन-सा ऊर्जा मॉडल अपनाना है. नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता तीन गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन इसके लिए अमीर देशों को फाइनेंस और तकनीक देनी होगी. अब सिर्फ भाषण नहीं, ठोस निवेश की मांग की गई है.

    जलवायु असमानता पर प्रहार, अमीर देशों को हिसाब देना होगा

    क्लाइमेट चेंज पर वर्षों से पश्चिमी देश वादे करते आए हैं, लेकिन वित्तीय सहायता के मोर्चे पर नाकाम रहे हैं. जी-20 ने पहली बार यह स्वीकार किया कि विकासशील देशों को अपने जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए 2030 तक 5.8-5.9 ट्रिलियन डॉलर की आवश्यकता होगी, जो मौजूदा फंडिंग से कई गुना अधिक है.

    संदेश साफ है कि क्लाइमेट फाइनेंस को "बिलियंस से ट्रिलियंस" में बदलना होगा. साथ ही यह चेतावनी भी दी गई है कि पर्यावरण के नाम पर कोई देश व्यापारिक हथकंडे नहीं अपनाएगा. यह संकेत सीधा यूरोपीय संघ की "ग्रीन ट्रेड नीतियों" की ओर जाता है, जो विकासशील देशों के उत्पादों पर भारी पर्यावरण शुल्क लगाने की तैयारी कर रहा था.

    हर साल 88 अरब डॉलर की चोरी रोकी जाएगी

    जोहान्सबर्ग सम्मेलन की सबसे गंभीर चर्चाओं में एक थी, अफ्रीका से होने वाली अवैध धन निकासी. हर साल 88 अरब डॉलर भ्रष्टाचार, कर चोरी और अवैध व्यापार के जरिए बाहर भेजे जाते हैं. यह रकम अफ्रीका के विकास को हमेशा पीछे धकेलती है.

    इस मुद्दे से निपटने के लिए 'उबंटू कमीशन' के गठन की घोषणा की गई है. यह आयोग अवैध धन प्रवाह की जांच करेगा, संबंधित देशों के साथ तालमेल बनाएगा और चोरी किए गए संपत्तियों को वापस लाने की प्रक्रिया तैयार करेगा.

    जी-20 ने यह भी तय किया कि टैक्स हैवेन देशों पर कार्रवाई तेज होगी, ट्रांसनेशनल कंपनियों के लिए ग्लोबल मिनिमम टैक्स लागू किया जाएगा, किसी भी भ्रष्टाचार का पैसा सुरक्षित पनाहगाह में नहीं छिप पाएगा.

    यह भी पढ़ें- Gratuity नियम में बड़ा बदलाव; अब 5 साल नहीं, एक साल में भी मिलेगा लाभ! यहां समझ लें पूरा गणित