Sawan 2026: रावण ने क्यों काटे थे अपने सिर? जानिए बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की चमत्कारी कथा

Sawan 2026: सावन 2026 में जानिए रावण की अद्भुत शिव भक्ति की कहानी, कैसे उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए महादेव और विष्णु जी की लीला से धरती पर स्थापित हुआ बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग.

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Sawan 2026: सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की भक्ति और आराधना के लिए सबसे शुभ माना जाता है. इस पूरे महीने में शिवालयों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है और हर ओर हर-हर महादेव के जयकारे सुनाई देते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन में भगवान शिव अपने भक्तों की मनोकामनाएं जल्दी पूरी करते हैं. यही वजह है कि शिवभक्त इस महीने में उपवास, जलाभिषेक और कांवड़ यात्रा जैसे धार्मिक अनुष्ठानों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं.

पंडित प्रवीण मिश्र जी के अनुसार, सावन का प्रत्येक दिन शिव उपासना के लिए विशेष महत्व रखता है. इस महीने से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं हैं, जिनमें भगवान शिव की कृपा और उनके भक्तों की अटूट श्रद्धा का वर्णन मिलता है. ऐसी ही एक कथा महादेव के परम भक्त लंकापति रावण की है, जिसने अपनी कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया था.

रावण की तपस्या से प्रसन्न हुए थे भगवान शिव

हिंदू धर्म की मान्यताओं में रावण को केवल एक विद्वान और शक्तिशाली राजा के रूप में ही नहीं, बल्कि भगवान शिव के परम भक्त के रूप में भी जाना जाता है. कहा जाता है कि रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी. अपनी भक्ति की परीक्षा देते हुए उसने एक-एक करके अपने सिर भगवान शिव को समर्पित करना शुरू कर दिया.

जब रावण अपना अंतिम सिर भी भगवान शिव को अर्पित करने वाला था, तब उसकी अटूट भक्ति देखकर महादेव प्रकट हुए. भगवान शिव उसकी तपस्या से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने रावण को वरदान मांगने के लिए कहा. उस समय रावण ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे उसके साथ लंका चलें और वहीं निवास करें.

भगवान शिव ने उसकी इच्छा स्वीकार कर ली, लेकिन इसके साथ एक शर्त भी रखी. उन्होंने कहा कि वे अपने शिवलिंग स्वरूप में उसके साथ जाएंगे, लेकिन रावण को रास्ते में कहीं भी शिवलिंग को जमीन पर नहीं रखना होगा. यदि शिवलिंग धरती पर रखा गया, तो वह वहीं स्थापित हो जाएगा और फिर उसे कोई हिला नहीं पाएगा.

विष्णु जी की लीला से धरती पर स्थापित हुआ शिवलिंग

रावण भगवान शिव के कामना लिंग को लेकर लंका की ओर चल पड़ा. जब देवताओं को इस बात का पता चला तो वे चिंतित हो गए. उन्हें डर था कि यदि शिवलिंग लंका पहुंच गया तो रावण की शक्ति कई गुना बढ़ जाएगी. इसके बाद देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी.

भगवान विष्णु ने एक ग्वाले का रूप धारण किया और रावण के रास्ते में पहुंच गए. मान्यता है कि उसी समय भगवान की लीला से रावण को लघुशंका की तीव्र इच्छा हुई. उसने ग्वाले से कुछ समय के लिए शिवलिंग पकड़ने का आग्रह किया और उसे जमीन पर नहीं रखने की बात कही.

ग्वाले के रूप में भगवान विष्णु ने कुछ समय तक शिवलिंग को संभाले रखा, लेकिन शिवलिंग का भार लगातार बढ़ता गया. अंत में उन्होंने उसे जमीन पर रख दिया. जब रावण वापस आया तो उसने देखा कि शिवलिंग धरती में स्थापित हो चुका है. उसने पूरी ताकत लगाकर उसे उठाने का प्रयास किया, लेकिन वह शिवलिंग को हिला तक नहीं सका.

धार्मिक मान्यता के अनुसार, यही स्थान आज झारखंड के देवघर में स्थित प्रसिद्ध बैद्यनाथ धाम के नाम से जाना जाता है. इसे भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है. सावन के महीने में यहां देशभर से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं और बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करते हैं.

कांवड़ यात्रा का पौराणिक इतिहास

सावन महीने में होने वाली कांवड़ यात्रा भगवान शिव की भक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है. कांवड़िए गंगाजल लेकर कई किलोमीटर की यात्रा करते हैं और शिव मंदिरों में भगवान शिव का अभिषेक करते हैं. इस परंपरा के पीछे भी कई धार्मिक कथाएं जुड़ी हुई हैं.

मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम को पहला कांवड़िया माना जाता है. कहा जाता है कि उन्होंने गढ़मुक्तेश्वर यानी ब्रजघाट से गंगा जल लाकर उत्तर प्रदेश के बागपत स्थित पुरा महादेव मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक किया था. इसी वजह से कई धार्मिक मान्यताओं में परशुराम जी को कांवड़ यात्रा की शुरुआत करने वाला माना गया है.

श्रवण कुमार की कथा से भी जुड़ी है कांवड़ परंपरा

कांवड़ यात्रा को त्रेता युग के श्रवण कुमार की कथा से भी जोड़ा जाता है. धार्मिक कथाओं के अनुसार, श्रवण कुमार अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा पर लेकर गए थे. उनके माता-पिता की इच्छा हरिद्वार जाकर गंगा स्नान करने की थी, जिसे श्रवण कुमार ने पूरा किया.

यात्रा से लौटते समय वे गंगाजल भी अपने साथ लेकर आए और भगवान शिव को अर्पित किया. इसी वजह से श्रवण कुमार को भी कांवड़ परंपरा से जोड़कर देखा जाता है. उनकी सेवा, समर्पण और माता-पिता के प्रति भक्ति आज भी लोगों के लिए प्रेरणा मानी जाती है.

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