Armenia Elections: आर्मेनिया के हालिया चुनाव में प्रधानमंत्री निकोल पशिन्यान की पार्टी को अपेक्षित दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका, जिसके बाद देश की राजनीति में नए समीकरण बनने की संभावना बढ़ गई है. चुनाव परिणामों को रूस के लिए राहत और तुर्की-अजरबैजान के लिए झटके के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि पशिन्यान को लंबे समय से रूस-विरोधी और पश्चिम समर्थक नेता माना जाता रहा है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, पशिन्यान की पार्टी को करीब 49 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि रूस समर्थित दल को लगभग 37 प्रतिशत मत प्राप्त हुए. हालांकि पशिन्यान की पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, लेकिन उसे संवैधानिक बदलावों और बड़े राजनीतिक फैसलों के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं हुआ.
तुर्की और अजरबैजान से रिश्तों पर पड़ सकता है असर
विश्लेषकों का मानना है कि इस नतीजे का असर आर्मेनिया के तुर्की और अजरबैजान के साथ संबंधों पर पड़ सकता है. 2023 तक आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच सीमा विवाद को लेकर संघर्ष चलता रहा था, जिसमें तुर्की ने अजरबैजान का समर्थन किया था. बाद में अंतरराष्ट्रीय दबाव और अमेरिकी पहल के बाद दोनों देशों के बीच समझौता हुआ.
पशिन्यान सरकार इस समझौते को आगे बढ़ाने और तुर्की के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करने की दिशा में काम कर रही थी. इसके लिए संसद में मजबूत बहुमत की जरूरत थी, जो इस चुनाव में नहीं मिल सका.
रूस के लिए क्यों अहम है आर्मेनिया?
आर्मेनिया की भौगोलिक स्थिति उसे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है. इसकी सीमाएं तुर्की, ईरान और अजरबैजान जैसे देशों से लगती हैं. यूरोप और एशिया को जोड़ने वाले इस क्षेत्र में प्रभाव बनाए रखना रूस की प्राथमिकताओं में शामिल है.
2023 के बाद आर्मेनिया ने रूस से दूरी बढ़ाते हुए पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करने शुरू किए थे. ऐसे में मॉस्को के लिए यह चुनाव काफी अहम माना जा रहा था. रूस पहले ही मध्य पूर्व में अपने कुछ पारंपरिक प्रभाव क्षेत्रों को खो चुका है, इसलिए आर्मेनिया में उसकी मौजूदगी क्षेत्रीय रणनीति के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है.
विपक्ष की भूमिका होगी मजबूत
रूसी मीडिया इंटरफैक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, विपक्षी दल संसद में पर्याप्त सीटें हासिल करने में सफल रहे हैं. ऐसे में भले ही पशिन्यान सरकार बनाने में सफल हो जाएं, लेकिन उन्हें संसद के भीतर एक मजबूत विपक्ष का सामना करना पड़ सकता है.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नई सरकार के सामने विदेश नीति, क्षेत्रीय सुरक्षा और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को लेकर कई चुनौतियां रहेंगी, जहां विपक्ष का दबाव निर्णायक भूमिका निभा सकता है.
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