Rama Ekadashi 2025: रमा एकादशी का क्या है महत्व? जानें पूजन विधि से लेकर शुभ मुहूर्त की जानकारी यहां

Rama Ekadashi 2025: कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है. यह व्रत देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु को समर्पित होता है और इसका महत्व विशेष रूप से इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि यह दीपावली से ठीक चार दिन पहले आती है.

Rama Ekadashi 2025 Today know importance and shubh muhurat and pujan vidhi
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Rama Ekadashi 2025: कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है. यह व्रत देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु को समर्पित होता है और इसका महत्व विशेष रूप से इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि यह दीपावली से ठीक चार दिन पहले आती है. 2025 में रमा एकादशी आज के दिन मनाई जा रही है और इस अवसर पर व्रत, पूजा, दान तथा मंत्रोच्चार द्वारा भक्तगण पुण्य प्राप्ति की कामना कर रहे हैं.


रमा, देवी लक्ष्मी का ही एक अत्यंत मंगलमय रूप है, जो संपत्ति, ऐश्वर्य और समृद्धि की प्रतीक मानी जाती हैं. इस एकादशी को व्रत करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में सुख, सौभाग्य तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी होती है. पुराणों में उल्लेख है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को वाजपेय यज्ञ के समान फल मिलता है, जो अत्यंत दुर्लभ और पुण्यदायक होता है.

पौराणिक कथा से जुड़ी मान्यता

रमा एकादशी व्रत के संदर्भ में एक प्राचीन कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार राजा मुचुकुंद ने इस व्रत को श्रद्धा के साथ किया था. उनकी कठिन तपस्या और व्रत पालन से प्रसन्न होकर देवी लक्ष्मी और श्रीहरि विष्णु ने उन्हें आशीर्वाद दिया और उनके राज्य को सदा के लिए सुख और समृद्धि से भर दिया. तभी से इस एकादशी को विशेष महत्व दिया गया है और इसे धन-धान्य की प्राप्ति और जीवन की बाधाओं से मुक्ति के लिए उत्तम माना गया है.

इस दिन बनने वाले विशेष योग

इस बार की रमा एकादशी पर ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति इसे और भी शुभ बना रही है. सूर्य का तुला राशि में गोचर और बुध तथा मंगल के साथ त्रिग्रही योग का बनना, इसे विशिष्ट बना देता है. साथ ही इस दिन शुक्ल योग और ब्रह्म योग का संयोग भी बन रहा है. शास्त्रों में बताया गया है कि जब रमा एकादशी पर ऐसे शुभ योग बनते हैं, तो इसका फल हजार यज्ञों के बराबर माना जाता है. इस तरह यह दिन केवल उपवास का ही नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक और खगोलीय महत्व का भी दिन बन जाता है.

रमा एकादशी व्रत की संपूर्ण विधि

व्रत की शुरुआत दशमी तिथि की संध्या से ही हो जाती है. इस दिन रात्रि भोजन में सात्विकता का पालन करना आवश्यक होता है और क्रोध, झूठ व कटु वाणी से बचने का नियम होता है. एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ और पीले वस्त्र धारण करें. पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें और भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें. धूप, दीप, रोली, अक्षत, फूल और तुलसी दल अर्पित करें. श्रीहरि को पीले फूल और लक्ष्मी माता को लाल कमल विशेष प्रिय माने जाते हैं, इसलिए उन्हें भेंट करना श्रेष्ठ माना गया है. आरती और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने के बाद दिनभर फलाहार या निर्जल व्रत रखा जाता है. संध्या के समय पुनः आरती और भोग के साथ पूजा पूर्ण की जाती है. द्वादशी तिथि को व्रत का पारण करके व्रत को विधिपूर्वक समाप्त किया जाता है.

भगवान विष्णु को चढ़ाए जाने वाले भोग

इस शुभ अवसर पर भगवान विष्णु को विशेष भोग लगाए जाते हैं जिनमें पंचामृत, फल, खीर, मालपुआ, पंजीरी और तुलसी दल प्रमुख हैं. मान्यता है कि तुलसी दल और खीर भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय होते हैं और इनके भोग से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं. प्रसाद को श्रद्धा से भक्तों में वितरित करना भी एक पुण्यकारी कार्य माना गया है.

व्रत में मंत्रों का जाप और ध्यान

रमा एकादशी व्रत में मंत्रों का उच्चारण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है. 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय', 'ॐ रमायै नमः' जैसे मंत्रों का जाप करने से मन को शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है. इसके साथ-साथ “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री सिद्ध लक्ष्म्यै नमः” और “ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्” जैसे मंत्रों का स्मरण करने से मानसिक एकाग्रता और ईश्वर भक्ति में वृद्धि होती है.

‘ॐ जय जगदीश हरे’ की आरती से होती है पूजा की पूर्णता

भगवान विष्णु की आरती ‘ॐ जय जगदीश हरे’ को इस दिन विशेष रूप से गाया जाता है. यह आरती न केवल पूजा का समापन करती है बल्कि पूरे वातावरण को भक्ति-रस में डुबो देती है. भक्त भावविभोर होकर जब शंख और घंटियों की ध्वनि के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो ऐसा अनुभव होता है मानो स्वयं भगवान विष्णु की उपस्थिति वहां है.

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